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नजरिया: 'मंडल-वन' से 'मंडल-टू' तक, धर्म का 'घेरा' हुआ और ताकतवर

सुधीश पचौरी
Updated Tue, 25 Apr 2023 07:17 AM IST

सार

धर्म जाति से बड़ा घेरा है। इस घेरे की जातियां जितनी अधिक हृष्ट-पुष्ट होंगी, हिंदुत्व उतना ही ताकतवर होगा और फलतः संघ और भाजपा उतनी ही ताकतवर होकर उभरेगी! सेकुलर-समाजशास्त्री ‘हिंदूधर्म’ की खिल्ली उड़ाकर उसे चिढ़ाने के तो आदी हैं, लेकिन वे इस ‘घेरे’ की ताकत को नहीं समझ पाते।
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नीतीश कुमार-राहुल गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : एएनआई


‘मंडल-टू’ की यह आर्त-पुकार बताती है कि ‘मंडल-वन; 1990’ जितना दे सकता था, दे चुका। यह अंग्रेजों के जमाने की ‘ओबीसी गणना’ पर आधरित था, जिसे वी पी सिंह ने देवीलाल से अपनी कुर्सी बचाने के लिए जल्दबाजी में लागू किया था! जब ‘मंडल-वन’ लागू हुआ, तब सभी ‘मंडलवादी’ खुश नजर आते थे। वे सोचते थे कि ‘मंडल-वन’ के अनुसार ‘ओबीसी आरक्षण’ को लागू करने से ‘हिंदू समाज’ बुरी तरह टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा और इस तरह ‘हिंदुत्व’ का खतरा हमेशा के लिए मिट जाएगा!


आरक्षण की पैरवी करने वाले तब के एक बड़े मुस्लिम नेता का तो कहना ही यह था कि हिंदू समाज एक संतरे की तरह है, जो ऊपर से ‘एक’ दिखता है, अगर उसका छिलका उतार दो, तो उसमें फांक ही फांक नजर आएंगी! ऐसे लोग मानते रहे कि ‘मंडल-वन’ ने छिलका उतार कर हिंदू समाज को हमेशा के लिए विभक्त कर दिया और अब वह कभी एक नहीं हो सकता! लेकिन हुआ एकदम उलटा।


‘मंडल-वन’ का जवाब हिंदुत्ववादियों ने ‘कमंडल’ से दिया और देखते-देखते ‘कमंडल’ ने ‘मंडल-वन’ के ‘विभाजनकारी घाव’ का इलाज कर दिया! ‘हिंदुत्व’ फिर से उभरा और फिर एक दिन छा गया! इसका मूल कारण ‘मंडल-वन’ की जातिगत राजनीति, यानी ओबीसी आरक्षण में ही निहित था। जो पहले हिंदू समाज रूपी संतरे का छिलका उतारकर उसको फांक-फांक करने में अपना लाभ समझते थे, वे जाति के असली गणित को भूल रहे थे। वे भूल गए कि ‘जाति’ हिंदू समाज का ही अंग थी; और है; और ओबीसी भी हिंदू ही थे; और हैं। अगर आरक्षण से उनको विकास का अवसर मिलता है, तो यह हिंदुत्व को ही मजबूत करने वाला है। अगर ‘हिंदू समाज’ की कमजोर शिराओं और मांसपेशियों को ‘पोषण’ मिलता है, तो इससे हिंदू समाज ही मजबूत होता है!


यही हुआ। ‘हिंदुत्ववादियों’ ने इसे सबसे पहले समझा और ओबीसी में अपनी पैठ बनाई और सत्ता में आने लगे। पहले ‘अटल’ आए, फिर दशक बाद दो बार ‘मोदी’ आए और अब चौबीस में भी आते दिखते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा के समकालीन उभार के पीछे ‘कमंडल’ तो था ही, ‘मंडल-वन’ भी था। न ‘मंडल-वन’ होता, न ओबीसी वर्ग में ताकत आती और न हिंदुत्व की राजनीति उस तरह से पनपती! अतीत से सीखे बिना विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा फिर इस उम्मीद में ‘मंडल-टू’ की रट लगाए है कि ‘हिंदुत्व’ से निजात मिल जाएगी!  


विपक्ष समझता है कि ‘मंडल-टू’ के जरिये सभी पिछड़ी जातियों की संख्या बढ़ी हुई होगी और जब पिछड़ों की बढ़ी संख्या के आधार पर ‘आरक्षण’ होगा, तो ‘हिंदुत्व’ का ‘केंद्र’ और उसका ‘वर्चस्व’ बिखर जाएगा! ऐसा सोचने वाले फिर भूल रहे हैं कि किसी भी जाति को मिलने वाला लाभ अंततः हिंदू समाज को मिलता है। आरक्षण मिलने से उसकी कमजोर शिराओं में विकास का ‘नया रक्त’ प्रवाहित होने लगता है, जो अंततः ‘हिंदू महाकाय’ को और भी सबल करता है।


जो लोग इन दिनों ‘एमवाई’; मुस्लिम-यादव' का नारा देते हैं या ‘मीम-भीम’; 'दलित-मुस्लिम' का आवाहन करते हैं, वे भूल जाते हैं कि जाति की ‘पुकार’ अंततः धर्म; हिंदू धर्म, की ‘पुकार’ है। हिंदू धर्म की वृहत्तर अस्मिता में ही जाति की हजारों छोटी-छोटी अस्मिताएं आपस में ‘चल-विचल’ रहकर भी एक हिंदू छतरी के नीचे रहती हैं! इस तर्क से स्पष्ट है कि यहां धर्म जाति से बड़ा घेरा है। इस घेरे की जातियां जितनी अधिक हृष्ट-पुष्ट होंगी, हिंदुत्व उतना ही ताकतवर होगा और फलतः संघ और भाजपा उतनी ही ताकतवर होकर उभरेगी! 
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हमारे अनेक ज्ञानी-ध्यानी सेक्यूलर-समाजशास्त्री ‘हिंदू धर्म’ की खिल्ली उड़ाकर उसे चिढ़ाने के तो आदी हैं, लेकिन वे हिंदू धर्म के इस ‘घेरे’ की ताकत को नहीं समझ पाते। वे यह नहीं समझ पाते कि कुछ ताकत आते ही कमजोर जातियां अंततः वो सब कुछ करना चाहती हंै, जो उच्च जातियां करती हैं, जैसे कि उनका अधिकाधिक मंदिर जाना, पूजा-पाठ करना, नियम व्रत रखना।


हर धार्मिक उत्सव में बढ़ती भीड़ इसी सशक्तीकरण के ‘बिग शो’ हैं। कोई इन दिनों मंदिरों में बढ़ती भीड़ का ही अध्ययन कर ले, तो पता चल जाएगा कि हर कमजोर जाति जब कुछ ताकतवर होती है, तो सबसे पहले अपने को किसी उच्च जाति की तरह ‘उच्च’ और ‘पूज्य’ बनाना चाहती है! यह चाहना किसी भी चीज से बड़ी एक समग्र सांस्कृतिक चाहना है! आरक्षण के बाद ऐसी कामनाएं उनको गतिशील रखती हैं और इसीलिए वे हिंदुत्व के नए दावेदार बनने लगते हैं।

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