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कसमे-वादे और बैंक डिपॉजिट

शंकर अय्यर Updated Thu, 14 Dec 2017 11:25 AM IST
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शंकर अय्यर
सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप समूह पर सवाल चर्चा में है। क्या ऐसा हो सकता है? आशंकाओं का भूत देश भर के जमाकर्ताओं को सता रहा है। इस चिंता का कारण सरकार द्वारा अगस्त में संसद में पेश किया गया ‘वित्तीय संकल्प और जमा बीमा विधेयक, 2017’ (एफआरडीआई) है। 


पहली नजर में इस विधेयक का लक्ष्य वित्तीय संस्थानों की विफलता के जोखिम का पूर्वानुमान करना, उसे रोकने के उपायों को परिभाषित करना और उनका समाधान करना है। एक अर्थ में यह इस दिशा में अब तक उठाए गए कदमों की एक अनुवर्ती कड़ी है और साथ ही यह ‘निर्दिष्ट सेवा प्रदाताओं तथा सार्वजनिक निधियों के उपभोक्ताओं की सुरक्षा’ का वायदा भी करता है। 


हालांकि विधेयक के एक खंड ने लोगों को सामूहिक रूप से कंपा दिया है। विधेयक का खंड 52 समाधान निगम को यह अधिकार देता है कि वह किसी निर्दिष्ट सेवा प्रदाता को हुए नुकसान की भरपाई जमाकर्ता की बैंकों में जमा राशि से कर सकता है। इस प्रावधान के तहत निगम दायित्व (आर्थिक देनदारी) को रद्द कर सकता है, दायित्व के स्वरूप को परिष्कृत कर या बदल सकता है।


वास्तव में जब कोई बैंक एक प्रणालीगत जोखिम की स्थिति पैदा करेगा, तो निगम जमा रकम की देनदारी को रद्द कर सकता है, जमा रकम को दीर्घकालीन बॉन्ड्स या शेयर में बदल सकता है और बैंक में चाहे किसी का भी धन हो, उसके लिए कटौती लागू कर सकता है।


हैरानी नहीं कि इसने लोगों के गुस्से को भड़का दिया है और एक बहस शुरू हो चुकी है-लोगों में आसन्न आपदा का भय समा गया है। 


इस विधेयक के समर्थक दावा करते हैं कि इससे सुरक्षा में सुधार होगा और कुछ नहीं बदला है। यह दावा इस गीत की याद दिलाता है...जो नहीं कहा है, कभी तो समझ भी जाओ...। लोगों की चिंता विधेयक में कई खामियों से बढ़ी है, जो नहीं कहा है और यह तब लाया गया है, जब बैंकिंग क्षेत्र नौ लाख करोड़ से ज्यादा के बुरे कर्ज से जूझ रहा है, जिनमें से ज्यादातर सरकारी बैंकों के पैसे हैं।


 तथ्य यह है कि अब तक औसत जमाकर्ता मानते रहे हैं कि बैंक में पैसा रखना जोखिम मुक्त है। एफआरडीआई विधेयक ने इस स्पष्ट और अंतर्निहित भरोसे को डगमगा दिया है। 


हां यह विधेयक फिलहाल बीमा द्वारा कवर की गई जमा 1993 से एक लाख रुपये की राशि को इस प्रावधान से छूट देता है, जबकि अमेरिका में इसकी सीमा ढाई लाख डॉलर है। हालांकि यह जमा बीमा क्या होगा और इसकी शर्तें क्या होगी, यह अज्ञात है। जमाकर्ताओं की सहमति एक अस्पष्ट ढंग से तैयार मसौदे के उपखंड पर निर्भर है, जो इसे नियामक और निगम पर छोड़ देता है।
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स्पष्ट है कि जमा बीमा सीमित होगा और आघात की संभावना असीमित है-सेवानिवृत्ति, विवाह, शिक्षा, घर, कर आदि के लिए बचत जमा बीमा के अतिरिक्त हो सकता है। छोटे एवं मंझोले उद्यमों के वेतन खाते और व्यवसायों की परिचालन पूंजी को भी इस जोखिम में शामिल किया जा सकता है। 


