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सेना के दायरे से बाहर

शिवदान सिंह Published by: Raman Singh Updated Mon, 04 Nov 2019 06:25 PM IST
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शिवदान सिंह - फोटो : a

गृह मंत्रालय ने केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा है, जिसमें असम राइफल्स को भारत तिब्बत सीमा पुलिस में मिलाने का आग्रह है। असम राइफल्स अर्धसैनिक बल है और इस प्रस्ताव की मंजूरी के बाद यह केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की श्रेणी में आ जाएगा। अब तक इसका नियंत्रण तथा संचालन सेना द्वारा होता है। पर इस प्रस्ताव की मंजूरी के बाद अन्य सशस्त्र बलों की तरह इसका संचालन भी पुलिस अधिकारियों द्वारा होगा। आज पूरा पूर्वोत्तर तथा देश के अन्य राज्य घुसपैठ की समस्या से जूझ रहे हैं।



यह समस्या उन केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की कार्य शैली के कारण है, जिनकी जिम्मेदारी भारत-बांग्लादेश सीमा की निगरानी एवं सुरक्षा की थी। यह विडंबना है कि देश के सबसे पुराने तथा अकेले अर्धसैनिक बल असम राइफल्स को भी सेना के नियंत्रण से हटाया जा रहा है। अंग्रेजों ने इस बल का गठन 1835 में पूर्वोत्तर के राज्यों में सेना की सहायता एवं खासकर भारत-म्यांमार सीमा की निगरानी के लिए किया था। आजादी से आज तक इस बल का गौरवशाली इतिहास रहा है। इसके कारण पूर्वोत्तर में उग्रवाद पर नियंत्रण रहा तथा म्यामांर सीमा से घुसपैठ भी नहीं हुआ।


सोशल मीडिया के युग में आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां कई गुना बढ़ गई है। घुसपैठिये देश में स्लीपर सेल के रूप में छिपे रहते हैं। असम राइफल्स सेना के नेतृत्व में पूर्वोत्तर में अपना कार्य सफलतापूर्वक कर रहा था। पर यह दुर्भाग्य है कि कुंठित भावनाओं, स्वार्थ तथा लंबी गुलामी के असर से राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर भी एकीकरण एवं संयुक्त भावना की कमी देखने में आती है। इसी का परिणाम है कि नौकरशाही के अंग भारतीय पुलिस सेना के अधिकारी असम राइफल्स को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की सूची से जोड़ना चाहते हैं, ताकि इस बल के उच्च पदों पर इनका कब्जा हो सके। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में दो प्रकार के अधिकारी होते हैं- इनके स्वयं के कैडर के अधिकारी, जो ज्यादातर बटालियन स्तर तक ही पहुंच पाते हैं, तथा दूसरे, प्रतिनियुक्ति पर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी, जो उच्च स्तर पर इन बलों की कमान संभालते हैं।


आईपीएस अधिकारियों को आतंकवाद नियंत्रण ऑपरेशनों का जमीनी अनुभव नहीं होता, जिस कारण अक्सर इन बलों को भारी क्षति उठानी पड़ी है। छत्तीसगढ़ में 2013 में सुकमा में कांग्रेस की चुनावी यात्रा पर हमला तथा 2017 में सुकमा में ही सीआरपीएफ के एक कैंप पर हमला इसके उदाहरण हैं। दूसरी ओर, जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आत्मघाती हमले के अलावा आज तक और कोई ऐसी घटना नहीं हुई, क्योंकि इस राजमार्ग को सेना अपनी निगरानी में रखती है। यदि समस्या के कारणों का पता किया जाता, तो घुसपैठियों को बांग्लादेश-भारत की सीमा पर रोकने वाले केंद्रीय सुरक्षा बल की पहचान करके संबंधित अधिकारियों एवं कर्मियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए थी, जैसा कि सेना में होता है। यदि इतनी घुसपैठ सेना द्वारा रक्षित सीमा से हुई होती, तो अब तक बहुत से अधिकारियों को कोर्ट मार्शल के जरिये सजा सुनाई गई होती।


चूंकि पुलिस और सेना के काम करने का दायरा अलग-अलग होता है, ऐसे में अर्धसैनिक बल के रूप में सेना के अधीन काम करने वाले असम राइफल्स को पुलिस के अधीन करना व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता। इसके अलावा पूर्वोत्तर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भी असम राइफल्स को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के अधीन करने का बहुत औचित्य नहीं है।    

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