आज विधानसभा चुनावों के नतीजे सामने आ जाएंगे। ऐसे में मेरे सहित उत्तर प्रदेश के बहुत से नागरिक यह उम्मीद कर रहे हैं कि राज्य की नई सरकार विकास से जुड़े यहां के पुराने मुद्दों पर गौर करेगी और राज्य को उसकी असीमित क्षमता का एहसास कराएगी।
मसलन, यहां के किसानों को ही देखें, तो खेती उनका मुख्य व्यवसाय है, मगर इससे उन्हें बहुत कम आय हो पाती है। एक अध्ययन के मुताबिक उत्तर प्रदेश के किसानों ने 2015 में गेहूं की फसल के लिए प्रति हेक्टेयर 17,450 रुपये खर्च किए, जिसमें बीज, उर्वरक, कीटनाशक और फसल कटाई की लागत शामिल है। मगर मौसम की मार से बहुत बड़े क्षेत्र में फसल को भारी नुकसान हुआ। सरकार ने प्रति हेक्टेयर 18,000 रुपये मुआवजा तो दिया, मगर इसकी सीमा अधिकतम दो हेक्टेयेर तक सीमित भी कर दी। छोटे किसानों के पास भी अमूमन इससे अधिक जमीन होती है, उन्हें इससे भारी नुकसान हुआ। खेतिहर मजदूरों की स्थिति तो और भी खराब है, उन्हें रोजाना डेढ़ सौ रुपये ही मिल पाते हैं। हालांकि किसानों की यह बदहाली उत्तर प्रदेश में किसान आत्महत्या के आंकड़ों से मेल नहीं खाती। वर्ष 2013 में राज्य में 750 किसानों ने आत्महत्या कर ली थी, जबकि इसी वर्ष मध्य प्रदेश में 1,090 किसानों ने बदहाली में अपना जीवन समाप्त कर लिया। दरअसल अनेक मौतों का कारण पुरानी बीमारी और शराब की लत को बताया गया।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के आंकड़ों के मुताबिक अपने तथाकथित जनसांख्यिकी लाभांश के बावजूद उत्तर प्रदेश में 15 से 35 वर्ष आयु वर्ग के एक करोड़ लोग बेरोजगार हैं। इसमें वे 32 लाख लोग शामिल नहीं हैं, जो इस अध्ययन के पहले से बेरोजगार हैं। खेती की कमजोर अर्थव्यवस्था और तीन से चार फीसदी की मामूली वृद्धि दर के कारण मजूबर होकर 2008 से 2013 के दौरान 49 लाख खेतिहर मजदूरों को खेती संबंधी काम छोड़ना पड़ा है। जो लोग खेती पर निर्भर हैं, उनके लिए बहुत काम है, यह अनुमान व्यक्त किया गया है कि सिर्फ 9.72 फीसदी खेतिहर मजदूरों को ही नियमित तौर पर सम्मानजनक काम मिल पाता है। ऐसा भी नहीं है कि ऐसे युवा उच्च कौशल प्राप्त हैं। प्राइमरी या उसके बाद स्कूल छोड़ने वालों की सर्वाधिक संख्या सौ में नौ, उत्तर प्रदेश में है। इसी तरह से यहां छात्र और शिक्षक अनुपात भी अधिक है, 39 छात्रों के पीछे एक शिक्षक।
विनिर्माण क्षेत्र की स्थिति भी लंबे समय से जड़वत बनी हुई है, जबकि इसे नीचे जाते कृषि क्षेत्र के विकल्प के तौर पर देखा जाता है। कानपुर का चमड़ा उद्योग 1990 के दशक में दस लाख लोगों को रोजगार मुहैया करा रहा था, अब यहां इसके आधे श्रमिक ही रह गए हैं; इसका पता इससे चलता है कि दस साल के दौरान यहां के चार सौ चमड़ा प्रशिक्षण केंद्रों में से 176 बंद हो गए। अधिकांश युवा सरकारी नौकरियों की ओर भागते हैं। हालत यह है कि औसत 20 हजार रुपये वेतन के चपरासियों के 368 पदों पर भर्ती के लिए उत्तर प्रदेश के सचिवालय को 23 लाख आवेदन मिले, जिनमें 24,969 पीएच.डी. और डेढ़ लाख स्नातक डिग्रीधारी आवेदक शामिल थे।
