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एक नए भारत का सपना

मोहनदास
Updated Wed, 01 Jan 2014 03:23 PM IST
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इतिहास में 2013 को हमारी बेचैनी और उत्कंठा भरे वर्ष के रूप में जगह मिलेगी। देश भर में लोग भ्रष्टाचार, महंगाई, बदहाल जिंदगी, गिरती विकास दर और रोजगार के खत्म होते अवसरों की वजह से खासे नाराज और परेशान हैं। पिछले बीस वर्षों में यह पहला मौका है, जब लोगों में इस कदर असंतुष्टि देखी जा रही है। यह बदलाव का साफ संकेत है।


दरअसल दिल्ली में आम आदमी पार्टी की कामयाबी देश के इसी मिजाज को बयां करती है। मिजोरम को छोड़ दें, तो बाकी के चार राज्यों में हुए चुनाव भी लोगों की इसी नाराजगी और बदलाव की चाह की ओर इशारा करते हैं। आज भारत में नब्बे करोड़ लोग चालीस वर्ष से कम आयु के हैं, जिनमें से पचास करोड़ मतदाता हैं। इन सभी के लिए विभाजन, पाकिस्तान, धर्म, जाति और भाषा की तुलना में रोजगार, आर्थिक प्रगति और अवसर जैसे मुद्दे ज्यादा मायने रखते हैं। ये लोग मजदूरी कर और मुफ्त भोजन तथा दवा हासिल कर गरीबी में नहीं रहना चाहते। ये लोग पहले से कहीं अधिक जागरूक हो चुके हैं, जिन्हें झूठे वायदों के जाल में नहीं फंसाया जा सकता। इनमें से कई ऐसे हैं, जिन्हें बीते आठ वर्षों में प्रति व्यक्ति आय के दोगुने होने का फायदा मिला है। टेलीविजन और मीडिया के जरिये इनकी सोच को नया आकार मिला है।


ये लोग एक नया भारत चाहते हैं, जहां विकास, रोजगार, बुनियादी जरूरतों पर जोर दिए जाने के साथ ही बेहतर जिंदगी के अवसर उपलब्ध हों। मगर पिछले तीन वर्षों के दौरान आर्थिक विकास दर में आई गिरावट ने हमें आघात पहुंचाया है, लेकिन हम और संकल्पित हुए हैं। हालांकि इस स्थिति ने सत्ता और क्रोनी कैपिटलिज्म के गठजोड़ को भी उजागर किया। इनमें से कई अब देश को लूटने के जुल्म में जेल की हवा खा रहे हैं। हमारी अदालतें और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) बेहद मुस्तैदी से बदलाव के वाहक बने हुए हैं। ऐसे में हमारे सांसदों पर भी सुशासन का दबाव होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि 2014 उम्मीदों और बदलावों का वर्ष साबित होगा।


शासन के हमारे मॉडल को बदलने का वक्त आ गया है। उम्मीद है कि 2014 के चुनाव इन बदलावों को इंगित करेंगे। भारत के लिए ये चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक साबित होंगे। वे नेताओं की नई पीढ़ी के उदय के गवाह बनेंगे, जो पूरी अवाम, और खासकर युवाओं की जरूरतों को लेकर संवेदनशील होंगे।


अच्छी बात यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की हालत सुधर रही है। चाहे वह अमेरिका हो या यूरोप, चीन हो या दुनिया के बाकी महत्वपूर्ण देश, सभी के आर्थिक हालात सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ी हैं। हालांकि तरलता अब तक के अपने उच्चतम स्तर पर है, लेकिन वित्तीय बाजार भविष्य की गतिविधियों को लेकर काफी सतर्क हैं। यूरोप में पुर्तगाल, इटली, यूनान और स्पेन (पीआईजीएस देश) की अर्थव्यवस्थाएं स्थिर प्रतीत होने लगी है। यह हमारे निर्यात आधारित उद्योगों के लिए अच्छा है। अमेरिका में शेल गैस और तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी के चलते तेल के मूल्य में कमी आ सकती है। इससे वैश्विक राजनीति पर भी असर पड़ेगा। हाल में हमारी सरकार ने कई ऐसे कदम उठाए, जो देश में निवेश के माहौल के लिए अनुकूल साबित हुए। पर्यावरण मंत्रालय में किए गए बदलावों का साफ संदेश है कि गरीबी और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर की जाने वाली रूढ़िवादी राजनीति को बदलने का वक्त आ गया है।


प्याज और सब्जियों के दाम बढ़ती महंगाई की एक प्रमुख वजह बने हैं, लेकिन रिजर्व बैंक यह भी मानता है कि इसका ब्याज दरों में बढ़ोतरी से कोई लेना-देना नहीं है। इसी वजह से 2014 में ब्याज दरों में कमी की उम्मीद की जा सकती है। इससे निवेश को बढ़ावा मिलेगा। थोक मूल्य मुद्रास्फीति केवल 2.5 प्रतिशत है। विनिर्माण और कर-राजस्व की हालत भी खराब है। इन हालात में रिजर्व बैंक पर ब्याज दरों में फिर से बढोतरी न करने का दबाव है। हमारे शेयर बाजार उम्मीदों से ज्यादा अच्छा कर रहे हैं। व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा भी स्थिरता की ओर बढ़ रहा है।


हालांकि सुशासन की स्थापना और भ्रष्टाचार पर लगाम कसने की चुनौती बरकरार रहेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि 2014 के चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र में नई सरकार बनेगी, जो लोगों की नाराजगी को समझते हुए, बेहतर और स्वच्छ प्रशासन की नींव रखेगी। भारत में ही नहीं, पडोसी देशों में भी बदलाव की बयार दिख रही है। रूढिवादियों और आतंकवाद से त्रस्त पाकिस्तान में निर्वाचित सरकार पर कड़े फैसले लेने का दबाव होगा। एक सम्मानित राष्ट्र का दर्जा पाने के लिए जरूरी है कि पाकिस्तान भारत के साथ शांति स्थापित करे और आतंकियों को शरण देने से बाज आए। चुनाव की दहलीज पर खड़े बांग्लादेश में जल्द ही नई सरकार बनेगी। वहीं श्रीलंका में हालात सुधर रहे हैं। दूसरी ओर अपनी अनुचित सक्रियता के चलते चीन अपने पडोसियों से कड़वाहट बढ़ा रहा है। उम्मीद है कि वह हमारी सीमाओं पर तनाव बढ़ाने से बाज आएगा। कुल मिलाकर, 2014 उम्मीद और प्रगति से भरा एक बेहतर वर्ष साबित हो, ऐसी कामना है।
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(लेखक इंफोसिस के पूर्व सीएफओ और ऐरिन कैपिटल के चेयरमैन हैं)
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