दिग्गज सुपर स्टार दिलीप कुमार कई बार पाकिस्तान आ चुके हैं और पाकिस्तानियों ने उनका आगे बढ़कर स्वागत किया, क्योंकि यह उनके अपने बेटे के ही घर आने जैसा था। उनकी प्रसिद्धि और लोकप्रियता न सिर्फ पाकिस्तान के हर कोने तक पहुंच चुकी है, क्योंकि उनकी फिल्में स्थानीय सिनेमा हॉल में दिखाई गई हैं, बल्कि इसलिए भी कि उनका परिवार खैबर पख्तुनख्वा के पेशावर से ताल्लुक रखता था, जहां उनका जन्म 11 दिसंबर, 1922 को मुहम्मद यूसुफ खान के रूप में हुआ था। उनके रिश्तेदार 2005 तक पेशावर में किस्सा ख्वानी बाजार के मोहल्ला खुदाबाद के अपने पैतृक घर में रहते थे। उसके बाद वे वह घर छोड़कर कहीं और चले गए। हालांकि किसी ने भी दिलीप कुमार के पुश्तैनी घर पर कब्जा करने की हिम्मत नहीं की, लेकिन कोई उसकी देखभाल करने के लिए भी आगे नहीं आया, लिहाजा धीरे-धीरे वह इमारत खस्ताहाल होने लगी। इसके बावजूद स्थानीय पर्यटक या विदेशी उस घर को देखने आते रहे, जहां कभी दिलीप कुमार का जन्म हुआ था।
एक पख्तून होने के नाते मैं बहुत गौरवान्वित महसूस करती हूं और हैरान भी हूं कि तमाम महान भारतीय फिल्म स्टारों के ताल्लुकात उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत या खैबर पख्तुनख्वा से ही क्यों था, पाकिस्तान के किसी अन्य हिस्से से क्यों नहीं? चाहे वह राज कपूर हों या अमजद खान, सुरिंदर कपूर हों या विनोद खन्ना, सभी का जन्म यहीं हुआ था। मधुबाला का जन्म हालांकि दिल्ली में हुआ था, लेकिन उनके पिता अताउल्लाह खान पेशावर घाटी से यूसुफजई पश्तून थे।
मुझे याद है, दशकों पहले दिलीप कुमार के पाकिस्तान आने पर मैं इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायुक्त के आवास इंडिया हाउस में उनसे मिली थी। वह वैसे ही थे, जैसा मैंने सोचा था। अपनी स्पेशल हेयरकट उन्होंने कभी नहीं बदली। एक बेहद आत्मीय मुस्कराहट के साथ उन्होंने मेरा अभिवादन कर अपनी बगल में मुझे बैठने के लिए कहा था और फिर हमने आराम से बातचीत की थी। वह पाकिस्तान पहुंचने पर काफी खुश थे और कह रहे थे कि जब वह अपने परिवार के साथ यहां रहते थे, उस दौर की तमाम बातें उन्हें याद आ रही हैं। मुझे यह याद नहीं है कि उस अवसर पर ली गई तस्वीरें मैंने कहां रखी हैं, क्योंकि वे भारतीय उच्चायुक्त द्वारा मुझे भेजे गए थे। एक अन्य अवसर पर भी मैं उनसे मिली थी।
तब एक स्थानीय दैनिक के लिए मैंने उनका इंटरव्यू लिया था। आज मैं दिलीप कुमार को इसलिए याद कर रही हूं, क्योंकि सैकड़ों साल पुराने किस्सा ख्वानी बाजार स्थित करीब एक सदी पुराने उनके पुश्तैनी घर के फिर से पुनरुद्धार की कोशिश की जा रही है। वर्ष 2013 में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया था। ऐसी कोशिश की जा रही है कि मौजूदा मालिकों से खरीदे जाने के बाद इस घर को संवारा जाए और संग्रहालय में तब्दील किया जाए। पेशावर एक ऐसा शहर है, जहां तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने कई आतंकवादी हमले कर बुनियादी ढांचे को नष्ट किया और