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जैसा समाज, वैसी संसद: सियासी दलों के बीच इतिहास की कबड्डी; संविधान जनता का, सत्याग्रह के लिए इसे ही जागना होगा

संदीप जोशी
Updated Mon, 23 Dec 2024 05:01 AM IST

सार

विज्ञान का तो अपना इतिहास होता है, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या इतिहास का भी कोई विज्ञान होता है?
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संसद भवन - फोटो : ANI

 

इतिहास को देखने का ढंग हर व्यक्ति या संगठन का अलग-अलग ही रहा है। लेकिन सत्ता का फैलाया भ्रम जनता पर भारी ही पड़ा है। इस भ्रम को पकड़ना या समझना हर किसी के बस की बात नहीं। इसमें अच्छे-अच्छे विद्वान गच्चा खा जाते हैं, फिर सामान्य इन्सान की तो बात ही क्या करना।


संसद का शीतकालीन सत्र हाल ही में खत्म हुआ है। नए चुने-बने सांसदों पर जनता से जुड़े मुद्दों पर विचार करने और देश के विकास के लिए नीतियां बनाने व विधेयक लाने का उत्तरदायित्व है। संविधान बनने के पचहत्तर साल भी पूरे हुए, तो उस पर विचार और बहस करने की भी बात उठी। कुछ हद तक बात भी की गई। संविधान पर विचार-विमर्श होना था, लेकिन पहले सावरकर, और फिर आंबेडकर पर बहस सिमट गई। पूरे सत्र के दौरान जनता से जुड़े मुद्दों पर सार्थक चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन पूरा सत्र आरोप-प्रत्यारोप और अंतिम दिनों में धक्का-मुक्की पर आकर हो हंगामे के बीच खत्म हो गया।


आज विचार की बातचीत की जगह बहस का विस्तार चल रहा है। संस्थागत विचार की बातचीत की जगह व्यक्ति विशेष पर बहस ने ले ली है। इसलिए इतिहास को देखना और खंगालना दोनों साथ-साथ चलते रहते हैं। सत्तानीतिक इतिहास का महत्व और इसकी महत्वाकांक्षा वर्तमान सत्ता के लिए ही होती है।


सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही उसमें से अपने फायदे का अर्थ निकालने के लिए स्वतंत्र हैं। यही देखते हुए अपने को जो दिखाना है, उसको ही इतिहास मान लिया जाता है। सत्ता सभी को वही मनवाने की कोशिश में भी लगती है। सत्ता ही अर्धसत्य समझाने में लगती है और सत्य को अनदेखा किया जाता है। यह जानते हुए कि मानवता का विकास, तो वर्तमान में  होने वाली घटना ही है। यह ठीक उसी तरह का है, जो मानने लग जाते हैं कि इतिहास में फैले कोहरे का दोष किसानों द्वारा जलाई जाने वाली पराली के ऊपर मढ़ दिया जाए, बजाय इसके कि बढ़ते आधुनिक ईंधन के जलाने से भी प्रदूषण होता है।


इतिहास तो समाज की सामुदायिकता के बजाय व्यक्ति या संगठन की विशेषता पर ही जोर देता है। संविधान के इतिहास पर बहस भी किसी एक व्यक्ति या संगठन के बजाय उसके बनने के उद्देश्य पर आधारित होनी चाहिए थी। इसलिए समय के साथ उसमें बदलाव नहीं किए जा सकते, भी नहीं कह सकते हैं। पिछली सरकारों ने जो संशोधन किए उनको संशोधित करने का जनमत भी अगली सरकार के पास जनता ही देती है। सर्वसम्मति लोकतंत्र का जरूरी गणित है, लेकिन उसे भी जनता ही अपने जनमत से जगाती है। संविधान संशोधन क्यों जरूरी है? इसका जनता के हित में कितना फायदा होगा? बहस तो इस पर होनी चाहिए थी, लेकिन बहस सिर्फ यहां तक सिमट गई कि किसकी सरकार ने कितने संशोधन किए।


हर समय के सत्तानीतिक इतिहास में ऐसा बहुत कुछ होता है, जो अनछुआ, अनदेखा और नासमझा ही रह जाता है। संसद के पूरे शीतकालीन सत्र में यही नाटक चलता रहा, तो इतिहास समझने की ऐतिहासिक चेतना क्या है? गैडिस मानते हैं कि दूर के परिदृश्य में डूबना नहीं, बल्कि उससे ऊपर उठना होगा। समाज में जिज्ञासा की भावना जगे। इतिहास के कोहरे को भेदा जाए।
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अनुभव से संविधान का सत्य-चित्र खींचा जाए। इसलिए सत्ता चाहने वाले भी वैज्ञानिक और इतिहासकार की तरह रूपक और विडंबना का ही इस्तेमाल करते हैं। आज जो समाज में विचार का अभाव दिख रहा है, उसी विचार का अकाल अपनी संसद में दिखाई दे रहा है। इतिहास की इस कबड्डी में भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस, दोनों जनता की सांस फुलाने में लगी हैं। संविधान जनता का है, तो सत्याग्रह के लिए जनता को ही जागना होगा।

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