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शारीरिक आकर्षण प्रेम नहीं, वासना है

Mon, 01 Jul 2013 10:10 PM IST
शिवकुमार गोयल
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भगवान बुद्ध के शिष्य उपगुप्त परम सदाचारी थे। वह भिक्षुओं से कहते थे कि प्रेम और संयम ही आध्यात्मिक विकास के साधन हैं। समाज से बहिष्कृत लोगों से प्रेम करनेवाला ही सच्चा धार्मिक है। एक दिन एक सुंदरी उपगुप्त के पास पहुंची। उपगुप्त उसके सौंदर्य से आकर्षित हो गए, लेकिन उसी क्षण उन्हें बुद्ध के वचन याद आ गए कि सच्चा आकर्षण शारीरिक सौंदर्य में नहीं, मन के सौंदर्य में होता है।
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सुंदरी भी उपगुप्त के प्रेमपाश में बंध गई थी। उसने उपगुप्त से प्रार्थना की कि वह उसके साथ कुछ क्षण बिताकर उसे उपकृत करें। उपगुप्त ने उपयुक्त अवसर पर एक बार मिलने का वचन दिया। वर्षों बीत गए। भोग-विलास में रत रहने के कारण उस युवती को अनेक रोगों ने घेर लिया। उसका रूप-लावण्य नष्ट हो गया। लोगों ने उसे कुलटा बताकर नगर से बाहर निकाल दिया। वह जंगल में दयनीय हालत में अंतिम दिन बिताने लगी।

उपगुप्त को अचानक युवती की दुर्दशा का पता चला और उन्हें अपना वचन भी याद हो आया। वह उससे मिलने जा पहुंचे। उन्हें देखते ही युवती की आंखों से आंसू बहने लगे। उपगुप्त ने उसके सिर पर हाथ फेरा, तो वह चमत्कृत होकर बोली, जब मैं प्रेम करने योग्य थी, तब तो आप आए नहीं, अब क्या लाभ? उपगुप्त ने कहा, देवी, शारीरिक आकर्षण को प्रेम नहीं, वासना कहते हैं। मैं आज भी तुमसे प्रेम करता हूं। यह सुनकर युवती आह्लादित हो उठी।
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