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तमिलनाडु में सियासी हलचल, अन्नाद्रमुक और भाजपा के बनते-बिगड़ते रिश्ते

एम भास्कर साई Published by: भास्कर साई Updated Thu, 19 Nov 2020 01:33 AM IST
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एआईएडीएमके-भाजपा - फोटो : ANI

अब जबकि कोविड-19 के आंकड़े नीचे आ रहे हैं, तमिलनाडु में चुनावी बुखार जोर पकड़ रहा है। हालांकि राज्य विधानसभा के चुनाव होने में अभी पांच महीने से ज्यादा का समय बचा है, मगर इस दक्षिणी राज्य में चुनावी रंग चढ़ने लगा है और प्रमुख राजनीतिक दलों ने चुनाव के लिए कमर कस ली है। निर्वाचन आयोग ने भी 16 नवंबर को मतदाता सूची का मसौदा जारी कर दिया है। 



सूत्रों की मानें, तो अनौपचारिक तौर पर संभावित गठबंधनों पर चर्चा शुरू हो चुकी है और राजनीतिक पार्टियां सीटों के बंटवारे और अन्य शर्तों के बारे में एक-दूसरे से बातचीत करने लगी हैं। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले अन्नाद्रमुक और भाजपा के बीच हुए गठबंधन ने बेहद खराब प्रदर्शन किया था, तमिलनाडु में उसे मात्र एक सीट मिली, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने देश भर में भारी जीत दर्ज की थी। लोकसभा चुनाव के बाद हालांकि दोनों दलों ने गठबंधन धर्म पर टिके रहने की बात की थी, लेकिन राज्य में जो ताजा सियासी घटनाक्रम चल रहा है, उससे ऐसा प्रतीत नहीं होता है। यह विवाद तब सामने आया, जब भाजपा ने राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी अन्नाद्रमुक पर 'करुप्पर कूटम' नामक यूट्यूब चैनल के खिलाफ तत्काल कोई सख्त कदम न उठाने पर नाराजगी जताई, जिसने भगवान मुरुगा से संबंधित आध्यात्मिक साहित्य 'कंध सश्टि कवसम' के खिलाफ टिप्पणी की थी। 


भाजपा प्रवक्ता टी नारायणन ने हताशा व्यक्त करते हुए कहा कि न तो मुख्यमंत्री एडापड्डी के पलानीस्वामी और न ही उपमुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम ने अपमानजनक क्लिप के लिए चैनल की निंदा की। उन्होंने यह भी दावा किया कि भाजपा द्वारा शिकायत दर्ज करने के चार दिन बाद ही पुलिस ने कार्रवाई की। इसके जवाब में अन्नाद्रमुक के प्रवक्ता कोवई सत्यन ने कहा कि उनकी पार्टी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह कुछ घटनाओं पर भाजपा जैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करे। उन्होंने कहा कि अन्नाद्रमुक एक सेक्यूलर पार्टी के रूप में जानी जाती है, जो समाज के सभी वर्गों का पक्ष लेती है। हमारा दर्शन पूर्व मुख्यमंत्री सी एन अन्नादुरई के विचार पर आधारित है, जिसका एमजीआर और जयललिता ने अनुसरण किया। 


इसके बाद अन्नाद्रमुक के संयुक्त संयोजक पलानीस्वामी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने नई शिक्षा नीति में केंद्र सरकार द्वारा पेश की गई तीन भाषा नीति को खारिज कर दिया। पलानीस्वामी ने कहा कि उन्हें केंद्र के इस कदम से पीड़ा और दुख हुआ। इससे साफ पता चलता है कि अन्नाद्रमुक भाजपा की हर बात को नहीं मानने वाली है। इसके बाद, पलानीस्वामी ने केंद्र के उस सुझाव को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि राज्यों को अनुमानित जीएसटी घाटे के लिए बाजार से कर्ज लेना चाहिए। इससे एक बार फिर भाजपा को निराशा हुई। ताजा घटना यह है कि अन्नाद्रमुक सरकार ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एल मुरुगन द्वारा प्रस्तावित वेत्रीवेल यात्रा की अनुमति देने से इन्कार कर दिया। हालांकि, अनुमति न मिलने के बावजूद मुरुगन और भाजपा कार्यकर्ता रैली को आगे बढ़ा रहे हैं और पुलिस उसे रोकने का प्रयास कर रही है।


