साधो, पप्पू यादव और मेरा तुलनात्मक अध्ययन शोध का विषय है। पप्पू यादव अपनी आत्मकथा द्रोहकाल का पथिक लिख चुके हैं और मैं लिखने की तैयारी में हूं।
पप्पू यादव और मुझमें कई समानताएं हैं। जैसे, सच बोलने की कीमत उन्होंने भी चुकाई है और मैंने भी। वह द्रोहकाल के पथिक हैं, तो मैं क्रांतिपथ का। वह जेल जा चुके हैं और मैं भी बंदी रह चुका हूं। उनके भीतर व्यवस्था का विरोध करने का साहस है और मैं भी ऐसा करने में जीवन भर पीछे नहीं हटा। वह झांसी की रानी और भगत सिंह को जानते हैं और मैं तो इनका मुरीद ही हूं। उनकी पीड़ा है कि उन्हें ठीक से नहीं समझा गया, जबकि मेरा दर्द भी कुछ इसी तरह है।
लेकिन मेरे और उनके बीच जो असमानताएं हैं, उनका खुलासा कर देना भी मैं यहां उचित समझता हूं। जैसे, पप्पू यादव बहुत वजनदार नेता हैं, वह दौड़कर ट्रेन नहीं पकड़ सकते। जबकि मेरे जैसे कम भार वाले लेखक के लिए भागकर रेलगाड़ी पकड़ने में दिक्कत नहीं होती। पप्पू यादव एक रैली में 400 मोटरसाइकिलें और इतनी ही राइफलें लेकर चलते हैं, जबकि मैं किसी साहित्यिक संगोष्ठी में दस-बीस पैदल और निहत्थे आदमियों को भी नहीं जुटा पाता। पप्पू यादव की आत्मकथा के लोकार्पण में नामवर सिंह, मुलायम सिंह, मुजफ्फर अली, अनूप जलोटा, दिग्विजय सिंह और रामविलास पासवान पहुंचते हैं, जबकि इनमें से कोई मुझे जानता भी नहीं।
और ताजा भिन्नता यह है कि इन दिनों पप्पू यादव खलनायक से नायक बनने की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि मेरे भीतर इस तरह की क्षमताएं ढूंढ़ने का मतलब नहीं। बहुत संभावना है कि पप्पू यादव की आत्मकथा हिंदी में सबसे अधिक बिकने वाली किताबों में शुमार हो जाए, लेकिन मेरा प्रकाशक रोता है कि मेरी किताबें बिकती ही नहीं।
पप्पू यादव राजनीति में बिकाऊ माल साबित होने के बाद अब साहित्य की दुनिया में भी खुद को साबित करने के लिए पूरी दबंगई के साथ आ खड़े हुए हैं। जबकि मैं लिटरेचर के बाजार में न चलने वाला खोटा सिक्का साबित हो चुका हूं। राजनीति के दरवाजे मेरे लिए पहले ही बंद हो चुके थे, अब साहित्य के संसार से भी मुझे बाहर कर दिए जाने की घड़ी आ गई है। साहित्य अब पप्पू यादवों के लिए खुला मैदान है। प्रकाशक उनके दर पर दस्तक दे रहे हैं। साहित्य का भविष्य अब पप्पूओं के हाथ में सुरक्षित है। रिसर्च स्कॉलर नोट करें कि यह साहित्य का पप्पू यादव युग है।