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व्यक्तित्व ने मुद्दों को पीछे छोड़ा

Sun, 20 Apr 2014 06:39 PM IST
मार्क टुली
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इस लोकसभा चुनाव को खास कहा जा रहा है। लेकिन भारत के आम चुनाव के इतिहास को देखें, तो 1977 का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण कहा जा सकता है, क्योंकि वह कांग्रेस के खिलाफ गुस्से को लेकर था। 1999 का आम चुनाव भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली सरकार के गिरने के बाद हुए इस चुनाव में भाजपा के प्रति एक तरह की सहानुभूति थी और लोगों को लग रहा था कि यह पार्टी भी सरकार चला सकती है। 2014 के इस चुनाव में कुछ खास मुद्दे जरूर हैं, पर व्यक्तित्व ज्यादा अहम हो गया है। जिन मुद्दों के साथ पार्टियां चुनावी समर में उतरी हैं, उनकी धुरी भी कहीं न कहीं व्यक्ति केंद्रित हो रही है। एक तरफ भाजपा ने नरेंद्र मोदी को आगे किया है, दूसरी तरफ कांग्रेस और दूसरी पार्टियां भाजपा से ज्यादा मोदी पर प्रहार करती हैं। ऐसे माहौल में अक्सर यह सुनने को मिल रहा है कि कोई लहर चल रही है। भारतीय राजनीति का विवेचन करेंगे, तो यही पाएंगे कि आखिरी लहर 1984 में चली थी।
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इस बार व्यक्ति केंद्रित राजनीति का खास पहलू नजर आता है, तो यही कि लोग कहीं न कहीं बदलाव चाहते हैं। भ्रष्टाचार, महंगाई से त्रस्त लोगों के बीच जब मोदी कह रहे हैं कि वह बदलाव लाएंगे, तो उस अपील को सुना जा रहा है। यह अपील इतने सुव्यवस्थित ढंग से की गई है कि चुनाव मुद्दों से ज्यादा व्यक्ति प्रधान हो गया है। चुनाव के परिणाम पर पहले कुछ नहीं कहना चाहिए। खासकर तब, जब चुनाव की पूरी प्रक्रिया में करीब एक महीने का समय और बचा हो। पर जो बात साफ है, वह यही कि कांग्रेस बहुत कमजोर हो चुकी है। बीते पांच वर्षों में जो घटता रहा, कांग्रेस उसके चलते ही कमजोर नहीं हुई, बल्कि इस पार्टी का सहयोगी दलों के साथ तालमेल भी ठीक तरह से नहीं रहा।

बिहार में लालू प्रसाद के साथ गठबंधन इसके फायदे में नहीं दिखता। गलत साथी चुनने के बजाय पार्टी को नीतीश कुमार के साथ दिखना चाहिए था। तमिलनाडु में कांग्रेस वहां की दोनों पाटिर्यों को लेकर दिग्भ्रमित रही। आंध्र में उसका पासा गलत चला गया। जिस तेलंगाना पर दांव लगाया, वही दांव उलट गया। उत्तर प्रदेश में दूर-दूर तक कोई साथी नहीं है। पश्चिम बंगाल में वह कहीं दृश्य में नहीं है, हालांकि उसे कुछ सीटें मिल सकती हैं। इन तमाम विपरीत स्थितियों के बाद कांग्रेस के पास केवल यही कहने के लिए बचता है कि 'मोदी देश को तोड़ देंगे'। जब आप इस तरह लड़खड़ा रहे हों, तो यह बात लोगों के गले नहीं उतरती। कांग्रेस खुद को ठीक से धर्मनिरपेक्ष भी साबित नहीं कर पा रही। ऐसे में यही माना जा रहा है कि वह हारी हुई लड़ाई लड़ रही है। जब कांग्रेस ने मोदी को केवल सांप्रदायिकता के आधार पर घेरना चाहा, तो उसका संकेत यही गया कि कांग्रेस विकास पर नहीं, पुराने मुद्दों पर ही बात करना चाहती है। इससे कांग्रेस की नकारात्मक छवि बनती गई। वहीं मोदी और उनके रणनीतिकारों ने अपनी बहस को ज्यादा पैनेपन से विकास पर साधकर रखा है।
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हालांकि भ्रष्टाचार को महज कांग्रेस के साथ जोड़कर देखना भी अपने नजरिये को सीमित करना है। भाजपा भी इस मामले में कम नहीं है। दस साल बाद लोग बहुत कुछ भूल जाते हैं। भाजपा शासन भी भ्रष्ट था, लेकिन चर्चा कांग्रेस के व्यवहार की होती है। हुआ यही कि कांग्रेस के समय भ्रष्टाचार के साथ-साथ नेताओं का आचरण और अहंकार जनता में नाराजगी के कारण बने। अन्ना हजारे के आंदोलन ने इस अभिव्यक्ति को एक मंच दे दिया। भाजपा के यह सबसे ज्यादा काम आया और लगने लगा कि कांग्रेस शासन भ्रष्टाचार का पर्याय बन गई है।

चुनाव की इस घड़ी में दो किताबों की भी खास चर्चा है। भारत का जनमानस इन किताबों से उद्वेलित हो जाएगा, ऐसा नहीं लगता। खासकर तब, जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। यूरोप में तो इस तरह के वाकये खूब होते हैं। मुझे नहीं लगता कि पूर्व कोयला सचिव पी सी पारेख ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ कुछ लिखा है। बल्कि उन्होंने तो अपनी किताब क्रूसेडर ऐंड कांस्पिरेटर में अपने कामकाज की सहूलियत की वजह से मनमोहन सिंह की तारीफ ही की है। जहां तक संजय बारू की किताब की बात है, तो यह समझना चाहिए कि 2009 के चुनाव को कांग्रेसी मनमोहन सिंह का चुनाव कहते थे। स्थितियां दो-तीन वर्ष में बिगड़ीं और इसके लिए केवल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी या प्रधानमंत्री को जिम्मेदार नहीं कह सकते। बल्कि स्थितियों को इस हालत में लाने के लिए कुछ आला मंत्रियों और संगठन के कुछ लोगों की भूमिका को भी देखा जाना चाहिए। प्रशासन और संगठन के बीच भी सब कुछ ठीक नहीं रहा।

2014 के चुनाव को लेकर तमाम बहसों के बीच यह जरूर देखने में आया है कि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का महत्व अभी बना हुआ है। उत्तर प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, बिहार, आंध्र प्रदेश-हर राज्य में इनकी अपनी जड़ें जमी हुई हैं। यह अलग बात है कि क्षेत्रीय दलों में भी आपसी प्रतिद्वंद्विता चरम पर रहती है। पर इनका वजूद अभी रहेगा। आधुनिक संचार क्रांति में केवल बड़े राजनीतिक दलों को ही सहूलियत नहीं होती, क्षेत्रीय दल भी उसका अपने लिए ठीक उपयोग कर पा रहे हैं। राजनीति का यह दौर पोस्टर बैनर पर ही नहीं टिका है। ट्वीटर के जरिये पल भर में छा जाने और प्रभाव छोड़ने की प्रवृति संवादहीनता भी बढा रही है। भारत की राजनीति में संवाद का महत्व बढ़ा है। इसी संवाद ने आम आदमी पार्टी को भी जन्म दिया है। इस पार्टी को चर्चा में रहना आता है, लेकिन उसे कसौटी पर कसा जाना बाकी है।
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