दूसरे रोजगार की स्थिति भी अच्छी नहीं है। श्रम और रोजगार मंत्रालय के मुताबिक प्लंबर और लोहार को रोजाना क्रमशः 385.71 रुपये और 326 रुपये पर काम करना पड़ता है, ये पारिश्रमिक दूसरे राज्यों की तुलना में कम हैं। इसमें हैरत नहीं होनी चाहिए कि देश में सर्वाधिक 21 फीसदी गरीब उत्तर प्रदेश में रहते हैं और उनकी संख्या 7.3 करोड़ है। राज्य की क्षमता के बावजूद कृषि से जुड़े सहायक उद्योगों में काफी कम निवेश किया गया है। लिहाजा खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी और बागवानी की स्थिति राज्य की क्षमता से काफी कम है। लेबर ब्यूरो के पांचवें वार्षिक रोजगार सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य में करीब 30.1 फीसदी परिवारों की मासिक आय पांच हजार रुपये से भी कम है।
नतीजतन पिछले एक दशक के दौरान उत्तर प्रदेश में गंभीर किस्म के अपराध बढ़े हैं। 2005 में जहां दस लाख की आबादी में इस तरह की 75 घटनाएं दर्ज की गई थीं, वहीं 2015 में इनकी संख्या बढ़कर 140 हो गई। इन आंकड़ों को बारीकी से देखें तो पता चलता है कि बलात्कार की घटनाओं में छह गुना बढ़ोतरी हो गई। 2005 में जहां इस तरह की घटनाओं की संख्या दस लाख में सात थी, वहीं 2015 में बढ़कर 30 हो गई। इस बीच, राज्य के पुलिस बल को कम निवेश से जूझना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के 21 करोड़ लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ 1.8 लाख पुलिस कर्मियों के भरोसे है। पुलिस तंत्र में राजनीतिक दखल के मामले में भी यह राज्य सबसे आगे है, जहां 2008 से 2015 के दौरान आठ डीजीपी बदल गए।
अलबत्ता सामाजिक-पर्यावरण के नजरिये से राज्य ने कुछ मिश्रित प्रगति की है। मसलन, अब पहले से अधिक महिलाएं शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। 15 से 19 वर्ग की 55.52 फीसदी लड़कियां शिक्षा ग्रहण कर रही हैं, जबकि 2001 में ऐसी लड़कियों की संख्या सिर्फ 28.35 फीसदी ही थी। पर जब हम स्वास्थ्य की स्थिति को देखते हैं, तो परिदृश्य धुंधला नजर आता है। पिछले पंद्रह वर्षों में राज्य की आबादी में तो 25 फीसदी की वृद्धि हुई, मगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या आठ फीसदी घट गई। 62 फीसदी गर्भवती महिलाएं प्रसव पूर्व स्वास्थ्य सुरक्षा से वंचित रह जाती हैं, जिसकी वजह से मातृत्व मृत्युदर के मामले में उत्तर प्रदेश भारत में दूसरे नंबर पर है। उत्तर प्रदेश के आधे बच्चे टीकाकरण से वंचित हैं और इतने ही बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।
इस परिदृश्य को बदलने के लिए निचले स्तर से प्रयास करने की जरूरत है। इस महान राज्य के रूपांतरण के लिए इसकी जड़ों की ओर देखने की जरूरत है। इसके लिए प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश, कानून के राज की स्थापना और इसका गौरव रहे विश्वविद्यालयों, कृषि से जुड़ी प्रसंस्करण इकाइयों और कपड़ा उद्योग में नई जान डालने की जरूरत है।