ऐसे समय में, जब हिमालयी क्षेत्रों में कहीं बांध बनाने के लिए बारूदी सुरंगें बिछाई जा रही हैं, तो कहीं विकास के नाम पर पहाड़ों की छाती चीरकर सड़कें खोदी जा रही हैं और हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिकी को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है, हिमालय दिवस इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और विकास के नए ढांचे तैयार करने की दिशा में एक अवसर हो सकता है। हिमालय दिवस मनाने की शुरुआत इसी उद्देश्य से की गई थी कि हिमालय की स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल दीर्घकालीन विकास नीतियां बनें, जिनमें इस क्षेत्र के पर्वतों, हिमनदों, नदियों, वनों, जलागम क्षेत्रों, लोगों, वन्य जीवों एवं वनस्पतियों के संरक्षण और संवर्धन की चिंता निहित हो।
वास्तव में हिमालय दिवस 2010 में पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों, विद्वानों एवं सामाजिक कार्यकर्ता को हिमालयी क्षेत्र के सतत विकास एवं हिमालयी पारिस्थितिकी को स्थिरता प्रदान करने के लिए सामाजिक जागरूकता फैलाने के लिए हिमालय दिवस मनाने की जरूरत महसूस हुई। हैस्को ने मई, 2010 में तमाम हिमालयी सरोकार से जुड़े तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के सामाजिक कार्यकर्याओं ने भागीदारी की। इन चर्चाओं के ही बीच कुछ अहम सवाल भी खड़े हुए कि क्या हिमालय संरक्षण की इन बहसों में सबकी भागीदारी है? क्या इससे एक सामूहिक समझ तैयार होती है? उसी दौरान यह समझ विकसित हुई कि इस काम में सबकी भागीदारी जरूरी है और इसके प्रति जागरूकता फैलाने तथा हिमालय के संरक्षण का सामाजिक संदेश प्रसारित करने के लिए हिमालय दिवस मनाना जरूरी है।
इसके लिए सामूहिक रूप से नौ सितंबर को हिमालय दिवस के रूप में मनाने का विचार किया गया। नौ सितंबर को हिमालय दिवस के रूप में स्वीकार करने के पीछे स्पष्ट तर्क थे। पहला, नौ की संख्या अपने आप में परिपूर्ण मानी जाती है और हिमालय भी अपने आप में समग्र है। इसलिए 9वें महीने की 9वीं तारीख को इसकी संपूर्णता का प्रतीक माना गया। फिर सितंबर का महीना चार बातों के लिए पहाड़ों में महत्व रखता है- पहला, वर्षा के बाद इसी महीने पहाड़ों में पानी के धारे फूटते हैं, दूसरा इस समय हिमालय के दर्शन अदभुत होते हैं, गर्मी का धुंधलापन वर्षा के बाद बैठ जाता है और हिमालय का साक्षात परिचय होता है। और सितंबर ही वह महीना है, जब हिमालय के क्षेत्रों में कई फूलों के दर्शन होते हैं। इन सबके अलावा सामाजिक परंपराएं रही हैं कि दिवस व पर्व तब मनाने चाहिए, जब लोग खेती-बाड़ी के काम से स्वतंत्र हों। सितंबर महीने में पहाड़ के गांव-घरों में, खासतौर से महिलाओं पर खेती-बाड़ी का ज्यादा दबाव भी नहीं होता है।
