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रोहिंग्या मुस्लिमों को ठिकाना चाहिए

Fri, 08 Sep 2017 09:55 AM IST
तस्लीमा नसरीन
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तस्लीमा नसरीन
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शोषित लोग शरण मांग रहे हैं। कोई अगर शरण मांगे, तो उन्हें शरण देनी चाहिए। मैं जानती हूं कि वे अच्छे लोग नहीं हैं। वे बांग्लादेश को बर्बाद कर देंगे। वे 'इयाबा' की गोलियां खिलाकर लोगों को तिल-तिल कर मार डालेंगे। वे हथियार लेकर जेहाद में उतरेंगे। वे बौद्धों के घर जला डालेंगे। वे लोगों की हत्याएं करेंगे। अशिक्षित, अचेतन समूहों को शरण देने से हमारा कोई लाभ नहीं होगा। लेकिन शरण मांगने वाले लोगों को शरण देनी चाहिए। पृथ्वी के हर इंसान को कहीं भी जाने का, कहीं भी रहने का हक है।
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बांग्लादेश एक दरिद्र देश है। लाखों लोगों को शरण देने, उनके लिए भोजन, वस्त्र और छत उपलब्ध कराने की क्षमता उसके पास नहीं है। इसके अलावा पड़ोसी देश होने के कारण शरण देने पर शरणार्थियों का काफिला बांग्लादेश में निरंतर उमड़ता रहेगा। बांग्लादेश चाहे, तो म्यांमार सरकार की तरह निष्ठुर हो सकती है, वह शरणार्थियों के मुंह पर दरवाजा बंद कर दे सकती है या उन्हें पीटकर भगा सकती है। 
लेकिन बांग्लादेश को म्यांमार की तरह के एक बर्बर देश का अनुसरण क्यों करना चाहिए? उसे सभ्य देशों का अनुकरण करना चाहिए। उसे जर्मनी और स्वीडन का अनुकरण करना चाहिए। सभ्य देशों में लाखों शरणार्थी घुस रहे हैं। उन शरणार्थियों में हत्यारे भी हैं और बलात्कारी भी। इसके बावजूद उन देशों ने शरणार्थियों को भगा देने के बारे में नहीं सोचा। इसके बजाय वे बार-बार मानवता की ही बात कर रहे हैं। वे सभी शरणार्थियों के लिए भोजन, वस्त्र और छत की व्यवस्था कर रहे हैं। वे इन शरणार्थियों को मुफ्त में शिक्षा और स्वास्थ्य की सहूलियत दे रहे हैं। जिस दिन पूरा बांग्लादेश पानी में डूब जाएगा, उस दिन बांग्लादेश के लोग भी रोहिंग्या मुस्लिमों की तरह विभिन्न देशों के तट पर अपनी नाव ले जाएंगे, शरण मागेंगे। तब अगर शरण नहीं मिला, तो उन्हें भी रोहिंग्या मुसलमानों की तरह किसी नो मैन्स लैंड में लाचार हालत में खड़े रहना पड़ेगा। हम लोगों में से कोई भी किसी दुर्घटना में रोहिंग्या लोगों की तरह शरणार्थी बन जा सकते हैं।
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दुख इस बात का है कि मुस्लिम देश उदार तो नहीं ही हैं, उनमें से अधिकांश बर्बर हैं और मानवाधिकार के बारे में उनकी कोई धारणा ही नहीं है। मानवता और सहधर्मिता जैसे शब्द उनके शब्दकोश में ही नहीं हैं। अधिकांश मुस्लिम देश पीड़ित मुस्लिमों को शरण नहीं देते। पीड़ित मुस्लिमों को गैर मुस्लिम देश ही शरण देते हैं। एक मुस्लिम देश होने के नाते रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देकर सभ्य देशों की श्रेणी में खड़े होने के अवसर से बांग्लादेश आखिर खुद को क्यों वंचित कर रहा है?

