अमेरिका संभवतः भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है। दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 160 अरब डॉलर को पार कर गया है और इसके और बढ़ने की संभावना है। लेकिन अमेरिकी व्यापारिक टीम को परस्पर आदान-प्रदान समझौते पर अड़ना नहीं चाहिए, जिसके तहत अमेरिका जोर दे रहा है कि 2000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाला भारत 60,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाले अमेरिका के साथ बराबरी से व्यापार करे। हालांकि, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और उनकी टीम द्वारा अमेरिकी चिंताओं को दूर करने के हर संभव प्रयास के बावजूद अतीत में ट्रंप का दृष्टिकोण समझौते को टालने का रहा है। अगर उन्होंने व्यापार समझौता किया होता, तो आज भारत अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार समझौते करके विशाल एशिया-प्रशांत व्यापार समझौते का हिस्सा बन सकता था।
बढ़ती अमेरिकी मांगों को पूरा किए जाने के बावजूद व्यापार मुद्दों पर अमेरिका की इसी हठधर्मिता के कारण भारत ने अब अपनी सीमाएं तय कर दी हैं, जिसका मतलब है कि अब अमेरिका को लगभग दस अरब डॉलर मिल भी सकते हैं और नहीं भी। इससे अमेरिका से भारत की रक्षा खरीद करीब 25 अरब डॉलर हो जाएगी, क्योंकि पांच वर्षों से ज्यादा समय से अमेरिका भारत का शीर्ष सैन्य आपूर्तिकर्ता रहा है। फिर भी अमेरिकी रक्षा कंपनियां, जिनके पास बड़ा बजट और उससे भी बड़ी महत्वाकांक्षाएं हैं, भारत से और अधिक रक्षा अनुबंध चाहती हैं। हाल ही में भारत ने रूसी सैन्य हार्डवेयर खरीदा है। मास्को ने खुशी-खुशी भारत को अकुला परमाणु हमला पनडुब्बियां और पांच भारतीय शहरों के लिए शीर्ष स्तर की ट्रायंफ मिसाइल कवच की आपूर्ति की है। इन सभी खरीद के लिए भारत को अमेरिका के साथ रक्षा प्रौद्योगिकी और व्यापार पहल (डीटीटीआई) शुरू करने की जरूरत है, जिसमें भारत में ‘ड्रोन’ और ड्रोन-रोधी प्रौद्योगिकी के निर्माण के लिए परियोजनाओं का तेजी से कार्यान्वयन शामिल है, क्योंकि पूर्व की दो घटनाओं-ईरानी जनरल सुलेमानी की हत्या और दूसरा सऊदी तेल रिफाइनरियों पर ईरान के हमले-ने अब भविष्य के लिए ड्रोन को सबसे सस्ता और अधिक प्रभावी हथियार बना दिया है। इस्राइल-ईरान-हिजबुल्ला-फलस्तीन संघर्ष में जिस तरह से ड्रोन एक प्रमुख हथियार बनकर उभरा है, उससे भी इसके भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं। भविष्य में पूरी दुनिया में होने वाले संघर्षों में ड्रोन की भूमिका भी बढ़नी तय ही है।
सवाल उठता है कि क्या अमेरिका ऐसी तकनीक भारत को हस्तांतरित करने के लिए सहमत होगा, जिससे पाकिस्तान में और अधिक चिंता पैदा हो सकती है। भारत और अमेरिका के बीच सबसे बड़े लंबित रक्षा सौदों में से एक लड़ाकू विमानों का सौदा है, जिन्हें अमेरिका चाहता है कि भारत खरीदे, लेकिन कीमत और भारत द्वारा खरीदे जाने वाले 114 जेट के प्रकार को लेकर अनुबंध में देरी हो रही है। हालांकि, हथियारों और असैन्य परमाणु संबंधों के अलावा (जिसका सौदा उच्च बीमा प्रीमियम की मांग के कारण नहीं हुआ), भारत 6/7 जी प्रौद्योगिकी के लिए अमेरिकी सहायता प्राप्त कर सकता है, क्योंकि भारत के बाजारों में प्रवेश करने के लिए 5जी की लड़ाई चीनी और जापानी कंपनियों के बीच चल रही है।
एक दूसरा क्षेत्र, जिसमें अमेरिका भारत की सहायता कर सकता है, वह है अंतरिक्ष में भारत के काम को आगे बढ़ाने की परियोजनाएं, जहां हम अब भी अमेरिका से बहुत पीछे हैं और मंगल ग्रह पर यान उतारने के हालिया प्रयास से यह बात सामने आई है।
संक्षेप में, भारत अमेरिका के साथ अपने संबंधों से रणनीतिक लाभ की तलाश कर रहा है, जबकि वाशिंगटन भारत के बाजारों में प्रवेश करने का इच्छुक है। हालांकि अमेरिकियों को अब भी यह समझना बाकी है कि भारत के डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों के विशाल भंडार को (जो शायद दुनिया में सबसे बड़ा है) संरक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि वे बहुत से किसानों को आजीविका प्रदान करते हैं। नव निर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश मामलों की टीम के प्रमुख सदस्य भारत और उसकी सुरक्षा चिंताओं के बारे में जानते हैं-विशेष रूप से चीन-पाकिस्तान गठजोड़ के बारे में। हाल ही में नियुक्त राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) माइकल वाल्ट्ज एक सम्मानित सैन्य अधिकारी रहे हैं, जिन्होंने भारत के लिए चीन और पाकिस्तान से दोतरफा पर खतरे का मुकाबला करने के लिए अमेरिका-भारत ‘गठबंधन’ के पक्ष में तर्क दिया है।
केवल दो महीने पहले वाल्ट्ज ने कहा था कि अमेरिका-भारत साझेदारी यह निर्धारित करेगी कि यह रोशनी की सदी होगी या अंधकार की सदी! इसके अलावा नवनियुक्त विदेश मंत्री मैक्रो रुबियो ने भी भारत के पक्ष में इसी तरह की भावनाएं प्रकट की हैं, खासकर अमेरिका की उस नीति के लिए, जो भारत को अपनी क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरों से लड़ने में सहायता करे, भले ही रूसी सैन्य उपकरण खरीदने की सीमित छूट हो। यह भारत के लिए मधुर संगीत की तरह होगा, हालांकि यह सब आसानी से नहीं हुआ है। न केवल कई भारतीय राजनयिकों ने लगातार भारत के पक्ष में भावना का निर्माण किया है, बल्कि उनके प्रतिस्थापन ने भी अमेरिकी नीति निर्माताओं को खुश होने का अवसर दिया है। लेकिन सिर्फ सैन्य गतिरोध को टालना नहीं है, बल्कि व्यापार संबंधों को बढ़ाना भी राजनयिकों के लिए कठिन काम है। अब यह तो समय ही बताएगा कि सरकार, अमेरिका से महत्वपूर्ण समझौते करने और जरूरी सौदे हासिल करने में कितनी कामयाब रहती है।