अमेरिकी सेना के पूर्व अधिकारी जॉन स्पेंसर द्वारा ऑपरेशन सिंदूर को लेकर की गई भारत की प्रशंसा के बाद अब पेंटागन के पूर्व अधिकारी माइकल रुबिन की पाकिस्तान पर की गई टिप्पणी उसके झूठे दावों की पोल तो खोलती ही है, इससे यह भी पता चलता है कि वैश्विक समुदाय पाकिस्तान के दुष्प्रचार को लेकर क्या रुख रखता है। एक संप्रभु राष्ट्र के लिए रुबिन द्वारा प्रयुक्त शब्दों का समर्थन न करते हुए भी उनके संदर्भ को समझना जरूरी है।
वैसे तो पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का उपकरण बनाकर क्षेत्रीय अस्थिरता फैला रहा है और आतंकवादियों को समर्थन देने का उसका पुराना इतिहास भी रहा है, जिसकी स्वीकारोक्ति पाकिस्तान के रक्षा मंत्री भी कर चुके हैं, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ जो सुनियोजित दुष्प्रचार अभियान छेड़ा-उसकी हवा बेशक भारत ने निकाल दी हो-वह चिंताजनक तो है ही।
दरअसल, पाकिस्तान की प्रचार मशीनरी का मुख्य हथियार है झूठ और आधे-अधूरे तथ्यों का इस्तेमाल। अब पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार के उस बयान को ही लें, जिसमें वह दावा करते हैं कि ब्रिटेन के अखबार द डेली टेलीग्राफ ने पाकिस्तानी वायुसेना को आकाश का निर्विवाद राजा कहा, जबकि यह दावा एआई द्वारा निर्मित तस्वीर पर आधारित था।
इससे पहले भी उसने हमारे एस-400 और ब्रह्मोस मिसाइल बेस को नुकसान पहुंचाने जैसी कई झूठी खबरें फैलाई थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बदलते बयान लतीफा बनते जा रहे हैं, जिसमें अब उन्होंने कतर में कहा कि उन्होंने मध्यस्थता नहीं कराई, बस युद्ध रोकने में मदद की है।
दूसरी तरफ, अमूमन भारत-विरोधी रुख रखने वाले अमेरिकी अखबारों में, द न्यूयॉर्क टाइम्स के बाद अब द वाशिंगटन पोस्ट ने भी यह माना है कि सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान को बहुत नुकसान पहुंचा है, जिससे पाकिस्तान के झूठे दावों की पोल ही खुलती है। पाकिस्तान का यह दुष्प्रचार दरअसल उसकी अपनी कमजोरियों को छिपाने का ही प्रयास है।
आर्थिक बदहाली, आतंकवाद को पनाह देने के आरोप और आंतरिक अस्थिरताओं से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए भारत को खलनायक के रूप में पेश करना एक सुविधाजनक रणनीति हो सकती है, लेकिन उसे समझना होगा कि दुष्प्रचार की आड़ में अस्थिरता फैलाने की नीति न केवल क्षेत्रीय शांति के लिए हानिकारक है, बल्कि यह उसे और गहरे संकट में धकेल रही है।