हिंदी विरोध बाद के दिनों में गैर-हिंदीभाषी राज्यों की राजनीति में समा गया। हालांकि हिंदी विरोध सिर्फ राजनीति तक ही सीमित होता गया, जबकि बाजार के विस्तार, सिनेमा के प्रसार और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के बढ़ते आकर्षण के चलते हिंदी गैर-हिंदी भाषी राज्यों में भी स्वीकृत और विस्तारित होती चली गई। चूंकि राजनीति ही मौजूदा तंत्र को चलाती है, और वह हिंदी विरोध से अपने लिए खाद-पानी हासिल करती रहती है, इसलिए यह विरोध अब भी दिखता रहता है। बेशक यह विरोध अब सतह पर ही है, इसके बावजूद हिंदी के जरिये मजबूत राष्ट्र का सपना देखने वाली राजनीति ने हिंदी के बजाय भारतीय भाषाओं की बात करना शुरू कर दिया है। इसके जरिये गैर-हिंदीभाषी राज्यों की उस जनता को संदेश देने की कोशिश हो रही है, जो बुनियादी रूप से राजनीतिक नहीं है। संदेश यह कि भारतीय भाषाओं के अस्तित्व में ही हिंदी की भी अस्मिता समाहित है और भारतीय भाषाओं से हिंदी अलग नहीं है। अगर वह कुछ विशेष है, तो इसलिए कि पूरे देश की देसी संपर्क भाषा बनने की ताकत सिर्फ उसी में है।
मौजूदा मोदी सरकार ने इस दिशा में कहीं अहम काम किया है। हिंदी विरोध की राजनीति के बीच हिंदी के लिए राह निकालने और उसे राजनीतिक रूप से स्वीकार्य बनाने की दिशा में मौजूदा केंद्र सरकार के कार्य बाकियों से कुछ अलग हैं। जब गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में केंद्रीय हिंदी समिति की बैठक में कहा कि देश के बच्चों और युवाओं की पूरी क्षमता का उपयोग विकास में करना है, तो जरूरी है कि वे अपनी मातृभाषा में पढ़ें, विश्लेषण करें और निर्णय लें।
केंद्रीय हिंदी समिति का उद्देश्य हिंदी के साहित्य का संवर्धन करना और देश की संपर्क भाषा के रूप में उसे स्थापित करना है। हिंदी साहित्य का संवर्धन तो हो रहा है, लेकिन हिंदी अभी तक वैचारिक हस्तक्षेप की भाषा नहीं बन पाई है। मौजूदा सरकार द्वारा हिंदी के लिए किए जा रहे कार्यों के बावजूद अब भी नौकरशाही में अंग्रेजी का वर्चस्व है। देश की वैचारिक धुरी अब भी भारतीय भाषाओं के बजाय दो सौ वर्षों से लागू अंग्रेजी में ही अटकी है। केंद्रीय हिंदी समिति इस दिशा में बहुत प्रभावकारी कदम नहीं उठा सकी है। जरूरत इस दिशा में आगे बढ़ने की है।
केंद्रीय हिंदी समिति की बैठक में गृह मंत्री ने हिंदी के विकास के लिए जो रोडमैप प्रस्तुत किया, उसमें उन्होंने दो कार्यों पर जोर दिया है। उनका मानना है कि हिंदी साहित्य को मजबूत करने, संजोने और व्याकरण के लिए दीर्घकालिक नीति बनाना जरूरी है। लगे हाथों उन्होंने हिंदी को सबके लिए सहज बनाने की भी बात कही है। इस दिशा में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद दो परियोजनाओं पर काम कर भी रहा है। परिषद की पहली परियोजना ‘भारतीय भाषाओं में एकात्मकता’ और दूसरी परियोजना ‘बहुभाषिक व्याकरण’ है। दोनों के संयोजक रहे डॉक्टर प्रमोद कुमार दुबे का कहना है कि दोनों परियोजनाओं के पूरे होने के बाद दो बातें होंगी। पहली यह कि भारतीय भाषाओं का विभेद मिटेगा और विदेशी विद्वानों द्वारा स्थापित भारतीय भाषाओं के अलगाव का सिद्धांत मिथ्या साबित होगा, जबकि एक ही व्याकरण के जरिये तमाम भारतीय भाषाओं को सीखना और समझना आसान हो जाएगा। इससे विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच जो राजनीतिक दूरी दिखती है, उसे पाटने में मदद मिलेगी। इससे आपसी अनुवाद की समस्या भी दूर होगी।
मोदी सरकार की पहल पर हिंदी शब्दसिंधु शब्दकोश का निर्माण जारी है। अब गृह मंत्रालय के अधीन भारतीय भाषा अनुभाग काम कर रहा है। इसके साथ ही देश के तमाम हिस्सों में राजभाषा सम्मेलन हो रहे हैं, जिसके जरिये स्थानीय स्तर पर राजभाषा के महत्व को समझाने की कोशिश हो रही है। हिंदी के लिए जारी इतने सारे कार्यों का तब बेहतर नतीजा मिल सकेगा, जब नौकरशाही के मानस को बदलने की कोशिश होगी। यह मानस जब तक वैचारिक और नीतिगत विषयों के बुनियादी चिंतन में भारतीय भाषाओं को शामिल नहीं करेगा, तब तक हिंदी समेत भारतीय भाषाओं को उनका वाजिब महत्व नहीं मिल पाएगा।