इन सबके बीच केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के कद्दावर नेता अमित शाह एक आयोजन में शिरकत करने के लिए राज्य के दौरे पर आने वाले हैं और संभावना है कि वह 21 नवंबर को पलानीस्वामी से मिलेंगे। बातचीत के एजेंडे में चुनावी गठबंधन शीर्ष प्राथमिकता में है। सूत्रों का कहना है कि अन्नाद्रमुक आलाकमान इसके पहले विकल्पों की तलाश कर रहा है और चिंतित है कि गठबंधन में भाजपा के होने से अल्पसंख्यकों से पार्टी की दूरी बढ़ेगी, जो पहले से ही उसके कट्टर प्रतिद्वंद्वी द्रमुक के समर्थन में हैं। इस तरह का संकेत इससे भी मिलता है कि अन्नाद्रमुक के मुखपत्र में 16 नवंबर को प्रकाशित एक लेख में भाजपा पर कटाक्ष किया गया था और ऐसी तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई थी कि अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम सभी धर्मों और जातियों को बराबर सम्मान देती है।


इस बीच, दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता की करीबी वी के शशिकला की रिहाई की भी उम्मीद है, जो आगामी चुनाव में अन्नाद्रमुक की जीत में प्रमुख भूमिका निभा सकती हैं। पार्टी कार्यकर्ता 'चिन्नम्मा' (छोटी मां) की रिहाई पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं और आगे क्या होगा, इस पर पूरी तरह से पर्दा पड़ा हुआ है। अगर शशिकला अन्नाद्रमुक के साथ अपने भतीजे टीटीवी दिनाकरन के नेतृत्व वाली एएमएमके का विलय करने का फैसला करती हैं, तो यह सत्तारूढ़ दल को बढ़त देगा और उसकी जीत की संभावना बढ़ाएगा। इसके विपरीत, अगर कुछ महत्वपूर्ण लोग अन्नाद्रमुक को छोड़कर एएमएमके में शामिल हो जाते हैं, तो पन्नीरसेल्वम-पलानीस्वामी के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए यह महंगा साबित हो सकता है और विपक्षी द्रमुक को इससे फायदा होगा, जो पिछले 10 वर्षों से सत्ता से दूर है। द्रमुक नेता स्टालिन के बड़े भाई एम के अलागिरी ने संकेत दिए हैं कि वह अपनी नई राजनीतिक पार्टी बना सकते हैं। एक टीवी चैनल से उन्होंने कहा है कि वह अपने समर्थकों से राय लेकर ही आगे का फैसला करेंगे।


इस बीच, यह भी कहा जा रहा है कि राज्य के दौरे पर आ रहे अमित शाह से भी उनकी मुलाकात हो सकती है, हालांकि अलागिरी ने इससे इनकार किया है। अन्नाद्रमुक खेमे के सूत्रों का कहना है कि पलानीस्वामी और पन्नीरसेल्वम की जोड़ी, जिन्होंने हाल ही में कटु बयानबाजी के बाद समझौता किया है, सभी विकल्पों को ध्यान से देख रही है और भाजपा से दूर जाने के अच्छे और बुरे परिणामों के बारे में जानती है। भाजपा जैसे सर्वशक्तिशाली सहयोगी के बिना चुनाव का सामना करना इतना आसान निर्णय नहीं है। साथ ही, भाजपा के साथ होने से अन्नाद्रमुक को भगवा रंग मिल सकता है। जाहिर है, जब राज्य में अमित शाह का दौरा होगा, तब राज्य की सियासत में दिलचस्प मोड़ देखने को मिल सकते हैं।

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