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विश्व बैंक का विकल्प

Thu, 17 Jul 2014 07:48 PM IST
एम के वेणु
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छठे शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स के सदस्य देशों द्वारा विकास बैंक खोलने पर आम राय बनाना उभरती वैश्विक राजनीति के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण फैसला है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने अपने सभी विवादास्पद मुद्दों को सुलझाते हुए 50 अरब अमेरिकी डॉलर की शुरुआती पूंजी के साथ, जो बाद में 100 अरब अमेरिकी डॉलर की जाएगी, ब्रिक्स बैंक शुरू करने की घोषणा कर अपने सभी आलोचकों को चकित कर दिया है। समझौते के तहत, बैंक की स्थापना चीन के शंघाई में की जाएगी, जबकि इसका मुखिया अगले छह वर्ष के लिए कोई भारतीय होगा। शायद ही किसी को इल्म रहा होगा कि यह फैसला इतनी जल्दी ले लिया जाएगा। इसलिए पश्चिमी मीडिया में ब्रिक्स के आलोचक यह आरोप लगाते नहीं थक रहे कि विश्व बैंक के विकल्प के तौर पर विकास बैंक की स्थापना को लेकर समझौता करना ब्रिक्स देशों की जल्दबाजी ही जताता है।
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ब्रिक्स की विराट उपलब्धि सिर्फ यही नहीं है कि पांच उभरती आर्थिक ताकतों ने पश्चिम समर्थित विश्व बैंक के विकल्प को मंजूरी दे दी है, बल्कि उससे भी बड़ी उपलब्धि ब्रिक्स बैंक के प्रशासनिक ढांचे में छिपी है, जो 'एक देश-एक वोट' पर केंद्रित है। विश्व बैंक अथवा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं की संरचना में ऐसी न्यायसंगत पहल पश्चिमी देशों ने कभी नहीं की। अमेरिका का इन संस्थानों पर वर्चस्व भी है और वीटो की ताकत भी।

दूसरी ओर, ब्रिक्स बैंक में दक्षिण अफ्रीका जैसी छोटी अर्थव्यवस्था वाले देश के पास भी वोटिंग का वही अधिकार होगा, जो चीन जैसी मजबूत आर्थिक ताकत का होगा। संभवतः चीन या अन्य ब्रिक्स देशों ने यह व्यवस्था इक्विटी पूंजी पर आधारित भविष्योन्मुखी सहयोगात्मक ढांचा संबंधी संदेश देने के लिए की है। इस पूंजी को 100 अरब अमेरिकी डॉलर की आकस्मिक संचित निधि के रूप में बढ़ाया जा सकता है, जो ब्रिक्स के किसी भी सदस्य देशों में पूंजी के अचानक पलायन होने पर उस देश की मुद्रा को संभालने में कारगर होगी। यानी ब्रिक्स बैंक अनिवार्यतः वह भूमिका निभाएगा, जो विश्व बैंक निभाता है; मसलन, उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आधारभूत और सामाजिक संरचना की निर्माण परियोजनाओं के लिए ऋण देना।
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ब्रिक्स बैंक में संचित निधि का प्रावधान करना बहुत हद तक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मेल खाता है, जिसके माध्यम से अल्पावधि मुद्रा संकट का समाधान करने में देशों की मदद की जाती है। 'एक देश-एक वोट' संरचना पर सहमति जताकर पांच देशों ने जहां यह संदेश दिया है कि ब्रिक्स एक टिकाऊ संगठन साबित होने वाला है, वहीं पश्चिम की उन शंकाओं को भी निर्मूल कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि वोटिंग का अधिकार, बैंक का मुख्यालय और प्रशासनिक बंटवारे से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर ब्रिक्स देश आम राय बनाने में कभी सफल ही नहीं होंगे।

