टीवी सीरियलों में सास-बहू के रिश्तों को 'बदनाम' करने का ठीकरा जिस शख्स पर कभी फोड़ा जाता था, आज वही भारतीय समानांतर सिनेमा की नई उम्मीद बनकर उभरा है।
करीब पंद्रह वर्ष पहले के उस दौर को कोई भला कैसे भूल सकता है, जब आनंद गांधी इसलिए आलोचकों की नजर में चढ़े हुए थे, क्योंकि उन्होंने क्योंकि सास भी कभी बहू थी और कहानी घर-घर की जैसे धारावाहिकों की पटकथा लिखकर छोटे परदे का 'कलेवर' बदल दिया था।
और आज राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों द्वारा वह इसलिए सराहे जा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने शिप ऑफ थीसियस नामक फिल्म बनाई है। यह उनकी पहली फीचर फिल्म है, जिसे श्याम बेनेगल भारत की 'सबसे महत्वपूर्ण फिल्म' बता रहे हैं, तो अंतरराष्ट्रीय ब्रिटिश अखबार द इंडिपेंडेंट की नजर में यह 'मास्टर पीस' है। लेकिन आनंद गांधी तो इसे महज 'शुरुआत' बताते हैं।
शिप ऑफ थीसियस के पात्र रंगीन परदे पर पहचान के जिस यक्ष प्रश्न से जूझते हैं, आनंद गांधी ने उन्हीं सवालों को अब तक जीया है।
बचपन उनके लिए 'मैं कौन हूं', 'मेरा जन्म क्यों हुआ', जैसे सवालों से जूझने का था। इसकी वजह भी थी। दादी धार्मिक किस्म की थी और घर में साधु-संतों का आना-जाना लगा रहता था। इस माहौल का असर कुछ ऐसा हुआ कि 15 साल की उम्र में ही उन्होंने स्कूल छोड़ दिया, क्योंकि उन्हें लगता था कि बौद्धिक रूप से दिवालिया और खोखले शैक्षणिक संस्थानों का उनके वास्तविक विचारों से कोई मेल नहीं। इसी कड़ी में उन्होंने कभी जादूगर बनने का सपना देखा, कभी भौतिक विज्ञानी बनने का, तो कभी दार्शनिक बनने का। लेकिन यात्रा अब फिल्मकार बनकर पूरी होती दिख रही है।
आनंद हमेशा प्रयोगधर्मी रहे हैं। 'डेली शॉप' के लेखन से जब मन भर गया, तो सुगंधी जैसा नाटक भी उन्होंने लिखा, जिसे पुरस्कृत किया गया। और फिर बाद में कैमरा लेकर खुद मैदान में उतर गए।
शुरुआत 30 मिनट की लघु फिल्म राइट हेयर राइट नाऊ से हुई, जिसे खूब सराहा गया। आज जब फिल्मों में हर कथानक के लिए नारंगी, पीले और हरे रंगों का इस्तेमाल होता है, तब आनंद ज्यादातर नीले-भूरे रंग का इस्तेमाल करते हैं। अब उनकी चुनौती बॉलीवुड मसाला फिल्मों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने की है। लेकिन जैसा कि वह खुद कहते हैं, 'पेट खाली रहे, तो भला प्रयोग कैसे हो सकता!' इसलिए उनकी नजर ऐसे 'बाजार' पर है, जो वैचारिक फिल्मों का भी स्वागत करे।
हेमेन्द्र मिश्र