देश के नौ राज्य, 4.5 करोड़ की आबादी, 65 फीसदी पानी, देश का सर्वाधिक सघन वन क्षेत्र और तेरह बड़ी नदियों का हिमालय से सीधा संबंध है। यही नहीं, हिमालयी क्षेत्र को छोड़कर देश की मुख्यभूमि के करोड़ों लोगों को भी हिमालय से फायदा होता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों से हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों का इतना अंधाधुंध दोहन किया गया है कि यहां की पारिस्थितिकी ही बिगड़ गई है। वर्ष 2013 में उत्तराखंड में आई त्रासदी के पीछे पर्यावरण से छेड़छाड़ मुख्य कारण था। आए दिन हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन की घटनाएं होती रहती हैं। इसकी मुख्य वजह है कि बड़े-बड़े बांधों के निर्माण के लिए बारूद बिछाकर सुरंगें बनाई जा रही हैं और पहाड़ों को तोड़कर सड़कों का निर्माण किया जा रहा है। बेशक हिमालयी क्षेत्र के आधुनिक विकास के लिए बांध एवं सड़क निर्माण जरूरी है, लेकिन हमें इन कामों को करते हुए हिमालय के संरक्षण एवं इस क्षेत्र की जैव विविधता के संवर्धन का भी ख्याल रखना होगा। बड़े बांधों के निर्माण के बजाय छोटे-छोटे बांधों का निर्माण किया जा सकता है तथा सड़क बनाते वक्त मलबे और बड़े-बड़े चट्टानों से नदी मार्ग को बचाया जा सकता है।
जिस तरह से मुंबई देश की व्यावसायिक राजधानी है, उसी तरह से पूरे हिमालयी क्षेत्र को देश की पारिस्थितिक राजधानी मानना चाहिए, क्योंकि देश का सबसे सघन वन क्षेत्र हिमालयी इलाकों में ही है। हिमालय का अस्तित्व तभी बचेगा, जब इसकी जीवंतता, विविधता और नैसर्गिकता बची रहेगी। हिमालय को अस्तित्व की रक्षा ही हिमालय दिवस की सार्थकता है। आज तक यह तय नहीं हो पाया है कि हिमालयी क्षेत्र के विकास का ढांचा क्या होना चाहिए। वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार भी आधिकारिक रूप से हिमालय दिवस मना रही है। इस बार राज्य सरकार ने इसे और व्यापक पैमाने पर मनाने का फैसला किया है, लेकिन इसकी सार्थकता तभी है, जब पारिस्थितिकी क्षेत्र के संरक्षण-संर्वधन और आपदा प्रबंधन के लिए एक समग्र हिमालयी एजेंडा बने।
हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण प्रबंधन का काम आसानी से थोड़े समय में नहीं होने वाला है, इसके लिए दीर्घकालीन रणनीति की जरूरत है।और वह नीति ऐसी होनी चाहिए, जिसमें इस क्षेत्र से निकलने वाली नदियों, वनों, वन्य पशुओं, वनस्पतियों आदि के संरक्षण और संवर्धन के उपाय के साथ-साथ इस क्षेत्र के आधुनिक विकास का सम्यक रूपरेखा भी हो। इसके लिए पर्यावरणविदों और इस क्षेत्र के भौगोलिक बदलावों पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों के साथ-साथ स्थानीय जन समुदाय की भागीदारी भी जरूरी है। विश्व के बढ़ते तापक्रम और बिगड़ती परिस्थितियों का बड़ा असर हिमालय पर पड़ रहा है। इसके बहुत से प्रमाण सामने हैं कि लगातार इस पर्वत शृंखला में होने वाली दुर्घटनाएं दुनिया के बदलते वातावरणीय परिस्थितियों के कारण ही है। हिमालय के बिगड़ते हालात सिर्फ भारत के लोगों के लिए ही नुकसानदेह नहीं होंगे, बल्कि सीमावर्ती 18 अन्य देश भी इससे सीधे तौर पर बुरी तरह प्रभावित होंगे। वैसे भी सिद्धांत यह ही कहता है कि स्तुति उसकी करो, जो सबको समान रूप से देखता और देता हो। हिमालय में वे गुण हैं, इसलिए हिमालय दिवस को मनाना सबको याद दिलाने के ही बराबर है कि इसकी रक्षा करना स्वयं व देश के करोड़ों लोगों के हितों की रक्षा करना है।