मैगी पर लगा प्रतिबंध हट गया है। वह इसलिए हटा है, क्योंकि यह लगा था। पोर्न पर भी पाबंदी लगी थी, और वह भी अंततः नहीं रही। जो जन्म लेता है, वह एक दिन मरता है। यह आध्यात्मिक सच है। वैज्ञानिक सच इस सत्य के विपरीत है। विज्ञान के हिसाब से द्रव्य अविनाशी है। वह न तो पैदा होता है, और न मिटता है। वह तो बस रूपांतरित होता है। अब सवाल यह है कि क्या बैन या पाबंदी द्रव्य है या नहीं ? वैसे तो ऐसे तमाम प्रकरणों में किसी न किसी प्रकार द्रव्य की उपस्थिति रहती है। बैन के लगने और उठने से ही सरकारी महकमों और अदालतों का मानवीय चेहरा सामने आता है। यह अलग बात है कि महकमों की ओट में कहीं न कहीं अक्सर सरकार और सरोकार होते हैं।
जब तक मैगी थी, तो जिंदगी कितनी पुरसुकून थी। बस दो मिनट में ममत्व और मैगी प्रकट हो जाती थी। जब तक पोर्न की सहज उपलब्धता थी, तब तक जीवन रसमय था। उस पर पाबंदी आयद हुई, तो पता चला कि जीवन कितनी दुरूह है। लोगों के मन में तरह-तरह के ख्याल आने लगे कि यह सरकार तो दुष्ट है। आज कंप्यूटर तक घुसपैठ कर रही है। कल वह बेडरूम में क्लोज सर्किट कैमरा लगाने की बाध्यता कर देगी।
सरकार ने आनन-फानन में अपना आदेश वापस लिया। इस यूटर्न से यह बात साफ हुई कि यह सरकार निकम्मी भले हो, पर है उदारमना।
अब पोर्न भी है। मैगी के पुनरागमन की संभावना है। जीएसटी के लिए लघु सत्र आहूत करने की सुगबुगाहट है। एक-दूसरे की पोलखोल की तैयारी है। मंगल पर सुंदर महिला की मौजूदगी की नासा ब्रांड तस्वीर है। सुदूर मुल्कों में देशभक्तों के जखीरे मिलने की खुशखबरी है। इनके जरिये देशप्रेम की भावना की स्वदेशी मार्केट में कमी की भरपाई होने की उम्मीद है।
फिलवक्त सरकार अवांतर प्रसंगों में बिजी है। जब उसे मौका मिलेगा, तो वह प्याज के सेवन पर पाबंदी लगाने जैसा कुछ करेगी। जब इसके खिलाफ आवाज उठेगी, तो वह आंशिक बैन हटा देगी। इस बीच प्याज के दाम घटेंगे, तो लोगों को कहना पड़ेगा, अजी कहो कुछ भी। यह सरकार तो बड़े काम की है।