हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के बाद आने वाले चार वरिष्ठतम जजों ने प्रेस कांफ्रेंस करके प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाए। यह सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की सबसे दुखद और अप्रत्याशित घटना है। इन जजों ने प्रधान न्यायाधीश पर निरंकुश और मनमाने ढंग से काम करने का आरोप लगाया है। असल में बहुत दिन से स्थितियां बिगड़ रही थीं। बहुत-सी बातें कही जा रही थीं, जो अब विस्फोटक रूप में सबके सामने है। मैं समझता हूं कि इस संकट का जल्द से जल्द समाधान निकले और यह समाधान सुप्रीम कोर्ट के जज स्वयं निकालें। सरकार या किसी भी राजनीतिक दल को फिलहाल इस विवाद में जबर्दस्ती हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
अतीत में कुछ हाई कोर्ट में जजों के बीच इस तरह की समस्याएं उठीं, पर उन्होंने आपस में मिलकर बैठकर उसका समाधान निकाला। अच्छी बात यह रही कि वे मामले सार्वजनिक नहीं हुए। जजों के बीच मुकदमों के फैसले को लेकर हमेशा से मतभेद होते रहे हैं। वैचारिक मतभेद होना अलग बात है, पर व्यक्तिगत आरोप अलग बात है। इसलिए यह मामला एकदम अप्रत्याशित है।
इस संकट को समझने के लिए कुछ मूल बातों पर ध्यान देना होगा। लोकतंत्र की मूल भावना यह है कि सारी शक्तियां जनता के पास रहती है। लेकिन स्पष्ट है कि 130 करोड़ की आबादी तो स्वयं अपने ऊपर शासन नहीं कर सकती। इसलिए देश में संविधान है, जो शासन के तीन प्रमुख अंगों-न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका की व्यवस्था करता है। संविधान इन तीनों के अधिकार क्षेत्र और शक्तियों को परिभाषित और परिसीमित करता है। संविधान निरंकुशता पर अंकुश लगाता है, क्योंकि निरंकुश शक्तियां किसी के भी हाथ में सुरक्षित नहीं मानी जातीं। निरंकुश शक्तियां अगर किसी के पास रहती हैं, तो उसके दुरुपयोग की आशंकाएं रहती है। लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे देश में स्थिति ऐसी आ गई है कि ये तीनों अंग अपना-अपना काम ठीक ढंग से तो नहीं कर रहे हैं, पर दूसरे के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करते हैं। कार्यपालिका अपना काम नहीं कर पाती, विधायिका भी अपना काम नहीं करती। न्यायपालिका भी कार्यकारी शक्तियां और विधायी शक्तियां अपने पास लेना चाहती है। इधर उच्चतम न्यायालय ने संविधान संशोधन की शक्तियां भी अपने पास ले लीं। जजों की नियुक्ति की कार्यकारी शक्ति भी उन्होंने अपने पास रख ली है।
जैसा कि मैंने पहले कहा, निरंकुश शक्तियां किसी हाथ में लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है। हमारे संविधान के अनुसार, न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका-इनमें से कोई भी सर्वोच्च नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी सुप्रीम नहीं है। उसे सुप्रीम कोर्ट इसलिए कहा जाता है कि वह सबसे बड़ी कोर्ट है और उसके फैसले सभी निचली अदालतों को मान्य होंगे। संविधान यह भी कहता है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय सभी अदालतों को मान्य होंगे, संसद को नहीं। लेकिन कई बार कहा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ही असांविधानिक काम करने लगे, तो लोग कहां जाएं। लोकतंत्र में सबकी शक्तियों की सीमा होती है और सबके ऊपर जवाबदेही होती है। और जवाबदेही के लिए सर्वोच्च है संविधान और संविधान से ऊपर देश की जनता है, जिसके प्रति तीनों अंग उत्तरदायी हैं। कई लोग कहते हैं कि जजों को प्रेस कांफ्रेस नहीं करनी चाहिए थी और जनता के सामने नहीं आना चाहिए था, लेकिन मैं इसे गलत नहीं मानता, क्योंकि न्यायपालिका भी जनता के प्रति जवाबदेह है। तो मूल समस्या यह है कि तीनों अंग अपना-अपना काम ठीक से नहीं करते हैं, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। केवल न्यायपालिका में समस्या नहीं है। अब स्थिति यह हुई कि न्यायपलिका सर्वोपरि शक्तियों का उपभोग करने लगी, लेकिन न्यायपालिका के अंदर इतनी समस्या पैदा होने लगी कि अंततः विस्फोट हो गया। अब देश के हित में, लोकतंत्र के हित और स्वयं न्यायपालिका के हित में यही है कि जल्दी से जल्दी इस विवाद का समाधान निकले।
जहां तक सुप्रीम कोर्ट के नियम हैं, उसके अनुसार पीठ बनाने और मामले विभिन्न बेचों के सौंपने का अधिकार देश के प्रधान न्यायाधीश के पास है। इसे चारों जजों ने भी माना, लेकिन उनका कहना था कि इसका मतलब यह नहीं है कि प्रधान न्यायाधीश निरंकुश ढंग से काम करने लगे। जूनियर जजों को मामले सौंपना प्रधान न्यायाधीश के अधिकार क्षेत्र में है। सभी जज बराबर होते हैं। मैं नहीं मानता कि प्रधान न्यायाधीश ने सत्ता पक्ष को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा किया होगा।
चार जजों ने जो प्रधान न्यायाधीश पर आरोप लगाए, वे आरोप अगर मीडिया में किसी ने या किसी जनता ने या किसी राजनेता ने लगाए होते, तो उस पर सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख होता? इसमें तो कोई संदेह नहीं कि चार जजों ने जो किया, उससे न्यायपालिका की छवि पर बहुत आघात हुआ। कानून के सामने तो सभी लोग बराबर होते हैं। अगर कोई अदालत की अवमानना करता है, तो उस पर अवमानना का केस चलाया जाता है। तो यह भी देखना चाहिए कि क्या इन जजों ने अदालत की अवमानना की? दूसरी बात यह है कि अगर प्रधान न्यायाधीश और चार वरिष्ठ जजों के बीच इतने ज्यादा मतभेद हैं, और यहां तक बात आ गई कि वरिष्ठ जजों को मीडिया के सामने आकर अपना दुखड़ा रोना पड़ा, तो क्या नैतिकता के आधार पर प्रधान न्यायाधीश को या इन चारों जजों को त्यागपत्र नहीं देना चाहिए था? लेकिन दोनों पक्षों में से किसी से भी इस्तीफे की पेशकश नहीं की।
अगर इस संकट का समाधान निकालना है, तो इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए और किसी भी राजनीतिक दल या सरकार को इसमें दखल नहीं देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों को अनौपचारिक रूप से बंद कमरे में बिना किसी मिनट रिकॉर्डिंग के बैठकर इसके समाधान की कोशिश करनी चाहिए।