पड़ोसी गुप्ता जी फरमाइश ले आए, आप तो हिंदी के लेखक हैं, प्रधानमंत्री जी को लिख दीजिए एक चिट्ठी। पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है। वाजपेयी जी फरमा गए हैं कि आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं। इसीलिए सरकार पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों से भी पत्नी-सा नेह निभा रही है।
मेरी गति सांप-छछूंदर जैसी हो गई। उन्हें समझाना शुरू किया, भारत इतना बड़ा देश है, तो उसका प्रधानमंत्री कितना बड़ा आदमी हुआ! आपको दिसंबर में जुकाम सताता है, पड़ोसी का आवारा पूत आपकी लाड़ली बिटिया को छेड़ता है, पत्नी आपकी नाक में दम किए रहती है, ऐसी छोटी-मोटी बातों को लेकर लिखते हैं क्या इतने बड़े आदमी को चिट्ठी? इतना विकास देश का हुआ, वह पब्लिक को नहीं दिखा, इत्ता-सा विकास मंत्रियों ने स्वयं का कर लिया, सो देख लिया। मिठाई बनाने वाला क्या उसे चखेगा भी नहीं?
इधर झाड़ू पार्टी ने दिल्ली में झाड़ू मार दी, उधर इतने कीचड़ में भी तीन राज्यों में कमल खिल गया। उधर एक भारतीय राजनयिक का अपमान हो गया। काका कलाम और शाहरुख खान जैसी हस्तियों का अपमान हुआ, देश ने कुछ कहा? लेकिन इस बार हमें क्रोध आ गया है। जन्नत बिना मरे नहीं मिलती और अमेरिका बिना नंगे हुए नहीं मिलता। जितना बड़ा सिर होता है, उतना ही ज्यादा सिरदर्द होता है। अरे गुप्ता जी, मक्खी मारने को तोप क्यों चलवाते हो?
लाख समझाने पर भी गुप्ता जी टस से मस नहीं हुए। वह कहने लगे, मेरी समस्या भले व्यक्तिगत है, पर वह देश के लाखों पेंशनधर्मियों की भी है। असल में, सरकार ने हमें पेंशन न देकर दोगुना फंड देने का करार दिया था। सेवानिवृत्ति के समय मुझे कुल तीस लाख रुपये मिले। अब मेंढकी को घोड़ी का खाना दोगे, तो वह पोदीने के पेड़ पर तो चढ़ेगी ही। कार खरीद ली, बाथरूम में टाइल्स लगवा ली, तीन साल में बारह लाख खर्च हो गए। इस गति से सात-आठ साल में ठन-ठन गोपाल हो जाऊंगा।
रिटायरमेंट के समय रिश्तेदारी में अमीरी का हल्ला हो गया। बेटा सोचता है, दौलत पर सांप बनकर बैठा हूं। उसे कौन समझाए कि रिटायर्ड अफसर पुराना अखबार होता है। रखा धन तो कुबेर का भी खाली हो जाता है। इसलिए सरकार चाहे, तो अपने फंड का हिस्सा, हमसे वापस ले ले, लेकिन हमें आखिरी वेतन की आधी पेंशन प्रतिमाह दे दे। यदि आपको सेवानिवृत्त लोगों से जरा-सी भी सहानुभूति है, तो यह पत्र अवश्य लिखेंगे।