बीते दिनों दिल्ली में देश भर के अनेक किसान संगठनों, पर्यावरण और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि जीएम (जेनेटिकली मोडीफाइड) फसलों का विरोध करने के लिए इकट्ठा हुए। इस आयोजन की विशेष वजह यह थी कि बायोटेक्नोलॉजी रेगुलेटरी ऑथोरिटी ऑफ इंडिया (भारतीय बायो तकनीक नियमन प्राधिकरण) जैसी व्यवस्था स्थापित करने का प्रस्तावित कानून यदि बन गया, तो इससे देश में जीएम फसलों के प्रसार की आशंका बहुत बढ़ जाएगी। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के दस अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों ने बायोटेक्नालॉजी के इस विधेयक के विरुद्ध बयान जारी किया था। अनेक सांसद और विद्वान भी इस विधेयक का विरोध कर चुके हैं। कृषि पर संसद की स्थायी समिति ने दो वर्षों तक गंभीर विमर्श कर जीएम फसलों और जैव सुरक्षा पर जो संस्तुतियां की हैं, उनका उल्लंघन भी इस विधेयक में हो रहा है।
बीटी बैंगन को देश में प्रथम खाद्य जीएम फसल के रूप में स्वीकृति दिलाने के लिए जीएम लॉबी ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। लेकिन इस पर निर्णय के लिए सरकार ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई, जिसका नतीजा यह हुआ कि अनेक जन सुनवाइयों में किसानों और विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया और इसे स्वीकृति नहीं मिल पाई। इसके बाद शक्तिशाली जीएम कंपनियों ने ऐसा कानून बनवाने के प्रयास तेज किए, जिससे जीएम फसलों को स्वीकृत करने की प्रक्रिया उसी मंत्रालय में व उन्हीं अधिकारियों के पास आ जाए, जो जीएम फसलों को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। इस पूरे कुप्रयास में राज्य सरकारों के अधिकार, पंचायती राज व विकेंद्रीकरण, लोकतांत्रिक भावना, सूचना के अधिकार, पारदर्शिता और जन भागीदारी का व्यापक उल्लंघन हो रहा है। उससे भी खतरनाक यह कि देश की कृषि, पर्यावरण व स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले निर्णय चंद व्यक्तियों के गुट को सौंपे जा रहे हैं। यही वजह है कि प्रस्तावित बायोटेक कानून का इतना विरोध हो रहा है।
दुनिया के अनेक विशेषज्ञ जीएम फसलों के खतरों के बारे में बार-बार चेतावनी दे चुके हैं। विरोध की एक प्रमुख वजह यह है कि जीएम फसलें स्वास्थ्य व पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित नहीं हैं तथा यह असर जेनेटिक प्रदूषण के माध्यम से अन्य सामान्य फसलों व पौधों में फैल सकता है। इस विचार को इंडिपेंडेंट साइंस पैनल (स्वतंत्र विज्ञान मंच) ने बहुत सारगर्भित ढंग से व्यक्त किया है। इसने अपने एक दस्तावेज में कहा है कि जीएम फसलों के बारे में जिन लाभों का वायदा किया गया था, वे प्राप्त नहीं हुए हैं और अब इस बारे में व्यापक सहमति है कि इन फसलों का प्रसार होने पर ट्रांसजेनिक प्रदूषण से बचा नहीं जा सकता।
जेफरी एम स्मिथ की किताब जेनेटिक रुलेट में ऐसे दर्जनों अध्ययनों का सार-संक्षेप है, जिनमें चूहों पर हुए अनुसंधानों में पेट, लिवर, आंतों के बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने की चर्चा है। इसमें जीएम फसल या उत्पाद खाने वाले पशु-पक्षियों के मरने या बीमार होने की चर्चा है व जेनेटिक उत्पादों से मनुष्यों में भी होने वाली गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का वर्णन है। अपने यहां भी बीटी कपास या उसके अवशेष खाने या ऐसे खेत में चरने के बाद कई पशुओं के मरने व बीमार होने के समाचार मिले हैं। इस पर अनुसंधान कर चुके डॉ. सागरी रामदास के मुताबिक, ऐसे मामले खासकर आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और महाराष्ट्र में सामने आए हैं। हरियाणा में दुधारू पशुओं को बीटी कॉटन के बीज व खली खिलाने के बाद उनमें दूध कम होने व प्रजनन की समस्याएं सामने आईं।
कृषि व खाद्य क्षेत्र में जीएम की टेक्नोलॉजी छह-सात बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में केंद्रित हैं। इनका उद्देश्य जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से विश्व कृषि व खाद्य व्यवस्था पर ऐसा नियंत्रण स्थापित करना है, जैसा पहले नहीं हुआ। इस समय इन कंपनियों का सबसे बड़ा शिकार भारत है, क्योंकि उन्हें पता है कि इसके बाद अन्य विकासशील देशों पर उनका हमला और आसान हो जाएगा। अतः खाद्य व कृषि को नियंत्रित करने के उनके कुप्रयास के विरुद्ध बहुत व्यापक स्तर पर एकता दिखाते हुए इसे रोकने का सतत प्रयास करना बहुत जरूरी है। नहीं तो, हमारी खेती-किसानी, पर्यावरण व स्वास्थ्य की गंभीर क्षति होगी।