मौजूदा चुनावी दौर में जैसी संभावनाएं महाराष्ट्र और हरियाणा के लिए जताई गई थीं, इन दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने लगभग उन्हीं पदचिह्न का अनुसरण किया है। आम समझदारी इसे 2014 की गरमियों की तरह की 'राष्ट्रीय मोदी लहर' का एक और उदाहरण भले ही माने, पर हकीकत में ये दो अलग-अलग चुनाव थे, और यहां की लड़ाई और उसके परिणाम देश के बदलते राजनीतिक परिवेश का इशारा कर रहे हैं। विशेष रूप से, 1990 के बाद देश की संघीय राजनीति में राज्यों का दबदबा बढ़ा है और कई राज्यों में क्षेत्रीय दल या क्षेत्रीय व्यक्तित्व को दर्शाने वाले कद्दावर मुख्यमंत्रियों का बोलबाला बढ़ा है। क्षेत्रीयता के इस उभार पर राष्ट्रीय दलों को भी घुटने टेकने पड़े हैं। इन नेताओं में चंद्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह जैसे मुख्यमंत्रियों के नाम लिए जा सकते हैं। नरेंद्र मोदी की छवि भी ऐसे ही मुख्यमंत्री की रही है, जो तीसरी बार राज्य का नेतृत्व करने के बाद दिल्ली की रेस में सबसे आगे निकल गए।
आखिर कैसे अलग रहा हरियाणा और महाराष्ट्र का चुनाव 1990 के इस परिवेश से? आखिर वह किस तरह का आमूल परिवर्तन था कि हरियाणा में किसी कद्दावर क्षेत्रीय नेता और मजबूत जमीनी पकड़ के बिना भाजपा आज राज्यपाल के निमंत्रण का इंतजार कर रही है? कैसे यह पार्टी मुख्यमंत्री की छवि वाला नेता न होने के बावजूद महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी बनी? क्या इसे राष्ट्रीय दल का राज्यों की राजनीति पर आरोह मानेंगे? या फिर मतदाता ही अब पुरानी अवधारणाओं, विशेष रूप से जाति या धर्म के आधार पर अपने मत नहीं डालना चाहता? वह विकास, आर्थिक बढ़त, मुद्रास्फीति, उत्पादकता का बढ़ाया जाना और नौकरियों के मुद्दे पर अपना मत दर्ज करा रहा है?
हरियाणा और महाराष्ट्र, दोनों राज्यों में अलग-अलग किस्म के राजनीतिक अवसर भाजपा के सामने आए। हरियाणा में कांग्रेस विरोध की लहर पुरजोर थी। मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा भ्रष्टाचार के उन सभी मामलों में भागीदार समझे गए, जिन मामलों ने केंद्र से यूपीए 2 को सत्ता से बाहर फेंका था। इसके बरक्स भारतीय राष्ट्रीय लोकदल (इनेलो) में सबसे बड़ी कमी यह थी कि उसके सबसे शीर्षस्थ नेता ओम प्रकाश चौटाला जेल में बंद थे। यानी हरियाणा में राजनीतिक शून्यता पैदा हुई, जिसमें यह तो तय था कि सत्ता पक्ष के खिलाफ माहौल है, लेकिन दिक्कत यह थी कि उसे हरानेवाला नदारद था। ऐसे में मोदी और उनकी टीम ने अपनी संगठनात्मक ऊर्जा लगाई, जिसमें अमित शाह और कैप्टन अभिमन्यु मुख्य सिपाही साबित हुए। हरियाणा की राजनीति अब तक कुछ परिवारों के इर्द-गिर्द मानी जाती रही थी, जिसमें चौधरी भजनलाल, देवीलाल, भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे कुछ नाम प्रमुख हैं। पर इन सबकी गृहस्थी को इस बार मतदाताओं ने किनारे कर दिया।
महाराष्ट्र की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही रही। वहां भाजपा मुख्यतः शिवसेना की सहयोगी मानी जाती थी, मगर इस बार शिवसेना-भाजपा ने गठबंधन धर्म नहीं, मैक्यावली और कौटिल्य के राजनीतिक धर्म का पालन किया। मोदी एकला चलो की नीति पर आगे बढ़े, जबकि उद्धव ठाकरे ने अपनी 'परिपक्वता' का एहसास इस बात से कराने की कोशिश की कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा, तो राज्य में वह कर्तव्य का निर्वहन करेंगे। इस तरह 1989 में प्रमोद महाजन और बाल ठाकरे के प्रयासों से बना यह गठबंधन आनन-फानन में टूट गया। उधर शरद पवार ने भी मौका ताड़ते हुए कांग्रेस से अपना पल्ला झाड़ लिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि चारों दल अपने बलबूते मैदान में आ गए। चूंकि मुंबई-ठाणे, पश्चिमी महाराष्ट्र, विदर्भ, मराठवाड़ा, कोंकण जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सभी दलों का अपना-अपना जनाधार है, लिहाजा इस बार महाराष्ट्र का चुनाव खुला मंच बनकर रह गया। चुनाव के समय जहां शिवसेना ने मराठी मानुष और बाला साहेब ठाकरे की विरासत की याद दिलाई, वहीं भाजपा ने मराठी गर्विता का मुद्दा उठाया। नरेंद्र मोदी ने एक के बाद एक ताबड़तोड़ सभाएं कर जनता को यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया कि वह राज्य को विकास की उस ऊंचाइयों पर ले जाएंगे, जहां प्रदेश के विकास मॉडल की चर्चा भी गुजरात की तरह हो। गोपीनाथ मुंडे की मौत ने भी भाजपा की राह में मुश्किलें पैदा की थीं। लिहाजा मोदी ने इस बार अपने सभी घोड़ों को वहां उतार दिया। इन तमाम प्रयासों का ही नतीजा रहा कि 1985 के बाद यह पहला मौका है, जब कोई एक पार्टी बहुमत के इस तरह करीब आई हो। महाराष्ट्र में भले ही दावे के मुताबिक शिवसेना ने प्रदर्शन नहीं किया है, लेकिन उसकी सीटों की संख्या में बढ़ोतरी और राज ठाकरे की पार्टी मनसे की खस्ता हालत ने यह इशारा जरूर किया है कि लोगों की नजर में बाला साहेब ठाकरे की विरासत शिवसेना के हाथों में ही है।
बहरहाल, इन दोनों राज्यों के नतीजे परंपरा तोड़ने वाले रहे। भाजपा ने राज्य स्तरीय मुद्दों को उभारा और विजय हुई। मगर मतदाता ने भी स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें नजरंदाज कर कोई पार्टी सत्ता तक नहीं पहुंच सकती। उसने यह भी साफ कर दिया है कि पारंपरिक आधारों पर क्षणिक फायदे के लिए उन्हें लुभाना अब संभव नहीं। ऐसी पार्टियों को आईना दिखाने को वह अब तैयार है।
(लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से जुड़ी रहीं राजनीतिक विश्लेषक)