देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था किसानों के बिना अधूरी-सी है। किसानों को लुभाने के प्रयास राजनीतिक स्तर पर तो खूब किए जाते हैं, लेकिन अहम सवाल यह भी है कि इसके बावजूद किसानों की हालत बहुत अच्छी क्यों नहीं है। क्यों देश के अलग-अलग कोनों से किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं।
किसानों के बीच जाकर बैठते ही उनकी निराशा समझ में आती है। वे तमाम गणितों से दूर होकर एक ही बात कहते हैं कि पहले जैसी बात न रही। अब बीज खरीदने पड़ते हैं और खाद भी बहुत लगता है। जमीन को उत्पादन मशीन बनाकर उससे ज्यादा पैदा करने के फेर में वह कर्ज लेता है और आशानुरूप उत्पादन न होने पर जीवन खत्म करने जैसे फैसले भी ले लेता है। एक जमाने में किसान के पास पर्याप्त मात्रा में बीज का भंडार होता था, जिससे वह अपने खेत के बीज से नई फसल उगा लिया करता था। रासायनिक खाद की जगह वह गोबर खाद का इस्तेमाल करता था। इसके लिए पशु पाले जाते थे।
लेकिन समय बदला और खेती-किसानी भी बदल गई। गोबर खाद की जगह रासायनिक खाद आ गए और देसी बीजों का स्थान संकर और नए बीजों ने ले लिया। खेती के तमाम तौर-तरीकों के बदलने के बावजूद किसान की हालत नहीं बदली। अधिक उपज के लालच में किसान अपने बीज उगाने के अधिकार से वंचित होता जा रहा है। पहले वह फसल के समय ही अगली बार के लिए बीज बचा लिया करता था, लेकिन अब उसे नया बीज खरीदने के लिए कर्ज लेना पड़ता है। पपीते के नए किस्म का बीज एक लाख, दस हजार रुपये किलो आता है।
रासायनिक खाद के स्थान पर गोबर और केंचुए खाद का प्रयोग करना किसान ने कम कर दिया और बेटी की शादी से ज्यादा चिंता उसे इस बात की सताने लगी कि कितने बोरे खाद लाने हैं। अब जब बीज विधेयक को लेकर देश भर में बहस छिड़ी है, तब यह भी ध्यान देना होगा कि किसान क्या चाहता है। नए बीज से उत्पादन जरूर बढ़ेगा, लेकिन हर साल जो लाखों टन गेहूं सड़ जाता है, उसका क्या होगा।
कोल्ड स्टोरेज की कमी के कारण किसान आलू की फसल यों ही छोड़ देता है। ऐसे में वह ज्यादा उत्पादन का करेगा क्या? मेरठ के करनावल में सतीश कुमार जैसे किसान हैं, जो अब इस जिद पर आ गए हैं कि खुद को बचाना है, तो पुराने ढंग की जैविक खेती की ओर बढ़ना होगा। अपना बीज और अपनी खाद हो, तो किसान के लिए इससे बड़ी खुद्दारी कोई हो नहीं सकती।
सतीश कुमार ही क्यों, इसी जिले के भूमी गांव के सुबोध त्यागी ने छोटा-सा प्रयास किया है कि जैविक खेती के सहारे अपनी जमीन को बंजर होने से बचाया जाए। बीज विधेयक लाने के पक्ष में कई तर्क हो सकते हैं, पर किसान के मुंह से यही निकलता है कि अब तो बीज भी हमारा न रहा।
संकर बीजों का बढ़ता चलन और रासायनिक खादों पर निर्भरता किसान से उसका बीज उत्पादन करने के हक और जमीन की उर्वरता को पूरी तरह खत्म कर देगी। भाकियू के राकेश टिकैत सहित अनेक किसान नेता बीज विधेयक का विरोध कर चुके हैं। यह संभव है कि आम किसान को इस विधेयक की तकनीकी पेचीदगियों के बारे में पता न हो, लेकिन वह अपना हक चाहता है।
मेरठ जिले के सतीश कुमार और सुबोध त्यागी जैसे ऐसे कई और किसान हैं, जो जैविक खेती के सहारे जमीन को अपनी मां की तरह सहेजने का कार्य कर रहे हैं। नीतियां सरकारें बनाती हैं। दावा भी किया जाता है कि इससे सभी को फायदा होगा, पर यही ढर्रा रहा, तो बीज उत्पादन करने वाला किसान बीज खरीदने वाला उपभोक्ता बन जाएगा।
रासायनिक खादों के कारण जमीन बंजर हो जाएगी। अब भी देर नहीं हुई है। मेरठ के अलग-अलग गांवों में जैविक खेती के पक्ष में चल रहे अभियान को पूरे देश में ले जाना होगा। किसान को यह समझाना होगा कि ज्यादा लागत लगाकर कम मुनाफा कमाने से तो कहीं अच्छा है कि वह कम लागत रखे और ज्यादा बचत के तरीके अपनाए। जान की बाजी लगाकर मुनाफा कमाने का चलन रहा, तो किसानों की आत्महत्या नहीं रुकेगी।