बीते दिनों देश की सर्वोच्च अदालत से राजनीतिक सुधार को लेकर अहम खबर आई। खबर देश के माननीयों के लंबित अदालती मामलों की जल्द सुनवाई से जुड़ी थी, जिसके लिए सरकार ने 12 विशेष अदालतें बनाने की बात कही। यकीनन राजनीतिक सुधार के लिहाज से सरकार की ये घोषणा महत्वपूर्ण है, लेकिन अब भी इसे लेकर बड़े सवाल बरकरार हैं।
हालांकि बीते सात दशक में भी राजनीतिक और चुनावी सुधार को लेकर ढेरों कमेटियां बनती रहीं। तारकुंडे कमेटी, दिनेश गोस्वामी समिति, वोहरा समिति, इंद्रजीत गुप्त कमेटी, वेंकटचल्लैया समिति के साथ—साथ विधि आयोग, चुनाव आयोग और प्रशासनिक सुधार आयोग की भी ढेरों सिफारिशें आईं। अदालती आदेशों ने भी विधायिका की छवि को बेहतर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।
कुछ हालात सुधरे भी। कुछ के चुनाव लड़ने पर रोक लगी, तो कुछ सलाखों के पीछे भी पहुंचे। लेकिन पूरी तरह तस्वीर अभी तक नहीं सुधर सकी। ऐसे में सवाल सिर्फ राजनीतिक सुधार का नहीं, बल्कि कहीं व्यापक है, जो दुर्भाग्यवश राजनीतिक दलों के सत्ता स्वार्थ के आगे हमेशा बौना होता रहा है। मानो देश में सत्ता हासिल करना ही सब कुछ हो। ऐसे में जरूरी सुधार की उम्मीद अब अदालत के सहारे ही बचती है। वैसे उम्मीद मोदी सरकार से भी है कि देर से ही सही, लेकिन सरकार जल्द दुरूस्त फैसले ले।
वैसे भी इस उम्मीद को नए सिरे से जन्म भी नरेंद्र मोदी ने ही दिया था, जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान देश से बड़ा वायदा करते हुए भरोसा दिलाया था कि भाजपा के सत्ता में आने पर नेताओं से जुड़े मामलों को जल्द निपटाने के लिए विशेष अदालतें बनेगीं। भ्रष्टाचार के आरोप झेल रही कांग्रेस के मुकाबले मोदी का ये वायदा जनता की उम्मीदों से जुड़ा था।
लिहाजा लगा कि 2014 से व्यापक राजनीतिक सुधार की शुरूआत होगी, लेकिन बीते साढ़े तीन साल में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी। अलबत्ता देश की सबसे बड़ी अदालत के रास्ते उम्मीद की किरण जरूर दिखी। अदालत ने तेज सुनवाई की न सिर्फ हिमायत की, बल्कि सरकार से सवाल भी किए।
सवाल नीयत से जुड़े हैं। जाहिर है, सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार राजनीतिक सुधार के मोर्चे पर ईमानदार नहीं दिखी। न सिर्फ लोकसभा चुनाव में, बल्कि उसके बाद हुए हर चुनाव में आपराधिक पृष्ठभूमि वालों को टिकट दिया गया। मंत्री बनाया गया। मौजूदा गुजरात चुनाव में भी भाजपा के 25 फीसदी उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। हालांकि कांग्रेस या बाकी दल भी इस मामले में पीछे नहीं। अकेले गुजरात में ही कांग्रेस के 32 फीसदी उम्मीदवार दागी हैं।
हालांकि गैर—सरकारी आंकड़ों को देखें, तो देश के सभी पूर्व और वर्तमान माननीयों के खिलाफ कुल 1581 नहीं, बल्कि 13,680 मामले दर्ज हैं। यानी सालभर के करीब 200 कार्यदिवसों में हर दिन 12 में से हर अदालत के हिस्से औसतन पांच से ज्यादा मामले होंगे! जाहिर है, ऐसी स्थिति में हर दिन पांच न्यायपूर्ण फैसलों की उम्मीद करना तो बेमानी है।
तर्क है कि हजारों मामलों को एक साल में निपटाने के लिए 12 नहीं, बल्कि करीब 150 अदालतों की जरूरत पड़ेगी। बजटीय आवंटन भी सात करोड़ से बढ़ाकर करीब 100—125 करोड़ रपये करना होगा। वैसे करीब 20 लाख करोड़ रूपयों के सालाना बजटीय प्रावधान वाले मुल्क में केवल एक साल में ही देश की राजनीतिक तस्वीर सुधारने के लिए 100 करोड़ की रकम कोई बड़ी कीमत नहीं।
बशर्ते नीति निर्माताओं की नीयत ईमानदार हो। वैसे भी जरूरी नहीं कि हर आरोप सही और हर माननीय दोषी ही साबित हो। ऐसे में सवा सौ करोड़ की आबादी वाले मुल्क में अगर कुछ माननीयों का राजनीतिक भविष्य समाप्त होता भी है, तो देश के सामने कोई बड़ा भूचाल नहीं आने वाला। बल्कि राजनीति की दूसरी कतार में संघर्षरत युवाओं को न सिर्फ अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलेगा, बल्कि ईमानदार सियासत करने की नसीहत भी।