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मनुष्यता को बचाने का आंदोलन

सुभाष चंद्र कुशवाहा Updated Mon, 15 Jan 2018 07:13 PM IST
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सुभाष चंद्र कुशवाहा

रहीम ने कहा था, बिन पानी सब सून, और हमने इसे सुनकर अनसुना कर दिया। ‘जल ही जीवन है’ का राग हमने अलापा, पर कभी इस चिंता में गले नहीं कि जमीनी पानी जो धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है, वह बचेगा कैसे? जमीन का हृदय चीरकर पानी निचोड़ने वालों ने कभी जमीनी दर्द को समझने का प्रयास नहीं किया। तभी तो आज नदियां, तालाब, कुएं, झील-सबको इंसान लीलता जा रहा है। मानो विकास का मॉडल जल विनाश से ही संभव है।



1960 के दशक से अपने यहां एकाएक जमीनी पानी से सिंचाई करने की गति तेज हुई। उससे पूर्व हम कुएं और पोखर के पानी से सिंचाई करते थे, जो हर बरसात में लबालब भर जाते थे। आबादी कम थी, तो जल संचयन के लिए नीचली भूमि संरक्षित थी। बरसात में जमा होने वाला पानी जमीन के अंदर पहुंच उसे पानी से भर देता था। आज पानी संचयित करने वाली जमीनें निमार्ण कार्यों की भेंट चढ़ चुकी हैं। तालाब मछली पालने के लिए पट्टे पर दे दिए गए हैं। मिट्टी के घरों का निर्माण रुक जाने से तालाबों और झीलों को हर साल गहरा करने का काम रुक गया। वे धीरे-धीरे भरते गए। अब गांवों में भी तालाबों से सिंचाई नहीं होती। बयालीस फीसदी सिंचाई के लिए जमीनी पानी का प्रयोग किया जा रहा है। सार्वजनिक जल आपूर्ति की कुल आवश्यकता का तैंतीस फीसदी पानी जमीनी होता है। सत्तरह प्रतिशत औद्योगिक जरूरत का पानी जमीन से निकाला जाता है। शेष जरूरत की पूर्ति नदियों और झीलों के दोहन से होती है। कुल भूमिगत जल का पच्चीस प्रतिशत यानी दुनिया में सबसे ज्यादा पानी हम निकाल रहे हैं। चीन और अमेरिका दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान भूमिगत जल दोहन के मामले में सबसे आगे हैं। हमने जमीन में पानी पहुंचाने के रास्ते बंद कर दिए। ताल-तलैयों, नदियों और झीलों को सुखा दिया या अतिक्रमण कर उन पर शहर बसा दिए।


बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनियां हों या सॉफ्ट ड्रिंक बनाने वाली कंपनियां, सभी ने भूमिगत जल का बेशुमार दोहन किया। इसका दुष्परिणाम सामने है। 1980 के बाद से अपने यहां भूमिगत जल पानी का स्तर नीचे जाना शुरू हुआ। बोरिंग की गहराई बढ़ती गई और पानी नीचे खिसकता गया। धरती की ऊपरी परत सूखने लगी। जमीनों के बंजर होने के हालात पैदा हो गए। मानसून की दिनोंदिन बढ़ती निष्ठुरता जमीनी पानी को और कंगाल करती जा रहा है। इसका असर पर्यावरण पर पड़ रहा है।


हमने जिस जमीनी पानी को सदियों से संरक्षित रखा था, वह कीटनाशकों के प्रयोग से विषाक्त होता चला गया। हम जमीनी पानी को बचाने, गुणवत्ता सुधारने की दिशा में कुछ कर नहीं पा रहे। हमें भूमिगत जल की चिंता है, तो पेड़-पौधों को बढ़ाना होगा। रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग बंद करना होगा। कूड़ा-कचरा निस्तारण के बारे में गंभीरता से काम करना होगा। पानी के कम उपयोग और उसे संशोधित कर उपयोग की दिशा में बढ़ना होगा। वर्षा जल को जमीन में पहुंचाकर जमीनी पानी को रिचार्ज करने की सर्वाधिक जरूरत है। लोकगीतों में पानी को सहेजने की चिंता अकारण नहीं है। अवध में गाए जाने वाले प्रसिद्ध सोहर में हिरन-हिरनी संवाद में का तोर चरहा झुरान कि पानी बिन मुरझई हो में चारे के सूखने का प्रश्न उठाया गया है। बाबा मोर पोखरा खोनवले, घाट बनवले हो ना गीत में तालाबों का होना अंतर्मन को सुख देता है। भूजल बचाने का आंदोलन तत्काल शुरू करना चाहिए। यह मनुष्यता को बचाने का आंदोलन भी है।

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