कई बड़े पुख्तून राजनेताओं की हत्या कर दी। पेशावर स्थित पुरातत्व विभाग इस मकान के अलावा सदियों पुरानी कुछ दूसरी इमारतों का भी पुनरुद्धार करना चाहता है। दिलीप कुमार के घर का मौजूदा मालिक हाजी अली कादिर हैं, जिन्होंने हाल ही में मीडिया को बताया कि वह दो अरब से एक रुपया कम में भी यह इमारत नहीं बेचेंगे। खैबर-पख्तुनख्वा प्रांत में पुरातत्व और संग्रहालयों के निदेशक अब्दुल समद का कहना है, यह हमारी सांस्कृतिक विरासत है और हम इसे संरक्षित करने में गर्व महसूस करते हैं। हमें बहुत गर्व है कि दिलीप कुमार और राज कपूर पेशावर से थे। पुरातत्व विभाग ने बॉलीवुड के दिग्गज राज कपूर के पुश्तैनी मकान को भी खरीदने का फैसला किया है, जो उसी के पड़ोस में है।
कपूर हवेली में ही 1924 में राज कपूर का जन्म हुआ था। कुछ समय पहले पाकिस्तान सरकार ने जब दिलीप कुमार के घर के नवीनीकरण का फैसला किया, तो इस दिग्गज अभिनेता ने ट्विटर पर पेशावर के अपने पैतृक घर की कुछ तस्वीरें साझा की थीं। 97 वर्षीय अभिनेता ने पेशावर के लोगों से अपने घर की और तस्वीरें साझा करने का भी आग्रह किया। उनकी पत्नी सायरा बानो ने भी पाकिस्तान सरकार के इस कदम की सराहना की थी। नवाज शरीफ के दौर में विदेश मंत्री रहे खुर्शीद कसूरी, जो दिलीप कुमार से मिले थे, उन्हें पाकिस्तान की विदेश नीति के संबंध में अपनी एक पुस्तक भेंट करना चाहते हैं। वह कहते हैं कि बहुत पहले भारत-पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधों के बीच दिलीप कुमार ने बड़ी भूमिका निभाई थी, जिसके बारे में लोग नहीं जानते।
दिलीप कुमार की उस भूमिका के बारे में खुर्शीद कसूरी ने अपनी किताब में लिखा है। कसूरी लिखते हैं, सायरा बानो ने मुझे बताया कि दिलीप साहब दो बार गुप्त मिशन पर पाकिस्तान आए थे। उन्हें भारत सरकार के विशेष विमान से इस्लामाबाद ले जाया गया था। मेरा मानना है कि पहली यात्रा उन्होंने जिया उल हक के शासन काल में की थी और दूसरी यात्रा हाल ही में।
लेकिन ये गुप्त मिशन क्या थे, इसका कोई ब्योरा नहीं है। नई दिल्ली से इस्लामाबाद तक अनौपचारिक संदेशों को ले जाने के लिए संभवत: यह यात्रा हुई होगी, जब तनाव पैदा हुआ होगा। इसमें कारगिल युद्ध का भी जिक्र है, जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नवाज शरीफ को फोन किया था।
कसूरी अपनी किताब में लिखते हैं कि वाजपेयी ने नवाज शरीफ से बात करने के लिए दिलीप कुमार को फोन पकड़ा दिया था। दिलीप साहब की आवाज सुनकर शरीफ हैरान रह गए थे। दिलीप साहब ने तब नवाज शरीफ से कहा था, 'मियां साहिब, हमें आपसे यह उम्मीद नहीं थी, क्योंकि आपने हमेशा पाकिस्तान और भारत के बीच अमन बहाली का दावा किया है। एक भारतीय मुस्लिम के रूप में मैं आपको बताता हूं, कि पाकिस्तान और भारत के बीच तनाव होने पर भारतीय मुसलमानों की स्थिति बहुत असुरक्षित हो जाती है और उन्हें अपना घर छोड़ना भी मुश्किल हो जाता है। कृपया इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कुछ करें।'