पाकिस्तानी हमेशा से भारत की समृद्ध परंपरा और रीति-रिवाजों से ईर्ष्या करते रहे हैं, जो वहां की विभिन्न धार्मिक अनुभवों से निकले हैं और सदियों से जारी इन परंपराओं को अब वहां के संस्थानों में संरक्षित देखा जा सकता है। नृत्य एवं संगीत इन संस्थानों का हिस्सा हैं, मगर अफसोस कि शास्त्रीय संगीत और नृत्य को आधुनिक नृत्य का व्यावसायीकरण, फिल्म और संगीत पीछे छोड़ता जा रहा है, जो कि भारत की युवा पीढ़ी की दैनिक खुराक है। लेकिन पाकिस्तान में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो सिंधु घाटी की संस्कृति और मोहनजोदारो का हिस्सा होने पर गर्व करते हैं और निरंतर पूरे दक्षिण एशिया में फैली अपनी जड़ों की तलाश करते हैं।
पाकिस्तान में कोक स्टूडियो एक ऐसा मंच है, जो न केवल ताजा एवं नई आवाज को रातोंरात प्रसिद्धि दिलाता है, बल्कि जब वे दिगगज सूफी गायिका आबिदा परवीन और युवा मगर बेहद प्रतिभाशाली अली सेठी (जुगनू और नजम सेठी के बेटे) को एक साथ मंच पर गाने के बुलाते हैं, तो भारी भीड़ जुट जाती है। इससे आबिदा परवीन की महानता भी झलकती है कि वह युवा अली के साथ मंच साझा करती हैं।
हाल में कोक स्टूडियो के मंच पर भारतीय कलाकारों को भी भागीदारी करते देखा गया। वह शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित एक युवा भारतीय गायिका शिल्पा राव थीं, जिन्होंने पार चन्ना दे गीत गया और कहा कि पाकिस्तान में इस गाने ने मानसिक बंदिशों को तोड़ दिया।
और जब दर्शकों ने मैडम नूर जेहरा उर्फ बिबली को सुना, तो वे मंत्रमुग्ध हो उठे। उन्होंने सागर वीणा पर एक अलग धुन बजाई। सागर वीणा दुनिया भर में अपनी तरह का एक अनूठा वाद्य यंत्र है। नूर जेहरा दिग्गज वकील, दार्शनिक और राजनीतिक कार्यकर्ता रजा काजिम तथा कवि व गायिका किश्वर रजा की बेटी हैं। दिलचस्प बात यह है कि रजा काजिम को सागर वीणा में निपुणता हासिल करने में तीस वर्ष से ज्यादा लगे। यह न केवल दुनिया भर में एक मात्र सागर वीणा है, बल्कि नूर इस वाद्य यंत्र को बजाने वाली अकेली संगीतज्ञ हैं। नूर पहले सितार बजाती थीं, लेकिन कोक स्टूडियो में उनका गायन सुनने पर लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और उनकी आंखों में आंसू भर उठते हैं।
दुनिया का ध्यान केवल आतंकवाद, जेहाद और तालिबान पर केंद्रित है, लेकिन पाकिस्तान के भीतर रत्नों की खोज की जा सकती है, जैसे सागर वीणा से पहचान बनाकर नूर एक सांस्कृतिक अगुआ के रूप में उभरी हैं।
सागर वीणा को अमर उजाला के पाठक आसानी से समझ सकते हैं, क्योंकि 'सागर' संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ समुद्र है और 'वीणा' तो सारंगी का हिस्सा है। सागर वीणा प्रतिष्ठित वाद्ययंत्र निर्माता मोहम्मद रियाज की भी याद दिलाता है।
