भूकंप की भेंट चढ़ा इमारत
इसे बने कुछ ही समय हुआ था कि नेपाल, बिहार और बंगाल में 1934 में भीषण भूकंप आया, जिसने मजबूत इमारतों को भी जमींदोज कर दिया। इस नायाब विरासत को ऐसा नुकसान पहुंचा, जिसकी कभी भरपाई नहीं हो सकी। बताते हैं कि यह चांदी के नौ लाख सिक्कों से बना था, इसलिए इसका नाम नौलखा पैलेस है।
पैलेस और इसकी सुंदरता...
पैलेस में घुसते ही सात मंजिला मीनार दिखती है। दुर्गा भवन इसके बगल में है। परिसर में सफेद संगमरमर से बना काली मंदिर है, तो एक इमारत के पोर्टिको में पत्थर के दो हाथियों पर टिकी चार मेहराबें हैं। भवन की छत ढह चुकी है, लेकिन खंभों की बनावट ऐसी है कि हैरी पॉटर फिल्मों के दृश्य याद आ जाते हैं। परिसर से बाहर के मंदिर की दीवारें दरक गई हैं, गर्भगृह खाली है, और विशाल घंटा जमीन पर रखा है।
स्थानीय लोगों का तर्क
स्थानीय लोग बताते हैं कि पास की इमारत में मूर्तियां रख दी गई हैं। वर्ष 1920 के आसपास इसका निर्माण दरभंगा एस्टेट की प्रशासनिक राजधानी के तौर पर कराया गया था। 1,500 एकड़ में फैले इस परिसर में कभी 11 मंदिर थे। महाराज रामेश्वर सिंह ने इसे बनवाया, पर यहां कभी रहे नहीं। अपने बड़े भाई के निधन के बाद उन्हें दरभंगा जाकर शासन संभालना पड़ा। और यह राजधानी बसने से पहले ही उजड़ गई।
काली मंदिर में नक्काशी की 22 परतें
परिसर में संगमरमर और हाथी दांत से बने काली मंदिर में नक्काशी की 22 परतें हैं, जबकि आगरा के विश्व विख्यात ताजमहल में 15 परतों की नक्काशी है। सिर्फ यही बात इस पैलेस को खास बना देती है। बताते हैं कि महल के एक कमरे में सबसे पुरानी ज्ञात मधुबनी पेंटिंग भी है, जो 1919 में राजपरिवार की शादी के लिए बनी थी। वहीं पैलेस के एक हिस्से में संग्रहालय है, जो अक्सर बंद रहता है।
फ्रांसीसी वास्तुकार की डिजाइन
महाराज रामेश्वर सिंह ने इन इमारतों को डिजाइन करने के लिए फ्रांसीसी वास्तुकार बुलाए थे। इसलिए इन पर फ्रेंच और यूरोपीय वास्तुकला का असर दिखता है। अब यहां जगह-जगह कचरे के ढेर हैं, चारदीवारी टूट चुकी है, इमारतों में झाड़-झंखाड़ उग आए हैं। ...गौरवशाली अतीत के गवाह रहे नौलखा पैलेस को जीर्णोद्धार की दरकार है।