आज से एक और नया वर्ष शुरू हो रहा है, जो एक नई उम्मीद लेकर आया है। वर्ष का बदलना सिर्फ कैलेंडर बदलना नहीं है, बल्कि पुरानी और गलत चीजों की जगह पर नई और अच्छी चीजों को अपनाने का अवसर भी है। संयोग से यह नया वर्ष राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती का वर्ष भी है। गांधी जी को सिर्फ हम भारतीय ही याद नहीं करते हैं, बल्कि पूरी दुनिया में उन्हें प्यार से याद किया जाता है। दुनिया ने उन्हें अहिंसा का प्रतीक मान लिया है। ऐसा नहीं है कि गांधी से पहले अहिंसा को जीने वाले लोग नहीं थे, लेकिन यह गांधी के व्यक्तित्व का ही असर है कि लोगों ने उन्हें अहिंसा का प्रतीक मान लिया है। इसकी मुख्य वजह यह है कि गांधी जी ने अहिंसा को सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं अपनाया, बल्कि वह इसे समाज के बीच लाए और यह दिखाया कि पूरा समाज अहिंसक हो सकता है और सब मिलकर एक अहिंसक व्यवस्था खड़ी कर सकते हैं। अभी कुछ समय पूर्व मैं लगभग एक माह तक मैक्सिको में काम कर रही थी, वहां के लोगों ने मुझे गांधीवादी मानते हुए कहा कि यहां तुम्हारी यानी गांधीवादी विचार की ही जरूरत है।
ऐसा सिर्फ पढ़े-लिखे लोग ही नहीं, बल्कि सामान्य लोग भी कह रहे थे कि आज अगर हमको कोई बचा सकता है, तो गांधी की अहिंसा का विचार ही बचा सकता है। तो मैं सोचती हूं कि इस नए वर्ष में अगर हम वाकई गांधी जी की 150 वीं जयंती मना रहे हैं, तो हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि कैसे समाज में हिंसा को कम से कम करें।
यह दुखद है कि अहिंसा के प्रतीक गांधी के देश में इन दिनों कई तरह की हिंसा प्रचलित है, जिनमें से भीड़तंत्र की हिंसा उफान पर है। यह एक ऐसी हिंसा है, जिसमंे किसी अपराधी का चेहरा सामने नहीं होता, इसलिए इसके अपराधी अक्सर कानून की नजर से बच जाते हैं। अगर यह हिंसा जारी रही, तो निर्दोष और बेगुनाह लोग मारे ही जाते रहेंगे, और इसके लिए भारत को कभी माफ नहीं किया जा सकेगा। हिंसा से देश की छवि खराब होती है। आजकल कोई भी बात छिपी नहीं रहती है। मैं जहां भी विदेशों में जाती हूं, लोग पूछते हैं कि आखिर भारत में इतनी मॉब लिंचिंग क्यों हो रही है, क्या हो गया है भारत को? इसलिए इस नए वर्ष में हमारी सरकार को, प्रशासन को, नागरिकों को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए और हिंसा को खत्म करने के लिए कदम उठाना चाहिए। यह जो एक तरह का पागलपन पैदा किया जा रहा है, लोगों को हिंसा के लिए उकसाया जा रहा है, यह बहुत ही गलत है। नए वर्ष के मौके पर मैं बस यही उम्मीद करती हूं कि हमारे देश के लोग इसे समझेंगे और मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाएंगे। हमारे देश में कैसे हर वर्ग, हर धर्म, हर जाति के लोग मिल-जुलकर रहें और किस तरह से समाज के आखिरी व्यक्ति तक देश के विकास का लाभ पहुंचे, नए साल में हमें इसकी कोशिश करनी चाहिए।
यही नहीं, महिलाओं के खिलाफ भी हिंसा बढ़ी है। लगातार बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं। लगता है कि मनुष्य अब राक्षस हो गया है। क्या इस नए वर्ष में हम उम्मीद कर सकते हैं कि हमारी बहन-बेटियां निर्भय होकर कहीं आ-जा सकती हैं, बिना भेदभाव के अपना काम-काज कर सकती हैं? नए वर्ष में हमें इसके लिए संकल्प लेना होगा और महिलाओं की तरक्की के लिए राह आसान बनानी होगी। इसके अलावा हमारी व्यवस्था में भी हिंसा भरी हुई है। आजादी के सत्तर साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन अब भी हमारे बहुत से बच्चे कुपोषित हैं। मैं इसे भी हिंसा मानती हूं। खाद्य पदार्थों में मिलावट पाई जाती है, जो जहर के समान होता है। तो नए साल में ऐसी हिंसा को भी खत्म करने की कोशिश होगी, मुझे ऐसी उम्मीद है।