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वह चलने नहीं देंगे

Wed, 19 Aug 2015 08:59 PM IST
मृदुल कश्यप
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वह जब भी किसी व्यवस्था को चलते हुए देखते हैं, तो उन्हें कुछ-कुछ होने लगता है। जब वह विपक्ष में बैठते हैं, तो उनकी यह 'सुपर-स्पेशिलिटी' स्वतः ही सक्रिय हो जाती है। उनके भीतर आक्रोश का लावा उबलने लगता है। अगर वह अंग्रेजी भाषी हैं, तो हिंदी में, और अगर हिंदी भाषी हैं, तो अंग्रेजी में उनका यह लावा तीव्र वेग से बाहर निकलने लगता है। वह हाथ लहराते हुए जोर-जोर से चिल्लाने लगते हैं, हम यह चलने नहीं देंगे।
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इस दौरान उनका संपूर्ण शरीर अजीब ढंग से कंपन करने लगता है। देखने वालों को लगता है, मानो उन्हें जबर्दस्त दौरा पड़ा हो। जो उनकी इस विशिष्ट अदा से वाकिफ नहीं हैं, वे बुरी तरह डर जाते हैं। उन्हें लगता है कि शायद कोई देवी आ गई हैं, और यह कहकर उन्हें आदरपूर्वक आसन प्रदान कर दिया जाता है।

उन्होंने इसी रोकने के क्षेत्र में विशिष्टता हासिल कर ली है। वह रुके हुए सिस्टम को चलाने का तनिक भी प्रयास नहीं करते हैं। उनका मानना है कि आदमी सभी विधाओं में पारंगत नहीं हो सकता। इसलिए किसी एक विधा पर ही केंद्रित होना चाहिए।
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वह 'चलने नहीं देगे' की अपनी इस विधा में इतने अधिक पारंगत हो गए हैं कि उनके सामने अगर सामान्य कामकाज भी किया जाता है, तो वह हत्थे से उखड़ जाते हैं। उन्हें जनता की खातिर झूमाझटकी से कतई परहेज नहीं है। वह वहां मौजूद वस्तुओं को हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगते हैं। वह कागज को फाइटर प्लेन और माइक को मिसाइल की तरह इस्तेमाल करते हैं। वह तब तक चैन से नहीं बैठते, जब तक कि वह व्यवस्था की ईंट से ईंट न बजा डालें।

वह कार्यवाही रोकने के लिए लाखों रुपये की बलि चढ़ाए बिना नहीं मानते। जनता के लिए, जनता के पैसों से और जनता के प्रतिनिधि होने के कारण आखिर उनका इतना हक तो बनता ही है। जब वह इस रोकने की प्रक्रिया से शरीर में ऊर्जा की कमी महसूस करने लगते हैं, तो केंटीन की ओर चल पड़ते हैं, जहां पर सब्सिडाइज्ड एनर्जी फूड उनका इंतजार कर रहे होते हैं।
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