अगर आप किसी गुफा में नहीं रह रहे हैं, जहां इंटरनेट की कनेक्टिविटी नहीं है, तो आप इस खबर से अनजान नहीं हो सकते, जिसने कमोबेश हम सभी को प्रभावित किया है। सोशल मीडिया का मंच फेसबुक, जिसके जरिये हम अपने दोस्तों और परिजनों के संपर्क में रहते हैं, इन दिनों गहन निगरानी के दायरे में है। दुनिया के तीन सर्वाधिक प्रसिद्ध अखबार-द न्यूयॉर्क टाइम्स, द गार्जियन और द ऑब्जर्वर में प्रकाशित खबरों ने यह खुलासा किया है कि एक अंतरराष्ट्रीय डाटा कंसल्टेंसी कंपनी कैंब्रिज एनालिटिका ने, जो उपभोक्ताओं के व्यवहार बदलने में व्यावसायियों और राजनीतिक दलों की मदद करता है, करोड़ों फेसबुक उपयोगकर्ताओं के डाटा पर हाथ साफ किया है।
ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि फेसबुक ने सॉफ्टवेयर डेवलपर्स को ऐसा 'ऐप' बनाने की अनुमति दी थी, जो उपयोगकर्ता के संपूर्ण नेटवर्क के बारे में जानकारी एकत्र कर सकती थी। इसने कई देशों में कथित रूप से चुनावों को प्रभावित करने में भी भूमिका निभाई। कैंब्रिज एनालिटिका की भूमिका भारत में भी संदिग्ध है, आरोप लग रहे हैं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के दलों ने चुनावी उद्देश्य के लिए इसका इस्तेमाल किया।
आखिर इसका हमारे और आपके जीवन के साथ क्या संबंध है? इसका संक्षिप्त उत्तर है-बहुत ज्यादा। भारत में सोशल मीडिया की पहुंच अपेक्षाकृत कम है, देश की कुल आबादी का करीब बीस फीसदी हिस्सा ही फेसबुक का इस्तेमाल करता है और इस देश में अब भी दसियों हजार गांव ऐसे हैं, जहां बिजली नहीं पहुंची है। लेकिन फेसबुक उपयोगकर्ताओं की संख्या भारत में 24 करोड़ की सीमा को पार कर चुकी है और आज फेसबुक के सबसे ज्यादा उपयोगकर्ता भारत में ही हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप जैसे अन्य सोशल मीडिया फ्लेटफार्मों पर बहुत बड़ी संख्या में लोग चौबीसों घंटे आभासी साझाकरण मोड में आ गए हैं। डाटा सुरक्षा को लेकर हमारे यहां जागरूकता का बिल्कुल अभाव है। वे सभी चीजें हम अपने उन आभासी मित्रों के साथ साझा करते हैं, जिनमें से कुछ के साथ हम सिर्फ एक बार मिले हैं या कभी नहीं मिले हैं। जाहिर है, ऐसे में कोई तीसरा पक्ष इन चीजों का इस्तेमाल कर ही सकता है। नए फेसबुक एकाउंट में गोपनीयता संबंधी सेंटिंग में डिफॉल्ट आपके मित्र को आपकी कुछ जानकारियां तीसरे पक्ष के ऐप के साथ साझा करने का मौका देती है और संभव है कि आपको या आपके मित्र को इसकी कोई सूचना न हो कि क्या हो रहा है। और साझा किए गए डाटा आपके प्रोफाइल पोस्टों से परे जाता है, जिसमें आप कब लॉग ऑन रहते हैं इसकी जानकारी के साथ मित्रों की सूची के विवरण भी शामिल होते हैं।
फिलहाल सबका ध्यान फेसबुक पर केंद्रित है, लेकिन बुनियादी टेम्प्लेट (ढांचा) सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लागू होता है। अपने पुराने मित्रों और परिवार के साथ वास्तविक समय बिताने के बजाय जब आप जान-बूझकर या गलती से अपनी छुट्टी की अंतरंग जानकारियां साझा करते हैं, कि आपने दोपहर में क्या खाया, आप किससे मिले, आप काम करने के लिए कहां जाते हैं, आप किस होटल में ठहरे हैं, तो आप वास्तव में डाटा-व्यवसाय के एक बड़े खेल में खुद को मोहरा बनाकर पेश करते हैं।
इसके कई परिणाम होते हैं। पहली बात तो यह कि अगर आप आभासी दुनिया के किसी मित्र पर ज्यादा समय खर्च करते हैं, तो आपके वास्तविक जीवन के संबंध प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी बात यह कि जीवन में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि को आप भले मुफ्त समझते हों, लेकिन ये भी वास्तव में मुफ्त नहीं हैं। उनका व्यावसायिक मॉडल उन सभी सूचनाओं का उपयोग करता है, जिन्हें आप और हम, अपने, हमारे मित्रों, परिवारों के बारे में मुफ्त में डाल रहे हैं। यह डाटा बन जाता है और संभावित रूप से व्यावसायिक एवं अन्य उद्देश्यों के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। अथवा जैसा कि किसी ने कहा है, यदि आप उत्पाद के लिए भुगतान नहीं कर रहे हैं, तो आप उत्पाद हैं।
तो क्या इसका मतलब यह है कि हम अपना मोबाइल और इंटरनेट बंद कर दें और उन दिनों में पहुंच जाएं, जब कोई आभासी बातचीत या दोस्ती नहीं होती थी? बिल्कुल नहीं। हालांकि मोबाइल और इंटरनेट बंद कर देने को नई पीढ़ी किसी दूरस्थ पहाड़ी गुफा में छिपने के समान ही समझेगी, जहां कोई कनेक्टिविटी नहीं होती।
फेसबुक को लेकर चल रहे इस विवाद का एक महत्वपूर्ण सबक यह है कि हम सतर्क रहें और हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि सोशल मीडिया पर हम क्या साझा कर रहे हैं और उसके संभावित असर क्या होंगे। और हमेशा इस बात को लेकर जागरूक रहें कि ऐसी एजेसियां भी हैं, जो आपको प्रभावित करने की कोशिश करेंगी तथा आपको एक निश्चित तरीके से सोचने और कार्य करने के लिए विवश करेंगी। यही नहीं, ये एजेंसियां आपके बारे में छोटी से छोटी जानकारियां हासिल करने के लिए भी काफी मेहनत कर रही हैं।
डाटा एक नया ईंधन है-इस बात को अपने संबंध में जानकारी साझा करते वक्त कभी न भूलें। हमें सूचना के वैश्विक आदान-प्रदान से काफी फायदा होता है, जिसे फेसबुक और अन्य इंटरनेट फ्लेटफार्म संभव बनाते हैं। लेकिन याद रखने की जरूरत है कि ये प्लेटफार्म पहले की तुलना में हमारे बारे में बहुत कुछ जानते हैं-हमारे करीबी दोस्त कौन हैं- से लेकर हम सोशल मीडिया पर कौन-सी टिप्पणी करते हैं, हम कौन-सी खबर पढ़ते हैं, कौन-सा पेज हम पसंद करते हैं तथा और भी बहुत कुछ। जैसा कि टेक्नोलॉजी गुरु विवेक वधावा हमें याद दिलाते हैं कि प्रौद्योगिकी से अद्भुत चीजें संभव हैं, लेकिन इसका एक स्याह पहलू भी है। हमें इसके जोखिम और लाभ के बीच संतुलन बिठाना है।