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लॉलीवुड को भारत का इंतजार

Thu, 24 Sep 2015 07:52 PM IST
मरिआना बाबर
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भारतीय एयरटेल डिश टेलीविजन पूरे पाकिस्तान में देखा जाता है और खास तौर पर यह रावलपिंडी में सैन्यकर्मियों की पत्नियों के बीच काफी लोकप्रिय है। भले नियंत्रण रेखा पर दोनों मुल्कों के बीच छोटी-मोटी झड़पें हो रही हों, पर 'सास-बहू' वाले धारावाहिकों की पाकिस्तान में काफी मांग है। जो लोग भारतीय राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें विभिन्न चैनलों पर चलने वाले न्यूज टॉक शो देखना अच्छा लगता है। इसके बावजूद पाकिस्तानी दर्शक जी टीवी पर दिखाए जा रहे नए धारावाहिक के प्रोमो से दुखी हैं, जो सांप्रदायिक दंगे की पृष्ठभूमि में एक प्रेम कहानी पर आधारित है और जिसमें हिंदू एवं मुस्लिमों को एक दूसरे के खून का प्यासा दिखाया गया है। अब तक जो दृश्य दिखाए गए हैं, वे काफी भयावह हैं।
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पाकिस्तान के धारावाहिकों में इतना कुत्सित दृश्य कभी नहीं दिखाया जाएगा। मुल्क का बंटवारा एक सच्चाई है। पर आज जब सहिष्णुता का बिल्कुल अभाव है, तब ऐसे धारावाहिक न तो दोनों मुल्कों और न ही दो समुदायों के रिश्ते को बेहतर बना सकते हैं। भारतीय समुदायों के बीच का तनाव खत्म करने में भी यह धारावाहिक कैसे मदद करेगा? टीवी और सिनेमा का दर्शकों पर काफी प्रभाव पड़ता है, लिहाजा घृणा फैलाने वाले ऐसे दृश्य नफरत ही ज्यादा पैदा करेंगे।

भारत को पाकिस्तानी फिल्मों का भी आयात करना चाहिए, ताकि दुनिया भर की फिल्में देखने वाले भारतीय दर्शक लॉलीवुड (पाकिस्तानी फिल्म उद्योग) की फिल्में भी देख सकें। आखिर अब माहिरा और फवाद खान जैसे लॉलीवुड के बड़े कलाकार बॉलीवुड में काम करते हैं। पाकिस्तान के आधुनिक और कव्वाली जैसे शास्त्रीय संगीत के गायक भी भारत में काफी लोकप्रिय हैं।
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पाक टीवी ने कुछ अनूठे धारावाहिक बनाए हैं, जैसे हमसफर, जिसे भारत में जी टीवी ने प्रसारित किया। इसी तरह पाकिस्तानी फिल्मों के पुनरुद्धार की कहानी दुनिया भर की सुर्खियों में है। ऐसे में अगर भारतीय दर्शकों को पाकिस्तानी फिल्म देखने का मौका दिया जाए, तो फवाद और माहिरा खान जैसे सितारों के लिए उनका दिल भी धड़केगा।

आज भारतीय फिल्में पूरे पाकिस्तान में देखी जाती हैं, जहां बजरंगी भाईजान और वेलकम बैक बॉक्स ऑफिस पर बेहद सफल रही हैं। लॉलीवुड ने मंटो फिल्म बनाई है, जो हाउस फुल चल रही है। ऐसा इससे पहले कभी नहीं हुआ कि बॉलीवुड की फिल्म की तुलना में किसी पाक फिल्म की इतनी ज्यादा मांग रही हो। कट्टी-बट्टी के प्रदर्शन के दौरान सिनेमा हॉल की सीटें खाली पड़ी थीं। ऐसी प्रतिस्पर्धा अच्छी बात है, इससे पाकिस्तानी फिल्मों में सुधार आएगा।

पाक सिनेमा पुनर्जीवित कैसे हुआ? कुछ समय पहले तक भी पाकिस्तान में अच्छी फिल्में नहीं बनती थीं, नतीजतन हॉलीवुड और बॉलीवुड की फिल्मों की भारी मांग थी। जैसे ही पाक फिल्मों की मांग बढ़ी, सभी बड़े शहरों में विशाल मल्टीप्लेक्स सिनेमा हॉल बन गए। जीओ और हम जैसे बड़े टीवी घराने भी फिल्म निर्माण और वितरण के व्यवसाय में उतर पड़े हैं।

