जर्मनी में सत्तारूढ़ सोशल डेमोक्रैट्स ने अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) की तुलना में बहुत खराब प्रदर्शन किया है। अन्य जगहों पर दक्षिणपंथ को मामूली बढ़त मिलने के बावजूद यूरोप ने खुद को पूरी तरह से उग्र दक्षिणपंथ के हवाले कर दिया हो, ऐसा नहीं है। अभी तक तो नहीं। फिर भी महाद्वीप की लोकप्रिय पसंद यानी उग्र दक्षिणपंथ उदारवादी व्यवस्था की कमजोरी और जन असंतोष को समझने में उसकी विफलता को दिखा रही है। आधुनिक फ्रांस का मूल कहे जाने वाले अति राष्ट्रवादियों यानी ली पेन के उत्तराधिकारियों ने मैक्रों के मध्यमार्गी पुनर्जागरण पर विजय हासिल कर उदात्त उदारवाद द्वारा निर्मित आदर्श को तो खंडित किया ही है, एक अस्थिर राष्ट्र को थामे रखने वाले 'मूल निवासियों' की उग्र भावनाओं को भी उजागर किया है। जर्मनी में उग्र दक्षिणपंथ अपराध-बोध की उत्तर-नाजी राजनीति द्वारा संस्थागत रूप से वर्जित राष्ट्र का प्रतिरूप है। उग्र दक्षिणपंथियों के लिए अपराध-बोध को साझा करने से इन्कार करना हिटलर के निरंकुश नेतृत्व का समर्थन नहीं है, यह एक क्रूर इतिहास से उधार ली गई नफरत के बोझ के बिना राष्ट्र की ओर वापसी है।
हंगरी और पोलैंड पहले से ही पुनर्जीवित राष्ट्रवादियों के चंगुल में हैं। उदारवादियों की चिंताएं दक्षिणपंथी आक्रोश की तरह ही बढ़ी हुई हैं। इस स्थिति की सबसे स्पष्ट व्याख्या बौखलाए हुए उदारवादियों व मध्यमार्गियों की तरफ से मिलती है, जो पूरा दोष लोगों पर मढ़ देते हैं कि आज लोग यही सब पसंद कर रहे हैं। विचारधाराओं के मलबे से उपजे राजनेताओं पर यह विचार बिल्कुल सटीक बैठता है, जो थके हुए वाम व दक्षिणपंथी अभिजात्यवाद द्वारा त्यागे गए लोगों के डर का फायदा उठाते हुए राष्ट्र की मुक्ति को लेकर एक नए किस्म के मसीहावाद की छवि गढ़ रहे हैं। पश्चिमी उदारवादी इस तथ्य से इन्कार करते हैं कि वे उस समाजशास्त्र के सह-लेखक हैं, जिसने कथित लोकप्रिय लहर को बढ़ावा दिया है। जैसे-जैसे उत्तर-वैचारिक दुनिया में ‘वर्ग’ राजनीतिक विवाद के रूप में फिर से उभरा, अभिजात वर्ग के खिलाफ नाराजगी अनिवार्य हो गई।
यह अभिजात वर्ग, चाहे वह वामपंथी हो या दक्षिणपंथी, सत्ता में इस कदर मशगूल था कि वह स्थायी प्रतिष्ठान के खिलाफ भौगोलिक ताकत को महसूस ही नहीं कर पाया। जब ब्रेग्जिट ने एकीकृत यूरोप की कमजोरी को उजागर कर दिया, तो मूल निवासियों के बदला लेने का क्षण आ गया। जब इंग्लैंड ने अंग्रेज होने के अपने सुकून को वापस पा लिया, तो यह विचार और संस्कृति के मामले में यूरोप को खारिज करना नहीं था, बल्कि ब्रुसेल्स स्थित पोलित ब्यूरो को जवाब देना था। बाद में डोनाल्ड ट्रंप ने तो नीचे से ऊपर उठने वाले नाराज राष्ट्रों के आख्यान को बढ़ावा ही दिया।
यूरोपीय राष्ट्रवादियों ने पहले ही शिकायत एवं गर्व की राजनीति को सामान्य बना दिया है। हंगरी और पोलैंड जैसे दो उत्तर-साम्यवादी समाजों में सत्ता में आने के बाद, जहां स्वाभाविक तौर पर स्वतंत्रता को उदारवाद के विपरीत माना जाता था, कट्टरपंथी राष्ट्रवादियों ने राजनीति को एक सांस्कृतिक खोज बना दिया। और जहां भी उनका संघर्ष सत्ता के विरुद्ध था, उन्होंने राष्ट्र के रक्षक की भूमिका निभाई, जबकि उदार अभिजात वर्ग लगातार निराशा फैला रहा था, जैसा कि फ्रांस और जर्मनी में हुआ।
इसके अतिरिक्त, अप्रवासन एक ऐसा मुद्दा है, जिसका दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। एक तर्क और आदर्श के रूप में, राष्ट्र के लिए एक खतरे के रूप में और एक ऐतिहासिक स्मृति के प्रति कृतज्ञता के रूप में अनियंत्रित अप्रवासन एकमात्र ऐसा मुद्दा है, जो आज पश्चिम में किसी का राजनीतिक भाग्य बना या बिगाड़ सकता है-चाहे वह वामपंथी हो, उदारवादी हो या रूढ़िवादी हो। यूरोपीय संसद के चुनावों में उग्र दक्षिणपंथियों ने उदारवादियों और मध्यमार्गियों से अवैध या वैध अप्रवासन के लिए स्पष्टीकरण मांगा। यह उस पुराने सवाल की वापसी है कि हम कौन हैं? उग्र दक्षिणपंथ की ओर से प्रतिशोध के साथ आया यह सवाल उदारवादी व्यवस्था को एक सहज सहमति में बदलने वाली हर चीज को पुनर्मूल्यांकन के योग्य बनाता है। यदि पश्चिम के सांस्कृतिक निर्माण को अप्रवासन की कहानी के बगैर नहीं समझा जा सकता है, तो बहुसंस्कृतिवाद की इसकी स्वीकार्यता को इसकी अपनी संस्कृति में विश्वास के रूप में देखा जाता है। आज उदार आदर्शवाद को उन राष्ट्रों द्वारा चुनौती दी जा रही है, जिनका पुनर्जन्म दक्षिणपंथी कट्टरता के बल पर हुआ है। घर एक अटूट सांस्कृतिक वक्तव्य है और अब लोग इसका अर्थ समझने लगे हैं।
रूढ़िवादियों के लिए भी यह बेहद जरूरी है। आखिरकार, उदारवादी होने का अर्थ अनिवार्य रूप से वामपंथी या प्रगतिशील होना नहीं है। नवंबर में ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने और सुनक के जुलाई में हारने की संभावना हमारे समय की रूढ़िवादी कहानी के दो बिल्कुल अलग नजरिये को बयां करती है। अटलांटिक के एक तरफ दक्षिणपंथी बहुत नीचे से आने वाली फुसफुसाहटों को सुनते हैं, तो दूसरी तरफ रूढ़िवादियों ने जनादेश को बर्बाद करने की कला में महारत हासिल कर ली है, जिसे ब्रेग्जिट वोट में बेहद दुस्साहसपूर्वक नवीनीकृत किया गया था।
फिर भी ये उदारवादी ही हैं, जो केंद्र में फंसे हैं, उन्हें अपनी घबराहट से छुटकारा पाकर राष्ट्र से संवाद करना सीखने की जरूरत है। उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है, सिवाय अपनी अप्रमाणिक दलीलों के।