अपनी जनता के लिए वह 'वामपंथी राजा' है, लेकिन देश का सबसे गरीब मुख्यमंत्री भी। सहयोगियों के लिए मिलनसार व्यक्तित्व का मालिक है, तो राजनीतिक हलकों में कठोर फैसला लेने वाला नेता। ईमानदारी ऐसी कि विरोधी भी दबी जुबान प्रशंसा करने को मजबूर। वाकई त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार की शख्सियत ही ऐसी है कि 'सत्ता-विरोधी रुझान' जैसी शब्दावलियों को झुठलाते हुए वह लगातार चौथी बार राज्य का नेतृत्व करने जा रहे हैं।
करीब 65 वसंत देख चुके इस माकपा नेता में आखिर ऐसा क्या है, जो उसे राज्य में नृपेन चक्रवर्ती के बाद सबसे बड़ा वामपंथी नेता बनाता है? जवाब माणिक की जीवन शैली में ढूंढे जा सकते हैं। वह देश के संभवतः एकमात्र मुख्यमंत्री हैं, जिनके पास न तो अपना घर है, न कार और न ही मोबाइल। बैंक में भी इतनी रकम नहीं कि बताई जा सके।
मुख्यमंत्री के रूप में मिलने वाला वेतन पार्टी फंड में जाता है और फिर पार्टी द्वारा दिए जाने वाले मासिक पांच हजार रुपये से ही उनका गुजारा चलता है। पत्नी को मिलने वाली पेंशन इसमें मदद करती है। माणिक आज भी लाल बत्ती लगी गाड़ी का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि जरूरी कामकाज पार्टी की गाड़ी से ही निपटाते हैं।
चूंकि उन्हें फिजूलखर्ची पसंद नहीं, इसलिए उनकी पत्नी आज भी रिक्शे पर ही नजर आती हैं। आज जब राजनीतिक भ्रष्टाचार से प्रायः कोई सियासतदां नहीं बच सका है, उनके 'सफेद कुर्ते-पाजामे' पर दाग क्यों नहीं लगे? माणिक सरकार की मानें, तो उनकी जरूरतें काफी कम हैं। नसवार का एक पैकेट और दिन भर में सिगरेट की एक डिब्बी...। और जब खर्च बहुत कम हो, तो 'कमाने' की भला क्या जरूरत?
माणिक का राजनीतिक उदय किसी कहानी से कम नहीं। उनके पिता दर्जी थे और मां सरकारी नौकर, इसलिए एक सामान्य परिवार की तरह वह भी नौकरीपेशा जीवन बिताना चाहते थे। लेकिन 1967 में खाद्यान्न के लिए हुए आंदोलन से वह वामपंथी विचारधारा के करीब आए।
आज जब बेरोजगारी दर राज्य सरकार को मुंह चिढ़ा रही है, यह माणिक की नेतृत्व क्षमता ही है कि त्रिपुरा पूर्वोत्तर का सबसे शांत राज्य है और अलगाववादी तत्व मुख्यधारा का हिस्सा बन रहे हैं। बावजूद इसके इस 'राजा' का दर्द तो बस इतना ही है कि अगर केंद्र सहायता दे, तो राज्य की बुनियादी जरूरतें पूरी की जा सकें, ताकि सरप्लस बिजली वाले इस राज्य की तरफ निवेशक ध्यान दें।