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एक देश एक चुनाव: इस बदलाव के दिखते हैं कई लाभ, लेकिन संभालने होंगे कई मोर्चे

विराग गुप्ता
Updated Fri, 20 Sep 2024 07:06 AM IST

सार

एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह भी है कि इससे आचार संहिता के भंवरजाल और सियासी मलखंब से मुक्ति मिलने के साथ गवर्नेंस में बेहतरी से विकास कार्यों की रफ्तार बढ़ेगी। लेकिन इसे सफल बनाने के लिए विधायी और सियासी, दोनों मोर्चों पर प्रयास करने होंगे।
 
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One Nation One Election - फोटो : Amar Ujala


एक साथ चुनाव का विरोध करने वालों को इस पर विचार करना चाहिए कि 1952 से 1967 के बीच हुए विधानसभा और लोकसभा के चार चुनावों से संविधान और लोकतंत्र कमजोर नहीं हुआ था। कुछ लोग इसे संघीय ढांचे के खिलाफ मान रहे हैं, जबकि इससे अनेक क्षेत्रीय दलों की विधानसभा के साथ लोकसभा में ताकत बढ़ सकती है। इससे अमेरिका की तर्ज पर केंद्रीय स्तर पर द्विदलीय व्यवस्था का विकास होगा, जिससे चुनावों में सतही आरोपों के बजाय सार्थक बहस के नए दौर की शुरुआत हो सकती है।


कोविंद समिति की रिपोर्ट को लागू करने के लिए कार्यबल बनाने की बात हो रही है। मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद अब विधि मंत्रालय को बिल का मसौदा बनाना होगा। राज्यों और विपक्ष के साथ सही संवाद नहीं हुआ, तो संसद में पेश होने पर बिल को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने की मांग हो सकती है। संसद में दो-तिहाई बहुमत से संविधान में संशोधन हो भी जाए, तो फिर राज्य विधानसभाओं की मंजूरी चाहिए।


एक साथ चुनाव से जुड़े आर्थिक लाभों का ठोस वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध नहीं है, पर कुछ उत्साही समर्थकों ने जीडीपी में 1.5 फीसदी बढ़ोतरी का दावा किया है। लेकिन एक साथ चुनाव की व्यवस्था लागू होने के बावजूद इस्तीफे, मृत्यु और अयोग्यता के आधार पर खाली हुई सीटों पर उपचुनावों की समस्या बनी रहेगी।


कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुसार, लगातार होते रहने वाले चुनावों से लोकतंत्र में जीवंतता और खर्चों से गरीबों की रसोई का जुगाड़ होता है। पहले आम चुनाव में लगभग 10.5 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा के चुनाव कराने में वर्ष 2009 में 1,195 करोड़ और 2014 में लगभग 3,900 करोड़ रुपये खर्च हुए। पर असली खर्च तो नेता और पार्टी करते हैं, जिसका सही हिसाब ही नहीं मिलता। वर्ष 2024 के आम चुनाव में लगभग 1.35 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यानी नेताओं ने हर वोटर पर लगभग एक हजार रुपये खर्च किए।


महंगे होते चुनावों से सत्ता के गलियारों की चकाचौंध का जो दरवाजा खुलता है, उसे ठीक करने के लिए ठोस सुधारों की जरूरत है। पिछले कई दशकों में चुनाव आयोग ने चुनावी सुधार से जुड़े कानूनों में बदलाव के लिए यूपीए और एनडीए सरकार के पास अनेक सुझाव भेजे हैं। उसके लिए संविधान संशोधनों के बजाय सिर्फ कानूनों में परिवर्तन से बड़े बदलाव आ सकते हैं। ऐसे बदलावों से सही मायने में लोकतंत्र में बेहतरी और गवर्नेंस का मार्ग प्रशस्त होगा।


विधि आयोग की पिछली रिपोर्ट से सबक लेते हुए सरकार को राज्य विधानसभाओं के चुनावों को समूह में कराने का यत्न करना चाहिए। अमेरिका और रूस जैसे बड़े देशों में कई टाइम जोन होते हैं। इससे लोगों की सहूलियत के साथ बिजली और ऊर्जा की बचत होती है। उसी तरीके से भारत में राज्यों की विधानसभाओं के कैलेंडर को पटरी पर लाया जाए, तो लगातार हो रहे चुनावों में कमी आ सकती है। मौजूदा कानूनी व्यवस्था के अनुसार, विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने के छह महीने पहले चुनाव कराए जा सकते हैं। इसे एक साल कर दिया जाए, तो कई राज्यों में विधानसभा चुनाव एक साथ हो सकते हैं। इसके लिए संविधान संशोधन के बजाय संसद से सिर्फ जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम में बदलाव करने की जरूरत होगी।
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गवर्नेंस से जनता का दिल जीतने में विफल कई नेता अधकचरे कानूनों से वोटरों को लुभाने का प्रयास कर रहे हैं। कोलकाता में महिला डॉक्टर पर जुर्म ढाने वाले अपराधियों और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने के बजाय ममता सरकार ने अपराजिता कानून का शिगूफा छोड़ा है। लेकिन महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश ने भी कई साल पहले ऐसे ही कानून बनाए थे, जिन्हें अभी तक लागू नहीं किया गया। निजी क्षेत्र और माटी पुत्रों के आरक्षण से जुड़े कई कानून अदालतों का चक्कर काट रहे हैं। उत्तराखंड में चुनाव से पहले समान नागरिक संहिता कानून का हो-हल्ला हुआ था, उससे जुड़े नियम अब तक नहीं बनने की वजह से, यह कानून लागू नहीं हुआ। पिछली लोकसभा में महिला आरक्षण के लिए विधेयक पारित हो गया, लेकिन उसके अमल की समय-सीमा स्पष्ट नहीं है। इसलिए एक साथ चुनाव पर कोरी बहस और विरोधाभास बढ़ने के बजाय उसे लागू करने के ठोस रोडमैप पर अमल करने की जरूरत है।


एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान संशोधन हो जाने पर केंद्रीय चुनाव आयोग के पास पर्याप्त शक्ति आ जाएगी। ईवीएम मशीन, वीवीपैट, प्रशासनिक अमले और सुरक्षा बलों की उपलब्धता के मुद्दों का भी निराकरण हो सकता है। लेकिन संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार, स्थानीय निकायों का विषय राज्यों के अधीन है। स्थानीय निकाय के चुनावों को लोकसभा के 100 दिन बाद कराने के कानूनों को लागू करने के लिए सभी राज्यों की सहमति जरूरी होगी। असम, पश्चिम बंगाल और सीमावर्ती राज्यों में नागरिकता से जुड़े मामलों पर सियासी विवाद से साफ है कि पूरे देश के लिए एक वोटर लिस्ट की पहल प्रशासनिक और सांविधानिक उलझनों का शिकार हो सकती है।


अगले आम चुनाव के पहले जनगणना होनी है, जिसमें जातिगत जनगणना का पेच फंसा है। फिर लोकसभा सीटों के परिसीमन में उत्तर और दक्षिण भारत के क्षेत्रवाद का विवाद हावी हो सकता है। ऐसी अनेक चुनौतियों के बीच संविधान और कानूनों में संशोधन करके एक साथ चुनाव कराने के संकल्प को सफल बनाना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।    

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