जब से कांग्रेस प्रवक्ता राज बब्बर, रशीद मसूद और केंद्रीय नवीन व अक्षय ऊर्जा मंत्री फारूख अब्दुल्ला ने हमें अविश्वसनीय सस्ते भोजन के बारे में बताया है, जिसमें उन लोगों ने कहा है कि कोई भी एक रुपये से लेकर 12 रुपये के बीच अपना पेट भर सकता है, तब से मेरी कुक तुलसी योजनाएं बनाने में व्यस्त है। हालांकि बब्बर और अब्दुल्ला अपने बयान पर खेद जता चुके हैं, लेकिन तुलसी का उत्साह ठंडा नहीं पड़ रहा है।
वह विभिन्न टीवी चैनलों के उन पत्रकारों के पीछे-पीछे जाना चाहती है, जो उस जादुई भोजन की खोज में फुटपाथ पर बिकने वाले खाने की दुकानों के चक्कर काट रहे हैं। वह बेहद लालसा के साथ सेलिब्रिटी टेलीविजन एंकरों की बात सुन रही है और पत्रकारों व देश भर के विभिन्न ढाबा मालिकों के बीच होने वाली बातचीत को नोट भी कर रही है। वैसे पांच रुपये और 12 रुपये में मिलने वाले खाने की तस्वीर बहुत कुपोषित है। इतनी कीमत देकर आप दो रोटी या एक पाव रोटी के तीन टुकड़े या सेब का एक टुकड़ा या अगर आप मुंबई में हैं तो बड़ा पाव का 40 फीसदी हिस्सा और अगर दिल्ली में हुए तो एक प्लेट छोले-कुल्चे का एक तिहाई हिस्सा ही प्राप्त कर सकते हैं।
रही बात तुलसी की, तो वह इस बात को लेकर दृढ़ निश्चय कर चुकी है कि अगर उसे मौका मिला तो वह मसूद से पुरानी दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके के उस नुक्कड़ के बारे में पूछेगी जहां पांच रुपये में भोजन मिलता है। उसके इस निश्चय ने मुझे एक असुरक्षित स्थिति में ला खड़ा किया है क्योंकि तुलसी का बनाया हुआ खाना मेरे परिवार और दोस्तों को बहुत पसंद है। हालांकि मैंने उससे कहा कि जब खाद्य कीमतें तेजी से भाग रही हैं और परिवार के बजट पर दबाव बढ़ रहा है, तब हम उसे हतोत्साहित नहीं करेंगे। वैसे माली हालत के आधार पर देखें तो तुलसी को दिल्ली के गरीबों में बेहद गरीब की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वह तीन घरों में पार्ट टाइम रसोइये का काम करती है।
उसका पति बढ़ई है, जिसकी कमाई अलग-अलग महीनों में अलग-अलग रहती है। दोनों मिलकर इतना कमा लेते हैं कि उन्हें भारत में गरीब के रूप में चिह्नित किए गए आधिकारिक वर्गीकरण से बाहर रखा जा सके। फिर भी सच्चाई यह है कि पांच सदस्यों वाले इस परिवार का भरण-पोषण मुश्किल होता जा रहा है। दो साल पहले जब गरीबी रेखा और गरीबों पर होने वाली चर्चा सुर्खियों में आई थी, तब उसने मुझे बताया था कि वह दुकानों पर बची-खुची सब्जियां ही खरीद पाती है क्योंकि वे सस्ती मिल जाती हैं। उस समय आधे सड़े हुए टमाटर पांच रुपये किलो के भाव थे। तब भी उसके परिवार के महीने भर के खाने-पीने का बजट 5000 से 7,000 रुपये के बीच आता था।
इस समय तो टमाटर और अन्य सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं। ऐसे में गरीबी रेखा के मामूली ऊपर-नीचे लड़खड़ाने वाले या फिर उससे थोड़ा ऊपर वाले लोगों के लिए एक अच्छे खाद्य मार्गदर्शक का होना जरूरी है। इसलिए बब्बर, मसूद और अब्दुल्ला हमें यह क्यों नहीं बता रहे हैं कि उन लोगों को कहां इतना सस्ता खाना मिल जाता है, ताकि तुलसी और हम सभी अपने पैसे बचा सकें?
एक टीवी पैनल की चर्चा के दौरान एक सेलिब्रिटी एंकर ने कांग्रेस प्रवक्ता संजय झा से पूछा कि क्या वह जानते हैं कि लोगों को पांच रुपये में एक बार का खाना कहां मिल सकता है? इस पर झा ने तुरंत यूपीए सरकार के प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून की गाथा सुनानी शुरू कर दी। यह सुनकर तुलसी बहुत ज्यादा भ्रमित हो गई। वह भरोसा नहीं कर पा रही है कि कब और कैसे यह कानून लागू होगा और लोग पांच रुपये और 12 रुपये में भोजन मिलने की बात क्यों कर रहे हैं, जब उन्हें खुद नहीं पता कि ऐसा खाना कहां मिलता है? मैंने उससे कहा, 'शायद संसद भवन की सब्सिडी वाली कैंटीन में ऐसा संभव हो, जो केवल मसूद जैसे लोगों के लिए ही है। यही वह जगह है जहां एक अंक वाली कीमत पर भोजन प्राप्त किया जा सकता है।'
भोजन को लेकर इस तरह की बयानबाजी जब सुर्खियां बन गईं, तो बवाल बढ़ता देख कांग्रेस अब अपने आपको इस मामले से दूर रखने का प्रयास कर रही है, लेकिन यह तूफान जल्दी थमता नहीं लगता। जैसा कि इससे पहले हो चुका है, विशेषज्ञ एक-दूसरे के तर्कों से पूरी तरह से असहमति ही जताएंगे। योजना आयोग ने हाल में कहा है कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या घटी है। देश की कुल आबादी में से 2004-05 में गरीबों की तादात 37.2 फीसदी थी, जो 2009-10 में कम होकर 29.8 फीसदी रह गई।
अब इसमें और गिरावट आई है, जिससे 2011-12 के दौरान देश में गरीबों का आंकड़ा 21.9 फीसदी था। यह भी उम्मीद करना बेकार है कि विशेषज्ञों के अलग-अलग धड़े गरीबी रेखा के फार्मूले पर एक जैसा विचार रखेंगे। इस मुद्दे पर जंग पहले ही शुरू हो चुकी है। संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने गरीबी मापने के योजना आयोग के तरीके को चुनौती दी है। इस बीच तुलसी उस रास्ते की भी तलाश में है जिसके जरिये वह एक सांसद बन सके और उसे भी उन कीमतों पर खाना मिल सके, जिसके बारे में मसूद, अब्दुल्लाह और बब्बर इतनी बातें कर कर रहे हैं।