कुछ साल पहले तक ब्रिक्स बैंक को कोई गंभीरता से लेने को तैयार नहीं था। लेकिन आज यह एक वास्तविकता है। दरअसल चीजों को अपने हिसाब से तय करने संबंधी ब्रिक्स देशों की प्रतिबद्धता को पश्चिमी देश हल्के में ले रहे थे। विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के बरक्स वैकल्पिक संस्थान की स्थापना और उसकी कार्यप्रणाली संबंधी बातें तो वर्ष 2009 में रूस के येकतेरिनबर्ग में आयोजित ब्रिक्स के प्रथम शिखर सम्मेलन में ही होने लगी थीं। बाद में चीन के सान्या और नई दिल्ली में आयोजित शिखर सम्मेलनों में इस दिशा में सक्रिय कोशिशें शुरू हुईं कि ब्रिक्स की अर्थव्यवस्था को डॉलर के दबदबे वाले व्यापार से हमेशा के लिए अलग कर लेना चाहिए। चीन से बड़े बुनियादी ढांचे से संबंधित आयातों में लेन-देन डॉलर के बजाय युआन में करने की अनुमति अपनी कंपनियों को देकर भारत ने इस दिशा में ठोस शुरुआत की। हालांकि इस कदम को अर्थशास्त्रियों ने खारिज कर दिया, क्योंकि उनका मानना था कि वैश्विक व्यापार सिर्फ डॉलर में ही संभव है। लेकिन बड़े चीनी बैंकों से लंबे समय के लिए फंडिंग की व्यवस्था कर कुछ भारतीय कंपनियों ने इन शंकाओं को गलत साबित कर दिया।

इन पंक्तियों का लेखक 2009 के बाद आयोजित पांचों शिखर सम्मेलनों के ट्रैक-II विचार-विमर्श का हिस्सा और तमाम आलोचनाओं के बावजूद ब्रिक्स देशों का विभिन्न विचारों पर आम राय बनाने और उस दिशा में प्रगति का गवाह रहा है। ब्रिक्स का मूल उद्देश्य वैश्विक बहुस्तरीय फंडिंग सिस्टम का लोकतांत्रिकरण करना है। ब्रिक्स बैंक की स्थापना पर सहमति और आकस्मिक संचित निधि की व्यवस्था करना इसी दिशा में उठाया गया कदम है। बेशक ब्रिक्स बैंक की स्थापना शंघाई में की जाएगी, पर बैंक का अध्यक्ष भारत द्वारा प्रस्तावित होगा। प्रधानमंत्री मोदी संभवतः इस पद के लिए उसी शख्स का चुनाव करेंगे, जो वित्तीय और आर्थिक प्रशासन संबंधी अनुभव का धनी होगा। ऐसा उम्मीदवार उद्यमी, नौकरशाह या ऐसा अनुभवी राजनेता हो सकता है, जिसके पास अर्थव्यवस्था के बेहतर संचालन का ज्ञान होगा। ऐसे शख्स का पता समय आने पर चल जाएगा।

ब्रिक्स बैंक विकासशील देशों में जरूरी बुनियादी ढांचों में विकास संबंधी परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक आर्थिक सहायता प्रदान कर सकेगा। भारत को खुद भी ऐसे दीर्घकालीन निवेश की जरूरत है, जिससे वह अपने शहरों, सड़कों, रेलवे, हवाई अड्डों आदि को और बेहतर बना सके। 50 अरब डॉलर की इक्विटी पूंजी के साथ ब्रिक्स बैंक विश्व बाजार से 300 अरब अमेरिकी डॉलर का ऋण बहुत ही कम ब्याज दरों पर ले सकता है, क्योंकि उसे पांच उभरती आर्थिक ताकतों का समर्थन होगा। यह रकम उन परियोजनाओं के लिए संजीवनी हो सकती है, जिसमें 15 से 20 वर्ष तक ऋण की जरूरत होती है। इससे निर्विवाद रूप से इन सदस्य देशों के स्थानीय बैंकों पर बोझ कम होगा। यानी ब्रिक्स बैंक सबके लिए लाभ का सौदा होगा।
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