मुस्लिमों के लिए इस दुनिया में सबसे महान देश सऊदी अरब है। उसी देश में इस्लाम धर्म की शुरुआत हुई थी। वह हजरत मोहम्मद का पवित्र देश है। सऊदी अरब में घरेलू नौकरानी का काम करने के लिए जाने वाली बांग्लादेश की लड़कियां वहां के मुस्लिम मालिकों द्वारा शोषित और बलात्कार का शिकार होकर लौटती हैं। बांग्लादेश की लड़कियां इसी कारण अब सऊदी अरब जाने से डरती हैं। उस देश में जुर्म करने पर किसी को माफी नहीं मिलती। दिन-दहाड़े लोगों के सामने अपराधियों का सिर काट दिया जाता है। मुसलमानों में उदारता की तुलना में बर्बरता ज्यादा है। यह बर्बरता दूसरे धर्मों के लोगों में भी अतीत में रही होगी। लेकिन बर्बरता का परित्याग कर वे सभ्य और उदार हुए हैं। मुसलमानों को भी उदार होना पड़ेगा। जेहाद के नाम पर दुनिया भर में आज जिस किस्म का खून-खराबा हो रहा है, उसे देखकर मुसलमानों के बारे में लोगों की धारणा बदल रही है। मुसलमान दुनिया भर में भय और आतंक का पात्र बनते जा रहे हैं।

रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने की जिम्मेदारी बांग्लादेश को लेनी ही चाहिए। कट्टरवादी समूह इन शरणार्थियों को आतंकवादी बनाना चाहेंगे। कालाबाजारी उन्हें इस धंधे में घुसाना चाहेंगे। नशे का कारोबार करने वाले उन्हें अपने गैंग में शामिल करना चाहेंगे। पर सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि वे बेहतर इंसान बनें। सरकार अगर चाहे, तो वह ऐसा कर सकती है। बांग्लादेश की सरकार बखूबी जानती होगी कि अशिक्षित लोगों को शिक्षित और सभ्य बनाने के लिए क्या कदम उठाने पड़ते हैं। कट्टरवादी मुस्लिमों का अत्याचार न सह पाने के कारण बांग्लादेश के हिंदू देश छोड़ रहे हैं। म्यांमार में सरकारी दमन न झेल पाने के कारण रोहिंग्या मुसलमान देश छोड़ रहे हैं। किसी न किसी देश को तो इन्हें शरण देनी ही होगी। बांग्लादेश इन असहाय लोगों को शरण देने में क्यों डर रहा है? रोहिंग्या मुसलमानों में इतनी ताकत नहीं है कि वे बांग्लादेश को हिंसा और आतंकवाद की आग में झोंक दे। उनसे ज्यादा बड़े आतंकवादी बांग्लादेश में पहले से ही मौजूद हैं।

आज हजारों रोहिंग्या बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा पर नो मैन्स लैंड पर बांग्लादेश में घुसने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। आज वे अवांछित हैं। कायदे से म्यांमार को चाहिए कि वह इन्हें वापस बुला ले, इन्हें नागरिकता दे, इनके स्वास्थ्य और इनकी शिक्षा की व्यवस्था करे, मानवाधिकार का उल्लंघन न हो, इसका ख्याल रखे। म्यांमार अगर ऐसा नहीं करता, तो संयुक्त राष्ट्र को, दानदाता देशों को उस पर दबाव बनाना चाहिए। अगर म्यांमार तब भी नहीं मानता, तो सभी देशों को चाहिए कि उससे अपने रिश्ते तोड़ लें। और कोई दायित्व ले या न ले, रोहिंग्या मुस्लिमों को शरण देने का दायित्व पड़ोसी देशों को तो लेना ही चाहिए। रोहिंग्या मुसलमान अराकान के आदिवासी हैं या ब्रिटिश दौर में पूर्व बंगाल (बांग्लादेश) से बर्मा में गए थे-उस इतिहास को खोदने की अभी जरूरत नहीं है। वे लोग प्रताड़ित हो रहे हैं, उनके पास पैर रखने तक की जमीन नहीं है, इस समय यही सत्य है। यह अप्रिय सत्य हमारे सामने नंगा होकर खड़ा है, जिसे ढकना तो हमें पड़ेगा ही। अतिथि को हम देवता न मानें, उन्हें मनुष्य तो मान ही सकते हैं।
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