सोशल मीडिया के अनुसार, यह विधेयक इस सरकार की परिकल्पना है। मगर तथ्य यह है कि इसकी उत्पत्ति वैश्विक वित्तीय संकट से हुई है। नवंबर, 2008 में जी-20 (भारत जिसका सदस्य है) की बैठक वाशिंगटन में हुई थी और वैश्विक वित्तीय संरचना को मजबूत करने का संकल्प लिया गया था। इसने 2009 में वित्तीय स्थिरता बोर्ड (एफएसबी) के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।


जमानत की अवधारणा को जुलाई, 2011 में एफएसबी द्वारा एक सलाह पत्र के रूप में रखा गया था (जिसे मई, 2014 की रिपोर्ट में भारतीय रिजर्व बैंक ने भी दोहराया) और नवंबर, 2014 में जी-20 ने इसे अनुमोदित किया। अगस्त, 2017 में यह विधेयक पेश किया गया। 


एफएसबी के प्रस्ताव के पीछे तर्क यह था कि सार्वजनिक वित्तीय राहत करदाताओं के धन को अस्वीकार्य जोखिमों में डालता है और उससे नैतिक खतरा बढ़ता है, जो समस्यापरक है। नियामकों और सरकारों की जवाबदेही पर से ध्यान हटाकर परिणाम पर केंद्रित किया गया है। बुनियादी सवाल है कि क्या जमाकर्ता, जो कि कम फायदे के लिए बैंकों में रुपये जमा करते हैं, उन्हें विफलता की कीमत चुकाने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए, जो भू-राजनीतिक या तकनीकी व्यवधान या वैश्वीकरण की जटिलताओं से हो सकती है। 


भारतीय संदर्भ में जमाकर्ताओं की अशक्तता बढ़ रही है। भारतीय बैंकों में लोगों के 105 लाख करोड़ रुपये जमा हैं, जिनमें सत्तर फीसदी से ज्यादा सरकारी बैंकों में हैं। बुरे कर्ज की समस्या कॉरपोरेट-बैंकर की मिलीभगत, देरी और नीतिगत अपंगता के कारण पैदा हुई। फिर उसके बाद कर्जमाफी, एसईबी कर्ज का पुनर्गठन, कोयला और दूरसंचार लाइसेंस को रद्द करने के बाद न्यायिक आदेश जैसी घटनाएं हुईं।


और फिर अंत में सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों के राजनीतिक प्रबंधन का मुद्दा है। ऐसे में जमाकर्ता शायद ही इन खिलाड़ियों को बदल या चुनौती दे सकता है। 


सरकार ने देर से यह स्पष्ट किया कि जमाकर्ताओं को संरक्षित किया जाएगा और जोर दिया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए सरकार की अंतर्निहित गारंटी अप्रभावित है। इस बयान और बिल के प्रावधानों में अंतर है और यह नहीं बताता कि निजी बैंकों में क्या होगा। छोटे सहकारी और निजी बैंकों के कुछ मामलों और यूनिट 64 राहत के दौरान के मामलों को छोड़कर ऐतिहासिक रूप से जमाकर्ता और बचतकर्ताओं ने शायद ही कभी पैसा गंवाया हो। 


संदर्भ किसी भी नीति के लिए महत्वपूर्ण होता है। क्या भारत इस प्रतिमान परिवर्तन के लिए तैयार है? यूरोप के लिए इसके लिए सामूहिक रूप से मुकदमा लड़ सकते हैं, लेकिन भारत में सामान्य शिकायतों का निवारण भी एक संघर्ष है। जुलाई, 2017 में एफएसबी ने वित्तीय संकट के बाद सुधारों और सदस्य देशों के क्रियान्वयन की स्थिति पर अपनी समीक्षा रिपोर्ट जारी की।


चौबीस सदस्यों में से तेरह (जिनमें ऑस्ट्रेलिया, चीन, ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया शामिल हैं) ने अब तक जमानत (बेल-इन) कानून को लागू नहीं किया है। भारत वैसा काम कर रहा है, जिसे करने में दूसरे देश डरते हैं। भारत को क्यों समस्याओं को न्योतना चाहिए?

 
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