अक्सर शब्द हमें बिना छुए निकल जाते हैं। मतलब न समझ में आए, तो हम डिक्शनरी में उसका शाब्दिक अर्थ पढ़कर संतोष कर लेते हैं। वह प्रायः उसका पर्यायवाची शब्द होता है, निहितार्थ नहीं। उदाहरण के लिए उपन्यास को ही लीजिए। इसकी जन्म कुंडली में जाएं, तो हमारे ज्ञान में इतनी ही बढ़ोत्तरी होगी कि यह दो टुकड़ों- उप और न्यास से मिलकर बना है। उप हुआ थोड़ा छोटा आकार और न्यास हुआ ट्रस्ट यानि जो गठित हुआ हो। जोड़-तोड़ करके जो बनाया गया है। कुल मिलाकर यह समझ आया कि उपन्यास को गढ़ा जाता है। समालोचक कहेगा कि इसमें एक कथानक होता है।
आदि, मध्य, आनंदातिरेक (क्लाइमेक्स) फिर उसके क्षण और अंत में उपसंहार। उपन्यास का कभी अंत नहीं होता, क्योंकि उसका रिश्ता जीवन से होता है और मृत्यु के बाद भी बच गए पात्र जीवन जीते हैं, लिहाजा कहानी को बढ़ाने की पूरी संभावना रहती है। पर इस हफ्ते की किताब 'ऑरफंस ऑफ दी स्टॉर्म' जाने-माने शिक्षाविद रवि धर का पहला उपन्यास है। ब्लैकबक पब्लिकेशंस ने इसे छापा है। इसकी शुरुआत कश्मीर घाटी में आतंकवादियों के जिहाद से होती है और 224 पृष्ठों के बाद उसी पर खत्म हो जाती है। लेकिन यह कहानी कश्मीर से ज्यादा नागालैंड के दीमापुर के एक कॉलेज में घटित होती है।
कथा का नायक है एक कश्मीरी नौजवान सिद्धार्थ। उसकी पढ़ाई-लिखाई कश्मीर में हुई, जब वहां पंडितों को रातो-रात पहले जम्मू फिर देश भर में कतरा-कतरा बिखर जाने पर विवश कर दिया गया। यह तथ्य काफी छन-छन कर कश्मीर से बाहर आया कि किस प्रकार पंडितों को घाटी से बाहर पनाह नहीं मिली थी। एक जमाने में कोटनानी जैसी दबंग साम्राज्ञी द्वारा कश्मीर में पंडित युग की नींव रखी गई थी, जो धीरे-धीरे खोखली होती गई और आज कश्मीर अपने स्वर्णिम काल से काफी परे खिसक आया।
लेखक ने पूरे हालात पर बेबाक कलम चलाई है। उनका साफ-साफ कहना है कि कश्मीर के मौजूदा हालात के लिए वहां के भ्रष्ट नेता जिम्मेदार हैं, लेकिन यह उपन्यास न तो कश्मीर का इतिहास है और न ही समकालीन परिदृश्य पर कोई फतवा।
उपन्यास का केंद्र-बिंदु सिद्धार्थ है। वह अपनी जमीन से गहरे से जुड़ा हुआ है और उसने अपने जीवन मूल्यों को बड़े तरीके से संजोया है। अंग्रेजी साहित्य और भारतीय दर्शन में उसकी गहरी पैठ है। स्कूल में मास्टरी शुरू करने के बाद वह कोहिमा की सेंट्रल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हो जाता है। वह बेहद निष्ठावान, कर्मठ और चिंतक है। उसका अपने परिवार से गहरा लगाव है। इतनी छोटी उम्र में जब वह अपने भाई-बहनों के साथ वहशी हिंसा को देखता है, तो उसे कभी नहीं भूल पाता। लेकिन कुंठा और निराशा को वह अपने ऊपर कभी हावी नहीं होने देता। तब भी जब उसको दिलोजान से चाहने वाली उसकी प्रेमिका ऋतुपर्णा, उसे अपने मां-बाप के विरोध के कारण छोड़कर चली जाती है। उसके माता-पिता को लगा कि सिद्धार्थ अपने मां-बाप की जिम्मेदारियों के चलते उनकी बेटी को सुख नहीं दे पाएगा।
रवि धर ने अपना यह उपन्यास दिमाग से ज्यादा दिल से लिखा है। उन्होंने अपने पात्रों को खुला छोड़ दिया है। वे जब चाहते हैं कहानी में प्रवेश करते हैं और एक ही झटके में छोड़कर चले भी जाते हैं।
लेखक के पास रवानगी के साथ बहने वाली भाषा है। काफका और डी.एच लारंस के जीवन दर्शन को उन्होंने अपने कथानक में बखूबी पिरोया है। उन्होंने अपनी तमाम शिक्षा अंग्रेजी साहित्य को घोटकर प्राप्त की है। उनकी निर्मम तटस्थता उनके पात्रों में साफ झलकती है। कभी-कभी पाठकों को उन पर दया भी आती है।
उपन्यास में दर्शन का भंयकर छौंक है, लेकिन गेरूए रंग के ढोंगी कर्मकांड को उन्होंने रह-रहकर धोया है। रवि धर के पास के वे सब तत्व प्रचुर मात्रा में हैं, जो उन्हें आने वाले समय में एक सशक्त साहित्यकार के रूप में स्थापित करेंगे। इस कृति का फल फैला हुआ नहीं है। उसमें गढ़ाव है, पर वह बहुआयामी नहीं है। जीवन को स्वीकार करने के आग्रह के साथ रवि को खूब लिखना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया विश्लेषक और संस्कृतिकर्मी हैं।)