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ओपेक में दरार: भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए नए दरवाजे खोल सकती है 'तेल की धार'

अमर उजाला Published by: Pavan Updated Thu, 30 Apr 2026 07:58 AM IST

सार

ऐसे वक्त में, जब भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अनिश्चितता पहले से ही तेल बाजार को अस्थिर बनाए हुए है, तब यूएई का ओपेक से बाहर निकलने का निर्णय वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक अहम मोड़ है। लेकिन यह स्थिति भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए नए दरवाजे खोल सकती है।
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ओपेक - फोटो : ANI


दरअसल, यूएई लंबे समय से ओपेक की उत्पादन-सीमा नीति से असहज था। उसने पिछले कुछ वर्षों में अपने तेल उत्पादन ढांचे में भारी निवेश किया है, लेकिन ओपेक की उत्पादन सीमा नीति के चलते वह अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहा था और यही असंतोष उसके अलग राह चुनने का कारण माना जा रहा है। ओपेक से बाहर होने पर अब वह इसकी शर्तों से मुक्त होकर खुद ही यह तय कर सकता है कि उसे कब, किसे और कितना तेल बेचना है।


चूंकि, यूएई ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक सदस्य देश था और समूह के उत्पादन में करीब 12 फीसदी का योगदान करता था, ऐसे में, उसका बाहर निकलना ओपेक की आपूर्ति क्षमता को प्रभावित जरूर करेगा। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर ओपेक की शर्तों से मुक्त यूएई वैश्विक तेल बाजार को अतिरिक्त आपूर्ति करता है, तो इससे तेल की कीमतों में कमी आ सकती है। यह स्थिति भारत जैसे उन देशों के लिए विशेष तौर पर फायदेमंद है, जो ऊर्जा के आयात पर निर्भर हैं।


गौरतलब है कि भारत अपने ऊर्जा सुरक्षा संबंधी लक्ष्यों से निपटने के लिए लंबे समय से ओपेक देशों से तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी करने की मांग करता रहा है। इसकी कुल तेल जरूरतों का तकरीबन 40 फीसदी हिस्सा ओपेक देशों पर निर्भर है और कुल तेल आयात का करीब दसवां हिस्सा यूएई से होता है। ऐसे में, अगर ओपेक की पकड़ ढीली होने से वैश्विक तेल बाजार अधिक प्रतिस्पर्धी बनता है, तो भारत को भी अपना आयात बिल घटाने, चालू खाते पर दबाव कम करने और महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, यह देखते हुए कि वैश्विक ऊर्जा बाजार कभी भी स्थिर नहीं रहता, वह निरंतर भू-राजनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय बदलावों से प्रभावित होता रहता है, बेहतर होगा कि भारत समेत सभी आयातक देश इस अवसर का उपयोग अपनी ऊर्जा निर्भरता को कम करने में करें।
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