लंबे समय से देश में यह बहस चल रही है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून में कुछ ऐसे व्यापक प्रावधान हैं, जो अस्पष्ट हैं, और उनका इस्तेमाल किसी के विरुद्ध हो सकता है। दलील यह दी जाती है कि कई बार ईमानदार अधिकारी भी इस कानून की चपेट में आ जाते हैं, जिस कारण अधिकारी महत्वपूर्ण निर्णय लेने से कतराता है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 में संशोधन की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि अन्वेषण अधिकारी एक स्वर्णिम नियम का अनुपालन करता है। यदि उसने यह रिपोर्ट दी कि प्रथम दृष्टि में अभियुक्त दोषी प्रतीत नहीं होता है, तो उसकी ईमानदारी पर सवाल खड़े होंगे। इसलिए स्वर्णिम नियम यह है कि किसी भी तरह अभियुक्त के खिलाफ मामला बनाया जाए।
जेटली का कहना पूरी तरह सही है, लेकिन इसका कारण भ्रष्टाचार का सर्वव्यापी होना है। सवाल उठता है कि क्या भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन कर देने भर से कार्य संस्कृति बदल जाएगी? इस पूरे मामले में जिस प्रावधान को खलनायक की तरह पेश किया जा रहा है, वह है भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 की धारा 13 (।) (डी) (।।।)। इसमें व्यवस्था है कि अन्वेषण एजेंसी को उस अधिकारी के विरुद्ध मुकदमा चलाने का अधिकार है, जिसके आचरण, निर्णय या चूक से किसी अन्य व्यक्ति को आर्थिक या अन्य महत्वपूर्ण लाभ हो। इसमें यह जरूरी नहीं है कि उस अधिकारी ने रिश्वत ली हो या कोई अन्य लाभ उठाया है। एजेंसी को केवल इतना प्रमाणित करना है कि किसी तीसरे व्यक्ति को फायदा पहुंचा है। यानी यह अपराध न्यायशास्त्र में निर्दोष माने जाने की प्रचलित धारणा के विरुद्ध है। लिहाजा इसमें संशोधन का प्रस्ताव है, जिसमें यह प्रमाणित करना होगा कि जनसेवक ने बेईमानी की नीयत से ऐसा किया। बदनीयती प्रमाणित करने का बोझ अभियोजन पर होगा, पर ऐसा करना लगभग असंभव होगा।
जहां तक ईमानदार जनसेवकों के अकारण फंसने का डर है, तो इसका निपटारा सीबीआई के स्तर पर ही हो सकता है। यदि कोई बदनीयती नहीं थी, तो अन्वेषक कह सकता है कि निर्णय लेने में चूक हुई है और भ्रष्टाचार का मामला नहीं बनता। अगर वर्तमान कानून में नीयत न होने पर भी मुकदमा चलाने का प्रावधान है, तो भी उसका लाभ उसे मिल सकता है। अन्वेषणकर्ता को भी अपनी छवि के खराब होने का भय नहीं होना चाहिए, क्योंकि उसकी रिपोर्ट पर वरिष्ठ अधिकारी अपनी सहमति दर्ज कर सकते हैं। उच्चतम न्यायालय का निर्णय है कि यदि अन्वेषणकर्ता और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच मतभिन्नता हो, तो मामला महान्यायाधिवक्ता (एटॉर्नी-जनरल) को भेजा जाएगा, जिनका निर्णय अंतिम होगा। इसलिए अब भी जनसेवकों को पर्याप्त सुरक्षा प्राप्त है। जहां तक आरोप-पत्र दायर करने के लिए पूर्वानुमति की अनिवार्यता है, तो वह अब भी है, किंतु नया प्रावधान यह जोड़ा जा रहा है कि प्राथमिकी दर्ज करने के लिए भी लोकपाल/लोकायुक्त की अनुमति लेनी जरूरी होगी।
लिहाजा कहना अतिशयोक्ति नहीं कि कमी कानून में जितनी होती है, उससे ज्यादा उसे लागू करने वाले अधिकारियों में होती है। जरूरी है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून को लागू करने वाले अधिकारी ईमानदार, सुयोग्य और निष्ठावान हों।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं