फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

प्रधानमंत्री का संबोधन और सलाह: बहस के लिए दरवाजे और खिड़कियां खुली रहें

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 07 Dec 2025 07:45 AM IST

सार

संसदीय बहसें जनता की आवाज को मंच प्रदान करती हैं, जिससे सरकार जवाबदेह बनती है, पारदर्शिता बढ़ती है। विभिन्न विचारों के बीच बहस और चर्चा बेहतर कानून और नीतियों के निर्माण में सहायक होती हैं, जो देश के लिए हितकारी होती हैं। संसद में चर्चा से लोकतंत्र मजबूत होता है।
 
विज्ञापन
विज्ञापन
संसद की फाइल तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


प्रधानमंत्री का संबोधन

इस बार सत्र की शुरुआत अच्छी नहीं रही। यह बताने के लिए प्रधानमंत्री का संबोधन देना उचित रहेगा। “दुर्भाग्य से, एक-दो राजनीतिक दल ऐसे हैं, जो अपनी हार को पचा नहीं पाते। मुझे लगा कि बिहार के नतीजे आए काफी समय हो गया है और वे ठीक हो गए होंगे, लेकिन उनके बयानों को सुनकर ऐसा लगता है कि हार अब भी उन्हें परेशान कर रही है। देश में नारे लगाने की जगह की कोई कमी नहीं है। आप जहां हार चुके हैं, वहां पहले ही नारे लगा चुके हैं। आप वहां भी नारे लगा सकते हैं, जहां अगली बार हारने वाले हैं, लेकिन हमें यहां नारों पर नहीं, नीतियों पर काम करना है।” उन्होंने कुछ राज्य विशेष पार्टियों पर भी कटाक्ष किया, “कुछ राज्यों में वर्तमान सरकार के खिलाफ इतना असंतोष है कि सत्ता में रहने के बाद नेता जनता के बीच में नहीं जाते हैं...वे संसद में आकर अपनी नाराजगी निकालते हैं।”


आम तौर पर हर सत्र की शुरुआत में सरकार दुनिया को यह बताने की घोषणा करती है कि उसके पास छुपाने के लिए कुछ नहीं है और वह संवाद के लिए तैयार है। वह संसद में किसी भी विषय पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन इसमें एक शर्त है। शर्त यह है कि चर्चा ‘नियमों के अनुसार’ होगी और नियम नियमावली की किताब में लिखे हैं, लेकिन नियमों की व्याख्या और उनका प्रयोग अध्यक्ष (स्पीकर या चेयरमैन) के हाथ में होता है। इसमें अक्सर सरकार के फ्लोर लीडर की सलाह ली जाती है। जब विपक्ष अपना एजेंडा बिजनेस एडवाइजरी कमेटी में रखता है तो हर विषय पर सरकार आपत्ति करती है।


चर्चा के नियम
  • सरकार के एजेंडे में बिल और बजट होते हैं। प्रश्नकाल किसी चर्चा की अनुमति नहीं देता। विपक्ष चाहे तो एक स्वतंत्र और खुली चर्चा, स्थगन प्रस्ताव, अल्पकालिक चर्चा या ध्यानाकर्षण सूचना देकर करा सकता है। चर्चा के लिए यह सभी पारंपरिक संसदीय तरीके हैं और इनके लिए नियम बने हुए हैं। स्थगन प्रस्ताव को सरकार की आलोचना माना जाता है, हालांकि इनके लिए नियम हैं-
  • स्थगन प्रस्ताव की सूचना लोकसभा में नियम 57 के अनुसार दी जाती है। यह हाल ही में हुई किसी घटना के विशेष मामले से जुड़ी होनी चाहिए, जिसका संबंध भारत सरकार की जिम्मेदारी से हो।
  • राज्यसभा में सदन के कामकाज को निलंबित करने की अनुमति नियम 267 देता है, ताकि किसी बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा की जा सके।
  • अल्पकालिक चर्चा के लिए लोकसभा में नियम 193 और राज्यसभा में नियम 176 है। किसी तत्काल सार्वजनिक महत्व के मुद्दे पर इन नियमों के तहत चर्चा की जा सकती है।
  • ध्यानाकर्षण सूचना देना सबसे आसान है। लोकसभा में नियम 197 और राज्यसभा में नियम 180 के अधीन कोई सदस्य किसी मंत्री का ध्यान किसी अत्यंत महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दे की ओर खींच सकता है और मंत्री को उस पर बयान देना अनिवार्य है।
मैं यहां जो आंकड़े दे रहा हूं, उनसे पता चलता है कि विपक्ष के लिए धीरे-धीरे किस तरह हर दरवाजा और खिड़की बंद कर दी गई है। पिछले कुछ वर्षों में स्थिति और खराब हुई है।
साल स्थगन लो.स प्रस्ताव रा.स अल्पकालिक लो.स बहस रा.स ध्यानाकर्षण लो.स सूचना रा. स
2014 - - 9 6 9 4
2015 1 - 8 4 3 5
2016 - - 9 9 4 10
2017 - - 4 7 1 3
2018 - - 1 2 - 2
2019 - - 4 4 - 6
2020 - - 2 1 - -
2021 - - 3 3 1 -
2022 - - 5 2 - -
2023 - - - 2 - -
2024 - - 2 3 - 1
2025 ( नवंबर तक) - - - - 1 -
स्त्रोत-प्रिज्म


संवाद, चर्चा, बहस का विरोध

आंकड़े अपनी कहानी खुद बयां कर रहे हैं। भाजपा सरकार ने पहले कार्यकाल में स्थगन प्रस्ताव का विरोध किया, क्योंकि उसे अपनी छवि बिगड़ने का डर था। हालांकि सरकार अल्पकालिक चर्चा और ध्यानाकर्षण सूचना के प्रति सहनशील थी। दूसरे कार्यकाल में असहिष्णुता साफ हो गई, चर्चा का दरवाजा बंद कर दिया गया, लेकिन खिड़कियां खुली रहीं। अब तीसरे कार्यकाल में मोदी सरकार ने खिड़कियां भी बंद कर दी हैं। क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि कोई भी महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दा नहीं था, जिसकी चर्चा सदन में होनी चाहिए थी? यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्यसभा में बहस लोकसभा की तुलना में कम हो पाई। कई सदस्य इसके लिए अध्यक्ष को जिम्मेदार मानते हैं। सितंबर में राज्यसभा में नए अध्यक्ष ने कार्यभार संभाला है। इसके अलावा 2025 का शीतकालीन सत्र बहुत छोटा है, इसलिए किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। तो क्या सरकार इस बात में विश्वास नहीं करती है कि संसद में चर्चा से लोकतंत्र मजबूत होता है? Licensed by The Indian Express Limited




 
विज्ञापन
विज्ञापन
Next