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सुधरो या थप्पड़ के लिए तैयार रहो

Sun, 07 Dec 2014 04:06 PM IST
कुमार प्रशांत
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यह पूछा तो जा ही सकता है कि कोई सभ्य-सुसंस्कृत समाज थप्पड़ों तक जाए ही क्यों? अगर थप्पड़ों का ही समाज बन जाए, तो क्या बनेगा और क्या बचेगा? कोई संघ परिवारी होगा, तो पलट कर यह भी पूछेगा कि फिर भारतीय संस्कृति का क्या होगा? और फिर यह भी कि अगर थप्पड़ों की ही चली है, तो फिर कहां वह महात्मा गांधी रहेंगे, जो एक गाल पर थप्पड़ के सामने दूसरा गाल आगे करने को कहते थे? मैं ये सारे सवाल सुन रहा हूं, फिर भी उन दो थप्पड़ों के साथ खड़ा हूं, जिनमें से एक हरियाणा रोडवेज की चलती हुई बस में रोहतक में चला और दूसरा मुंबई के गोरेगांव की फिल्म सिटी में!
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रोहतक की बस में दो बहनों ने उन युवकों की पिटाई की, जिन्होंने उनसे बदतमीजी की थी और विरोध करने पर उनकी पिटाई करने भी टूट पड़े थे। वे लड़के भी हमला करने से नहीं चूक रहे थे, लेकिन लड़कियां थीं कि कुछ भी मानने-सुनने और डरने को तैयार नहीं थीं। थप्पड़बाजी के इस युद्ध में वे जीत गईं। हारा कौन? वे गुंडे लड़के तो हारे ही, इन लड़कियों ने गूंगे-बहरे और अंधे समाज को भी हरा दिया। इन लड़कियों ने हराया हरियाणा रोडवेज के उन सारे अधिकारियों को, जो अपनी कुर्सियों से भी बौने हैं; उन लड़कियों ने ऐसी हर बस के कंडक्टर-ड्राइवर को हराया, जो हर यात्री की सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी नहीं मानते; और इन लड़कियों ने हराया हरियाणा की नई-नवेली मनोहरलाल खट्टर सरकार को, जिसे बड़े धूमधाम से नरेंद्र मोदी ने गद्दीनशीन किया है। यह थप्पड़ किसी व्यक्ति के गाल पर नहीं, लड़कियों को दोयम दर्जे का मानने वाली मानसिकता पर पड़ा है।

विगत अक्तूबर में मनोहरलाल खट्टर ने कहा था कि लड़कियों को अच्छी तरह कपड़े पहनने चाहिए, ताकि लड़के आपा न खो दें! उन्होंने कहा था कि खाप प्रथा के कारण कितने ही बलात्कार टलते आए हैं। उन्होंने यह कहा था कि आजादी की भी कोई सीमा तो होनी चाहिए! कोई उनसे पूछे कि राजनीतिज्ञों की जड़ता-मूर्खता को सहने की भी कोई सीमा होनी चाहिए या नहीं? हम चाहें, तो खट्टर साहब की जगह मुलायम सिंह यादव का नाम रख दें। जब पूरा पुरुष समाज औरत के अस्तित्व को खेलने और खारिज करने की चीज बना दे, तब हम सिर्फ औरत समाज से ही सौजन्यता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
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दूसरा थप्पड़ फिल्मों में अपनी जगह बनाने में लगी और भटकती गौहर खान को लगा है। रियलिटी शो के नाम से इन दिनों जैसी गंदगी परोसी जा रही है, वैसा ही एक शो फिल्म सिटी में इंडियाज रॉ स्टार नाम से फिल्माया जा रहा था। यह बंद स्टूडियो में की जा रही किसी फिल्म की शूटिंग नहीं थी, बल्कि एक खुला आयोजन था, जिसमें गौहर एकदम खुले कपड़ों में मौजूद थीं।

जिस अकिल मलिक ने गौहर को मंच पर जाकर थप्पड़ मारा, वह थप्पड़ मारने का अधिकारी था या नहीं और उसने गौहर से  बदतमीजी भी की या नहीं, यह सब विवाद का विषय बनता ही है। लेकिन शरीर को अपने व्यापार का साधन बनाने के क्रम में आज लड़कियां जिस हद तक जा रही हैं, वह उन्हें सरेआम रोज ही थप्पड़ मार रहा है, क्या यह हम नहीं देख पा रहे हैं?

यह अकिल मलिक का दिशाहीन गुस्सा हो सकता है, पर यह मेरी तरह के लोगों के लिए चेतावनी देने का तरीका भी हो सकता है। आखिर लड़कियां क्या करें, यदि समाज में चौतरफा गूंगापन छा जाए? वह तो करें ही, जो रोहतक की दोनों लड़कियों ने किया! और समाज क्या करे, यदि लड़कियां विवेकहीनता से बाज न आएं? दोनों स्तरों पर बनी दिशाहीनता का फायदा बाजार उठा रहा है और हम अपनी-अपनी सलीबें उठाए एक-दूसरे पर वार कर रहे हैं। ये दोनों थप्पड़ गुस्से के नहीं, प्रतिकार के थप्पड़ हैं और प्रतिकार करना हमेशा स्वस्थ नजरिया विकसित करता है।
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