प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से अपने रेडियो संबोधन 'मन की बात' का मुख्य मुद्दा भूमि अधिग्रहण विधेयक को बनाया, उससे साफ है कि उनके लिए यह प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। विपक्षी दलों के लिए भी यह मुद्दा प्रतिष्ठा से जुड़ गया है। यही वजह है कि भावनात्मक अपील के साथ ही देशभर के किसानों को आंदोलित करने वाले इस मुद्दे को वे यों ही नहीं जाने देना चाहते। इसने कम से कम थोड़े समय के लिए ही सही, विपक्षी दलों को एक बैनर तले संगठित किया है।
सोनिया गांधी के नेतृत्व में जिस तरह से 14 विपक्षी दलों के करीब सौ सांसद संसद भवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक मार्च करते हुए राष्ट्रपति से यह अपील करने गए कि वह किसानों के लिए अहितकर इस विधेयक को पारित न होने देने के लिए हस्तक्षेप करें, वह दर्शाता है कि अन्नाद्रमुक, बीजद और बसपा को छोड़कर ज्यादातर विपक्षी दल इस मुद्दे पर साझा सहमति बनाने के लिए तैयार हैं। राजनीतिक स्तर पर यह इसकी तरफ भी इशारा करता है कि आने वाले दिनों में सोनिया गांधी विपक्षी दलों की एकता का सूत्रधार बनकर उभर सकती हैं।
जबसे राहुल गांधी 'औपचारिक छुट्टी' पर गए हैं, सोनिया ने खुद को पुनः सक्रिय किया है। इससे कांग्रेस में ताजगी आई है। यह अलग बात है कि सोनिया की सक्रियता ने राहुल की भावी भूमिका के प्रति चर्चाओं को जन्म दिया है। दूसरी ओर बजट सत्र के पहले हिस्से में सोनिया गांधी ने जिस तरह की पहल की, उससे उम्मीद जगी है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर वह विपक्षी दलों को एकजुट कर सकती हैं, जबकि यह विधेयक राहुल गांधी के दिमाग की उपज थी।
जहां तक भूमि अधिग्रहण विधेयक का सवाल है, बजट सत्र के पहले हिस्से के अंत में सरकार और विपक्ष के बीच स्थिति बराबरी पर है। आप इसे आधा गिलास भरा हुआ या आधा गिलास खाली के रूप में देख सकते हैं- यह आप पर निर्भर है कि इसे कैसे देखते हैं।
सरकार ने बीमा में 49 फीसदी एफडीआई, या खान एवं खनिज या कोयला से संबंधित अध्यादेश को विधेयक में बदलकर उसे समय रहते पास कराने के लिए कुशलता से विपक्षी एकता में सेंध लगाई। इस तरह से उसने निवेशकों को यह संदेश दिया कि मियाद खत्म होने से पहले वह भूमि अधिग्रहण विधेयक को पारित कराने में भी कामयाब हो जाएगी, और यह कि उसके पास विपक्षी दलों को मनाने या स्थितियों को अपने पक्ष में करने के उपाय हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि विरोधी नेताओं को करीब लाने के लिए सरकार साम, दाम, दंड, भेद की तमाम नीतियों का उपयोग कर रही है। मोदी खुद ममता बनर्जी से मिल चुके हैं। उनकी पार्टी ने खान एवं खनिज और कोयला विधेयक पर सरकार का समर्थन किया। इसी तरह कुछ अन्य दलों ने भी सहयोग किया, जिन्होंने अनिवार्य रूप से कांग्रेस एवं वाम दल को विरोधी खेमे में छोड़ दिया।
ये दल इस बात से नाराज थे कि कांग्रेस ने बीमा विधेयक पर सरकार का पक्ष लेकर उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। हालांकि बीमा क्षेत्र में 49 फीसदी एफडीआई का विचार यूपीए का ही था, लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब कांग्रेस के प्रबंधकर्ता सरकार के साथ जाने का विरोध कर रहे थे, क्योंकि वे विपक्षी एकता में फूट नहीं चाहते थे। और अब कई क्षेत्रीय दल कह रहे हैं कि वे सरकार समर्थक या विपक्ष समर्थक के रूप में नहीं, बल्कि मुद्दों के आधार पर निर्णय करेंगे। यह सरकार की जीत है।
भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर सरकार की दो राय है। पहला तो यह कि विपक्ष में इतनी फूट डाली जाए कि वे वॉकआउट कर जाएं या मतदान से दूर रहें या सदन से अनुपस्थित रहें या समर्थन करें, ताकि बजट सत्र के दूसरे हिस्से में सरकार इसे पारित कराने में कामयाब हो जाए। दूसरा विकल्प यह है कि राज्यसभा, जहां राजग को बहुमत नहीं है, इसे अस्वीकृत कर दे। इससे सरकार को संसद का संयुक्त सत्र बुलाने का मौका मिल जाएगा और सरकार इसे पारित कराने में सक्षम हो जाएगी। लेकिन राज्यसभा की अस्वीकृति के बिना संयुक्त सत्र बुलाना मुमकिन नहीं है। इसी तरह विपक्ष की रणनीति उच्च सदन में शोर और व्यवधान पैदा करने की रही है, ताकि विधेयक अस्वीकृति के लिए आ ही न पाए। ऐसे में भाजपा प्रबंधक निस्संदेह उन दलों को अपने करीब लाने का तेज प्रयास करेंगे, जिनका रुख अपने हितों को देखते हुए जरा ढुलमुल है। पर मुश्किल यह है कि जिन 14 पार्टियों ने सार्वजनिक रूप से राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया था, उन्हें अब पैंतरा बदलने में परेशानी होगी। यही वजह है कि मोदी ने विधेयक पर एक बार फिर से विचार करने की पेशकश की है, ताकि इनमें से कुछ पार्टियां यदि अपना मन बदलना चाहें, तो उन्हें चेहरा बचाने का कारण दिया जा सके। लेकिन फिर भी अगर कोई पार्टी अपना रुख बदलती है, तो हमारी इस प्रतिस्पर्धी राजनीति में उस पर 'बिकने' का आरोप बड़ी तेजी से लगेगा।
इस विधेयक को लेकर प्रधानमंत्री और विपक्षी दलों, दोनों के दांव बहुत ऊंचे हैं। अगर नरेंद्र मोदी किसी भी तरह इसे पारित कराने में कामयाब हो जाते हैं, तो एक बार फिर से वह अपनी मजबूती साबित कर देंगे कि जो वह कहते हैं, वह करते हैं। यदि नहीं, तो वह ऐसे व्यक्ति के रूप सामने आएंगे, जिनका इरादा भले नेक हो, लेकिन उसे पूरा करने के लिए उच्च सदन में उनके पास पर्याप्त संख्याबल नहीं है। और निवेशक इस कठिन सच्चाई के आधार पर ही अपनी राय बनाएंगे। जहां तक विपक्षी दलों की बात है, तो इस विधेयक ने उन्हें हाथ मिलाकर सरकार के खिलाफ एक ठोस व्यूह रचने का मौका दिया है, जो उन्हें इस वर्ष के अंत में और वर्ष 2017 तक के राज्य चुनावों में मनौवैज्ञानिक लाभ दे सकता है।