लाहौर का यह गौरव संजन नगर में स्थित एक संस्थान है-इंस्टीट्यूट ऑफ फिलोसॉफी ऐंड आर्ट्स, जहां इस समय नूर जेहरा और पाकिस्तान के दूसरे प्रसिद्ध गायक और उनके पुत्र अली नूर व अली हमजा भागीदारी करते हैं। संजन नगर को बसाने वाले रजा करीम एक पाकिस्तानी अखबार को दिए एक इंटरव्यू में कहते हैं-'यह कार्यकर्ताओं को तैयार करने वाला स्कूल है, जो लोकतंत्र की जिम्मेदारी संभालने में सक्षम होगा। पाकिस्तान में ऐसे कार्यकर्ता नहीं हैं। इस समय मुल्क में नौकरशाह और कई तरह के बुद्धिजीवी हैं।'
नूर को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में विशेषज्ञता हासिल है। उन्होंने इंडियन डिपार्टमेंट एट स्कूल ऑफ ओरिएंटल ऐंड अफ्रीकन स्टडीज के प्रमुख राजेश्वरी दत्ता से प्रशिक्षण लिया, फिर बर्कले चली गईं और अली अकबर कॉलेज ऑफ म्यूजिक में अध्ययन किया।
कई लोगों को सागर वीणा की ध्वनि मनुष्य की आवाज की तरह लगती है। सागर वीणा को बजाने की तकनीक विचित्र वीणा या मोहन वीणा की तरह ही है। यानी संगीत ध्वनियों के उत्पादन और विभिन्न संयोजनों व रूपांतरणों को नियंत्रण करने लिए एक छोर पर क्रिस्टल बॉल या किसी अन्य वस्तु को सरकाना और दूसरे छोर पर ध्वनि पैदा करने के लिए एक कोण के साथ तारों को छेड़ना।
ध्वनि और ध्वनि-विज्ञान के मामले में सागर वीणा में लय की एक बेमिसाल श्रेणी है और इसका स्वर विस्तार संगीतकारों को संगीत पैदा करने में समृद्धि प्रदान करता है। इसकी गूंज भी बहुत होती है, जो कुल मिलाकर ध्वनि को उच्चता और स्पष्टता प्रदान करती है। सागर वीणा के निर्माण के पीछे कलाकारों को समृद्ध एवं सांगीतिक ध्वनि का व्यापक स्लैब प्रदान करने का उद्देश्य था, जिसके जरिये मानवीय संवेदनाएं व्यक्त की जा सकें। इसका उद्देश्य संगीत ध्वनियों को पैदा करना है, जो समकालीन कलाकारों और श्रोताओं को गतिशीलता के साथ परस्पर प्रभाव डालने में सक्षम बनाए और उनकी अपनी गहरी आंतरिक प्रक्रियाओं, संवेदनाओं, भावनाओं और विचारों को नए-नए पहलुओं, बारीकियों और अलग-अलग रंगों में विकसित करे। इसके अलावा इसमें यह प्रेरणा भी है कि कलाकार के पास ध्वनि है, जो उसे मौजूदा ढांचे से परे जाने के लिए सक्षम बनाता है, जिसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत ने बेहतर काम किया है और नए तरह का संगीत पैदा किया है, जो समकालीन मनुष्य की संवेदनशीलता से जुड़ता है और उनकी गुणवत्ता बढ़ाता है।
सागर वीणा की मूल अवधारणा यह है कि कलाकार को लयों एवं अनुनादों की गतिशीलता में उनके सूक्ष्म रूपांतरण व संप्रेषित अर्थों के साथ संगीत को सोचने और पैदा करने में सक्षम होना चाहिए, जो कि संगीत की मुख्य संभावना में निहित है।
फिल्म मोहनजोदारो के निर्माता ने एक भारी गलती की है। वह भूल गए कि वह इतिहास को विकृत करने की स्वतंत्रता नहीं ले सकते। भारतीय फिल्म निर्माताओं को पाकिस्तान आकर सागर वीणा और नूर जेहरा पर फिल्म बनानी चाहिए, अकेली वही इसे बजा सकती हैं। भारत और वहां की प्रशंसित समृद्ध संस्कृति निश्चित रूप से इस अनुभव से अभिभूत होगी।
लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं