हमेशा ही समावेशिता को प्रतिष्ठित करने वाले भारत ने उचित ही नरेंद्र मोदी के रूप में अपना एक ऐसा नेता चुना है, जो मूलतः उन्हीं मूल्यों को साझा करता है। कई मायनों में, भारत ने एक ऐसे नेता को चुना है, जो उसके मूल सिद्धांतों और अंतर्निहित संस्कारों के अनुकूल है। यह बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए नहीं कि समावेशन ही ‘धार्मिक मार्ग’ है, बल्कि इसलिए कि आगे बढ़ते हुए समावेशन ही एकमात्र मार्ग है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने विश्व मंच पर बार-बार समावेशी और सहयोगी मानवता की रूपरेखा प्रस्तुत की है। जी-20 में अफ्रीकी संघ को शामिल करने में भारत की भूमिका, वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों को बड़े पैमाने पर आपस में जोड़ने के लिए भारत द्वारा प्रस्तावित ‘एक विश्व, एक सूर्य, एक ग्रिड’ पहल, पड़ोसी पहले की नीति या संकट के दौरान सबसे पहले मदद का हाथ बढ़ाने वाले देश के रूप में हमारी प्रशंसा, महामारी के दौरान 96 देशों को मानवीय सहायता-इन सब में, भारत ने निर्विवाद रूप से सिद्ध किया है कि हम व्यक्तिगत लाभों से ज्यादा मानवता को महत्व देते हैं।
समावेशिता का यह गुण नरेंद्र भाई की नेतृत्व शैली में भी स्पष्ट दिखाई देता है। ‘मन की बात’ पहल शासन की विशाल मशीनरी में एक छोटी-सी बात लग सकती है, लेकिन यह गहरा अर्थ रखती है। आम नागरिक से सीधा जुड़ाव बनाकर वह उनके साथ जुड़ पाते हैं और उनकी कहानियों, संघर्षों और योगदानों का जश्न मना पाते हैं। इससे उन्हें लोगों की वास्तविक स्थिति की जानकारी मिलती है और यह सुनिश्चित होता है कि उनका शासन उसी के अनुरूप हो। योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां दिलाने में उनकी भूमिका के लिए मैं तहे दिल से आभारी हूं। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा का नेतृत्व करके, उन्होंने योग के प्रति लोगों की रुचि को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाने में योगदान दिया है और इसके लाभों को रेखांकित किया है। इस समय यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि योग आज मानव जाति के सामने आने वाली मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक चुनौतियों का समाधान है। यदि हम विकास के लिए एक स्थिर मन चाहते हैं, तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए कम से कम कुछ मिनटों के लिए योगाभ्यास या ध्यान को शामिल करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत अपनी वास्तविक क्षमता को साकार करने और एक गौरवशाली भविष्य की ओर अग्रसर होने के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। अब तक हमने अपनी आर्थिक प्रगति देखी है, बुनियादी ढांचे, अंतरिक्ष, रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में उन्नति देखी है। साथ ही, हम आत्मनिर्भरता, भू-राजनीतिक लचीलेपन और शक्ति की दिशा में अपनी नीतियों के कुशल संचालन के साक्षी रहे हैं। हालांकि, एक राष्ट्र के रूप में, हमें अभी बहुत कुछ करना है। भावी पीढ़ी का पोषण हमारे विकास की कुंजी है। हम नहीं चाहते कि भारत (अपनी बढ़ती युवा आबादी के साथ) अवसर के इस उपजाऊ दौर से चूक जाए।
अब समय आ गया है कि पिछले दशकों में व्याप्त अधूरे आदर्शों की आखिरी बेड़ियां तोड़ दी जाएं और भारत के नागरिकों को अपने भविष्य का निर्माता बनने के लिए आमंत्रित किया जाए। बुनियादी ढांचे से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, व्यापार से लेकर रक्षा तक, शिक्षा से लेकर उद्योग तक, हमें अपनी जनता को आगे बढ़ाने का दायित्व सौंपना होगा। यह विश्वास वास्तव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वर्तमान शासन द्वारा प्रदर्शित किया जा रहा है, लेकिन असली परीक्षा जनता द्वारा इस विश्वास को चुनौती के रूप में स्वीकार करने और अपनी क्षमता सिद्ध करने की है।
भारत में न केवल अपने सच्चे गौरव के युग में प्रवेश करने की क्षमता है, बल्कि मानवता को उस युग में ले जाने की भी क्षमता है। हमारे पास एक योग्य, साहसी और निःस्वार्थ व्यक्ति का नेतृत्व है, लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि राष्ट्र जमीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि यहां के लोग राष्ट्र हैं। यह भारत के नागरिकों पर निर्भर है कि वे सुशासन और अवसर के मंच का उपयोग करके अपने इच्छित स्वर्णिम भविष्य का निर्माण करें। आइए, हम इसे संभव बनाएं!