पाकिस्तानी फिल्मों में पुराना फार्मूला अब काम नहीं करता, क्योंकि दुनिया भर के टीवी चैनल देखने वाली नई पीढ़ी लगातार विदेशी फिल्मों से अपनी फिल्मों की तुलना करती है। लाहौर के बेकॉनहाउस नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ आर्ट्स, इस्लामाबाद में रिफाह यूनिवर्सिटी और कराची में हबीब यूनिवर्सिटी में फिल्मों की पढ़ाई होती है। बॉलीवुड के आइटम नंबरों की नकल में पाक फिल्मों में भी आइटम नंबर डाला जाने लगा है। हालांकि बॉक्स ऑफिस पर बेहद सफल फिल्म बजरंगी भाईजान में आइटम नंबर नहीं है। पर पाक फिल्म ना मालूम अफराद में मसालेदार आइटम नंबर 'बिल्ली' जोड़ा गया है। बेशक बजरंगी भाईजान एक शानदार फिल्म है, पर इसमें पाकिस्तान से संबंधित दृश्यों को गलत ढंग से दिखाया गया है। ऐसा लगता है कि कबीर खान ने सिर्फ दिल्ली में और जामा मस्जिद के पास ही मुसलमान देखे हैं, और वह सोचते हैं कि पाकिस्तान के सभी मुस्लिम इसी तरह दिखते हैं।

आज पाकिस्तान में सेनफ्रांसिस्को एकेडमी ऑफ आर्ट यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट युवा बिलाल लशारी जैसे कई फिल्म निर्देशक हैं। इसी तरह ऑस्कर विजेता निर्माता शर्मीन ओबैद चिनॉय ने देश को पहला पूर्ण एनिमेटेड फिल्म 3 बहादुर दिया है। पाक सिनेमा का भविष्य कैसा है? पाकिस्तान के सभी सितारे भारत में काम कर रहे हैं, जबकि भारत के लोकप्रिय सितारों ने पाकिस्तान की किसी फिल्म में काम नहीं किया है। शाहरुख खान को पाक फिल्मों में काम करने से कौन रोकता है या भारतीय निर्माता फिल्म बनाने पाकिस्तान क्यों नहीं आते? आखिर, वे हॉलीवुड समेत अन्य विदेशी फिल्मों में काम तो करते ही हैं।

साफ है कि राजनीति भारतीय फिल्म निर्माताओं एवं सितारों को पाकिस्तान में काम करने से हतोत्साहित करेगी, पर इतिहास साक्षी है कि कला एवं संस्कृति हमेशा राजनीति से श्रेष्ठ और स्थायी रही है। पाकिस्तान में हिंदू शासन नहीं कर पाए, पर कटासराज मंदिर तमाम राजनीति से बचा हुआ है। उसी तरह भारत में मुसलमान सत्ता में नहीं हैं, पर उनकी विरासत ताजमहल अब भी बचा हुआ है।

खबर है कि महेश भट्ट लॉलीवुड के साथ फिल्म बनाएंगे, ऐसे में अन्य भारतीय फिल्म निर्माता भी पाकिस्तान का रुख कर सकते हैं। भारतीय सितारे चूंकि काफी पैसे लेते हैं, ऐसे में पाकिस्तानी निर्माताओं के लिए उतना भुगतान करना बहुत मुश्किल होगा। मोटे पैसे के लालच में ही पाक सितारे भारत में काम करने जाते हैं।

फिल्मों और टीवी में अगर कड़वे इतिहास की कहानी दिखानी ही हो, तो इसे पेशेवर ढंग और संवेदनशील तरीके से दिखाना चाहिए, ताकि नफरत भरे दृश्य कम दिखें। मुगले आजम, मदर इंडिया, शोले और कई अन्य फिल्में नफरत से आजाद हैं, पर इन फिल्मों ने इतिहास रचा है।
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-लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं
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