करीब 25 साल पहले जब किसानों के सैलाब के साथ चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत मेरठ के सीडीए मैदान में धरने पर थे, तब मंच से हर हर महादेव के नारे का जवाब किसान अल्लाहो अकबर से और अल्लाहो अकबर का जवाब हर हर महादेव के नारे से देते थे। मंच के ही पास हुक्का पीते टिकैत मुस्कराते हुए हम पत्रकारों से पूछते थे कि अब इन नारों से दंगा क्यों नहीं होता। फिर खुद ही जवाब देते थे कि यहां जो आए हैं, वे हिंदू या मुसलमान नहीं, सिर्फ किसान हैं।
यह वह दौर था, जब कुछ ही महीने पहले मेरठ शहर भयानक दंगों के दौर से गुजर चुका था। तब भारतीय किसान यूनियन की मेहनत ने नफरत की आग पर पानी डाला था। टिकैत से पहले चौधरी चरण सिंह इस इलाके में हिंदू-मुस्लिम किसानों का राजनीतिक गठजोड़ बनाकर उन्हें सियासी ताकत बना चुके थे।
आज उन्हीं चरण सिंह और टिकैत की कर्मस्थली शामली और मुजफ्फरनगर में हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का ताना-बाना बिखर गया है। जहां ढाई दशक पहले एक गरीब मुस्लिम लड़की नईमा की जान और आबरू बचाने के लिए जाति-मजहब भूलकर हजारों किसान भोपा में नहर के किनारे चालीस दिनों तक बैठे रहे थे, जहां बिजली की बढ़ी दरों के खिलाफ कर्मूखेड़ी बिजली घर पर प्रदर्शन करते हिंदू-मुस्लिम किसानों ने एक साथ लाठी-गोली झेली थी, जिस शामली, मेरठ, भोपा और मुरादाबाद के रजबपुर के किसानों की एकजुट ताकत ने सत्ता को कई बार हिलाया, आज उसी धरती पर किसान हिंदू और मुसलमान में कैसे बंट गए हैं!
आजादी के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिसंख्य शहरों में मुसलमान कांग्रेस को वोट देते थे, लेकिन ग्रामीण इलाके में मुसलमानों और जाट किसानों का गठजोड़ चरण सिंह की राजनीतिक ताकत था। वर्ष 1989 में कांग्रेस के खिलाफ इसी जनाधार ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को ताकत दी।
तब कश्मीर से आए मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कांग्रेस के धर्मवीर त्यागी को मुजफ्फरनगर में हरा दिया था और मेरठ में मुसलमानों की बहुतायत के बावजूद कद्दावर केंद्रीय मंत्री मोहसिना किदवई हरीश पाल सिंह से हार गई थीं। सहारनपुर में रशीद मसूद, कैराना में हरपाल पवार, बागपत में अजित सिंह, गाजियाबाद में केसी त्यागी, आगरा में अजय सिंह और अलीगढ़ में सत्यपाल मलिक की जीत इसी किसान गठजोड़ से मुमकिन हुई थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में हिंदुत्ववादियों से लेकर मुस्लिम लीगियों तक की दाल किसानों के बीच कभी नहीं गली।
विश्व हिंदू परिषद के अयोध्या आंदोलन और 1989 के लोकसभा चुनाव में जनता दल के साथ बनी सहमति के जरिये भाजपा ने इस इलाके में प्रवेश पाया। मंडल आयोग की सिफारिशों के खिलाफ जाटों के गुस्से का फायदा भाजपा को मिला। इस वोट बैंक को पक्का करने के लिए भाजपा ने कई प्रयोग किए।
मसलन, 1998 में बागपत से भाजपा के सोमपाल शास्त्री के हाथों अजित सिंह को भी हारना पड़ा। उसी दौर में भाजपा ने भी साहिब सिंह वर्मा को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाकर जाट वोटों का दांव चला। लेकिन अजित सिंह की हार और साहिब सिंह वर्मा की दिल्ली की गद्दी से विदाई ने जाटों का भाजपा से मोहभंग किया। मुलायम सिंह तमाम प्रयासों के बावजूद इस इलाके में जड़ें नहीं जमा पाए। यहां यादवों की कम आबादी की वजह से मुसलमानों के लिए भाजपा के खिलाफ लोकदल के जाट या बसपा के दलित जनाधार के साथ गठजोड़ करना ज्यादा मुफीद होता है।
लेकिन अब इस इलाके में फैली सांप्रदायिक आग ने सामाजिक ताने-बाने के साथ यहां के राजनीतिक समीकरणों को भी छिन्न-भिन्न कर दिया है। भाजपा खुश हो सकती है कि मुस्लिम के खिलाफ जाटों का एकमुश्त समर्थन उसे मिल सकता है और सपा संतोष कर सकती है कि इससे अजित सिंह का जाट-मुस्लिम जनाधार तितर-बितर हो गया।
बसपा इन दंगों के बाद अपने दलित जनाधार के साथ मुस्लिमों को एकजुट होते देख सकती है, तो कांग्रेस सोच सकती है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुसलमानों के सामने अब कांग्रेस ही एक विकल्प बचेगी। लेकिन इन दंगों ने नफरत की जो दीवार खड़ी की है, वह तो तभी टूटेगी, जब फिर कोई गांधी, चरण सिंह या टिकैत आगे बढ़कर संप्रदाय और फिरकों में बंट गए इन लोगों को किसान और इन्सान बना दे।