स्वतंत्रता के बाद के दौर में, भारत औपनिवेशिक खुमार से जूझ रहा था, जिसे ‘भूरा साहब’ की संस्कृति ने और भी तीव्र कर दिया, जिसने शिक्षा प्रणाली और सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित किया। हिंदू धर्म से जुड़ी सभी चीजों को पिछड़ा और प्रतिगामी माना जाता था, और प्राचीन मान्यताओं के खिलाफ दौड़ को सच्चा विकास माना जाता था। उन स्थितियों में एक राष्ट्र अपने गौरवशाली अतीत से आगे निकलने की कोशिश कर रहा था, जिसे सदियों से बदनाम और अपमानित किया गया था। हम सभी उस दौड़ में शामिल थे, बिना यह जाने कि हमने अपने तरीके से, उन सभी चीजों को त्यागने का प्रयास किया, जो हमें भारतीय बनाती हैं। और, यह मनोवैज्ञानिक फिसलन बचपन से ही शुरू हो गई थी।
हमारी स्कूली पाठ्यपुस्तकें विदेशी आक्रमणकारियों की महिमामंडित किंवदंतियों और अंग्रेजों के औपनिवेशिक ‘योगदान’ से भरी हुई थीं। इसमें विदेशियों के कथित ‘सभ्यतापूर्ण’ हस्तक्षेप से बहुत पहले भारत की समृद्ध परंपरा और उपलब्धियों को कम करके आंका गया। प्राचीन ज्ञान प्रणालियों और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों की महिमा, जिसका गुणगान चीनी विद्वानों ने हजारों साल पहले अपने लेखों में किया था, खो गई और हमें बौद्धिक मान्यता के लिए हार्वर्ड की ओर देखना पड़ा। हमने आजादी से कहीं ज्यादा अपनी पहचान खो दी। आजादी के बाद के पहले ओबीसी प्रधानमंत्री मोदी को निरंतर हाशिये पर रहने और उत्पीड़न के परिणामस्वरूप आत्मसम्मान की कमी का गहरा एहसास है, जो दरअसल, सदियों से चला आ रहा एक पीढ़ीगत घाव भी है। यह केवल गर्व का सवाल नहीं था, जिसे आसानी से गढ़ा जा सकता है, यह सांस्कृतिक आत्म की गहरी समझ के साथ एक समझौता था, जो राष्ट्रीय अखंडता और पहचान से अभिन्न है।
जैसा कि कहा जाता है, ‘यदि आप नहीं जानते कि आप कहां से आए हैं, तो आप कभी नहीं जान पाएंगे कि आप कहां जा रहे हैं।’ और भारत जिस रास्ते पर चल रहा था, लेकिन पहले उसे भारत की खोज करनी थी। उसे न केवल देश के बुनियादी ढांचे का, बल्कि सांस्कृतिक मानसिकता का भी विकास करना था। अतीत से प्रस्थान शुरू से ही स्पष्ट था, जब प्रधानमंत्री मोदी ने काशी में गंगा आरती की। जाहिर है, आलोचना तो अपेक्षित थी ही, लेकिन वह अपनी आस्था के प्रति अडिग रहे। उन्होंने हिंदू होने को छुपाने वाले पाखंड और अपमान की चादर को उतार फेंका। उनकी तुलना में पंडित नेहरू अपनी आस्था के प्रति उदासीन थे और काफी हद तक पश्चिमीकरण की ओर झुकाव रखते थे। वह संस्कृति को प्रगति में बाधा मानते थे।
मोदी के साथ, भारत अपनी उत्तर-औपनिवेशिक पहचान और हमारी प्राचीन सभ्यता और ज्ञान की आत्महीनता के पन्ने पलट रहा था। हमारी प्राचीन संस्कृति को अब एक योगदानकर्ता के रूप में देखा जाना था, जिसे स्वीकार किया जाना था, न कि मिटाया जाना। यह कई मायनों में मान्यता और स्वीकृति के लिए पुराने आकाओं पर निर्भरता के बंधनों से मुक्ति का दौर था। दस साल बाद, इस स्थिर मार्ग ने भारत को ग्लोबल साउथ की एक प्रमुख आवाज बना दिया है, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री को कई उत्तर-औपनिवेशिक देशों के लिए मार्गदर्शक के रूप में देखा जाता है। हमारी भूमि और मानस पर आक्रमण के कारण जब हमारी कई प्राचीन ज्ञान प्रणालियां लुप्त हो गईं, तब प्रधानमंत्री मोदी ने संस्कृत और पाली जैसी प्राचीन भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए जोरदार प्रयास किया, ताकि डिजिटलीकरण, अनुवाद और अध्ययन की प्रक्रिया के माध्यम से भारत की बौद्धिक विरासत की पहुंच भावी पीढ़ियों तक सुनिश्चित हो सके। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जैसे शिक्षण संस्थान प्राचीन ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक विज्ञान के साथ तेजी से एकीकृत कर रहे हैं, जो वैश्विक ज्ञान में भारत के कालातीत योगदान को प्रदर्शित करता है। मुझे हमेशा इस बात पर आश्चर्य होता है कि मुस्लिम बहुल देश इंडोनेशिया ने अपने राष्ट्रीय विमान का नाम भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के नाम पर रखा है। यह सच है कि आज के भारत के लिए आर्थिक विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक पुनरुत्थान भी महत्वपूर्ण है, और यही भारत को वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करता है।
आज का भारत पारंपरिक मूल्यों को आधुनिक आकांक्षाओं के साथ जोड़कर एक ऐसी कहानी गढ़ रहा है, जो भारत के अतीत का जश्न मनाने के साथ वर्तमान युग की मांगों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती है। यह कई मायनों में हमारे पूर्वजों के प्रति एक मार्मिक ऋण अदायगी है, जिन्होंने सदियों की दासता और उत्पीड़न के बावजूद भारी दबाव के बीच अपनी आस्था और संस्कृति को बनाए रखा। इसकी ही बदौलत, स्वतंत्र भारत के उत्तराधिकारियों के रूप में हम न केवल सावधानी से संरक्षित सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान को आत्मसात करते हैं, बल्कि व्यापक विश्व की भलाई के लिए इसे साझा भी करते हैं। आज का भारत देश की सांस्कृतिक विरासत की कालातीत प्रासंगिकता और लचीलेपन को रेखांकित करता है, और यह सुनिश्चित करता है कि यह दुनिया भर की पीढ़ियों को प्रेरित और प्रभावित करता रहे। उनके प्रयास एक ऐसे देश के लिए प्रकाशस्तंभ की तरह हैं, जो अपनी पहचान पुनः प्राप्त कर रहा है, उपनिवेशवाद की छाया से मुक्त हो रहा है, और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भविष्य की ओर आत्मविश्वास से आगे बढ़ रहा है। यह एक ऐसी सभ्यता का उदाहरण भी है, जो दुनिया को गले लगाती है। edit@amarujala.com