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ग्रीस को उबरने का मौका दीजिए

Sat, 31 Jan 2015 10:57 PM IST
पॉल क्रुगमैन
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यूरो संकट शुरू होने के बाद के पांच वर्षों के हालात पर नजर डालें, तो हर ओर अस्पष्टता ही दिखती है, जिसे अब खत्म हो जाना चाहिए। दरअसल ग्रीस में आए हालिया बदलावों ने यूरोप के लिए एक बुनियादी चुनौती पेश की है। सवाल उठता है कि क्या वह सभी मिथकों को तोड़ते हुए हकीकत का सामना कुछ इस ढंग से करने को तैयार है, जिससे महाद्वीप के बुनियादी मूल्यों की रक्षा की जा सके। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो इसका खामियाजा पूरी यूरोपीय परियोजना और साझा समृद्धि के जरिये शांति व लोकतंत्र को कायम रखने के विचार को भुगतना पड़ेगा। आखिर ये कौन-से मिथक हैं? बहुत-से लोगों का मानना है कि यूरो संकट टलने के बाद से एथेंस को जो कर्ज मुहैया कराया जा रहा है, वह उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है। मगर सच्चाई कुछ और है। ग्रीस को मिलने वाले कर्ज का एक बड़ा हिस्सा दूसरे कर्जों और उनके ब्याज को निपटाने पर ही खर्च हो जाता है। पिछले दो वर्षों से यही हो रहा है। ग्रीस की सरकार अपने लोगों पर जितना खर्च करती है, उससे कहीं ज्यादा राजस्व इकट्ठा करती है, ताकि कर्जदाताओं को शांत रखा जा सके। फिलहाल यूरोपीय नीति को कुछ इस तरह समझा जा सकता है कि वह ग्रीस को संकट से उबारने के बजाय, कर्जदाता देशों के बैंकों को मुनाफा पहुंचाने पर ज्यादा फोकस है। इस पूरी प्रक्रिया में ग्रीस की सरकार बिचौलिये से ज्यादा कुछ नहीं, और वहां के खस्ताहाल लोगों को और ज्यादा त्याग करना पड़ेगा, ताकि उनका देश संकट से उबर सके।
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लिए गए कर्ज को चुकाने में ग्रीस को जो खर्च करना पड़ रहा है, उसमें कटौती वहां की नवनिर्वाचित सरकार जरूर चाहेगी। अफसोस की बात है कि इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही कि वहां की सरकार जितना कमा रही है, उससे कई गुना ज्यादा कर्ज के भुगतान पर खर्च कर रही है। इस मुद्दे पर स्पष्ट चर्चा होने के बाद ही यह नतीजा निकलने की उम्मीद हो सकती है कि ग्रीस को ब्याज के भुगतान पर कम और स्वास्थ्य व गरीबों के कल्याण पर ज्यादा खर्च करना चाहिए। ऐसा होने पर ही ग्रीस की 25 फीसदी की बेरोजगारी दर में कमी लाना मुमकिन हो सकेगा। ऐसे में, सवाल उठता है कि जो कर्ज खुद ग्रीस की सरकार ने लिया है, क्या उसे चुकाने की नैतिक जिम्मेदारी उसकी नहीं होनी चाहिए। यह सच है कि ग्रीस की, खासकर, 2004-09 के दौरान सत्ता संभालने वाली दक्षिणपंथी रुझान वाली मध्यमार्गी, सरकार ने जर्मनी समेत तमाम देशों के बैंकों से काफी तादाद में कर्ज लिया। बेहतर होगा, कि इस पूरी कहानी में होने वाले नुकसान को कर्ज लेने वाले, और देने वाले, दोनों पक्ष बांट लें। निजी कर्जदाताओं का ज्यादातर कर्ज चुकाने के बावजूद ग्रीस से उम्मीद की जा रही है कि वह लगातार भुगतान करता रहे। वर्तमान हालात यह हैं कि कोई भी मानने को तैयार नहीं कि ग्रीस अपने सारे कर्ज चुका सकता है।

तो फिर क्यों न इस हकीकत को स्वीकार लिया जाए, ताकि भुगतान राशि में कटौती करते हुए ग्रीसवासियों के अंतहीन दिख रहे कष्टों को दूर किया जा सके? अगर ऐसा नहीं किया जाता है, और उद्देश्य बस यही है कि ग्रीस को कर्जदाताओं के लिए एक मिसाल बनाया जा सके, तो फिर संप्रभु और लोकतांत्रिक देशों के समूह से जुड़े मूल्यों का क्या? ग्रीस को कर्ज मुहैया कराने वालों की ताकत को देखते हुए मूल्यों का सवाल कुछ अजीब लगता है। अगर यह केवल सरकारी वित्त से जुड़ा मसला होता तो ग्रीस बेहद आसानी से खुद को दिवालिया घोषित कर सारे झंझटों से निजात पा जाता। ग्रीस की असल परेशानी वहां के कमजोर बैंक हैं, जो पूरे यूरो क्षेत्र के बैंकों की तरह फिलहाल यूरोपीय केंद्रीय बैंक से कर्ज ले रहे हैं। अगर इस कर्ज को रोका गया, तो ग्रीस का पूरा बैंकिंग तंत्र लड़खड़ा जाएगा। ग्रीस के लिए जरूरी है कि केंद्रीय बैंक की साख बनी रहे, जो कि आखिरकार जर्मनी और दूसरे कर्जदाता देशों के नजरिये पर भी निर्भर है। मगर सवाल यह है कि क्या जर्मनी अपने सहयोगी यूरोपीय लोकतंत्र से यह कहने को तैयार है, 'भुगतान करो, वरना हम तुम्हारे बैंकिंग तंत्र को तहस-नहस कर देंगे?'
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अब जरा सोचिए, क्या होगा, अगर ग्रीस की नवनिर्वाचित सरकार इससे इन्कार कर दे। शायद ग्रीस को यूरो क्षेत्र से बाहर निकाल दिया जाए, जिसके पूरे यूरोप के लिए घातक आर्थिक और राजनीतिक नतीजे होने की आशंका होगी। इन हालात में किसी का ध्यान इस पर नहीं है कि पिछले कुछ समय में ग्रीस की प्रतिस्पर्धी क्षमता में सुधार आया है और पारिश्रमिक व लागतों में कमी आई है। फिलहाल वहां की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मितव्ययता सबसे जरूरी है। ग्रीस को मौका दिया जाना चाहिए कि वह अपने बजट में कुछ बढ़ोतरी दर्शा सके, और इसी बहाने नई सरकार अपनी पीठ ठोक सके, और अलोकतांत्रिक ताकतों को उभरने से रोक सके। मगर यह तभी मुमकिन है, जबकि दूसरे यूरोपीय देश, खासकर जर्मनी ग्रीस के बारे में मिथक गढ़ने से बाज आएं, और नाहक नैतिकता का ढोल न पीटें।
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