एनडीए सरकार का सालाना बजट अगले महीने आने वाला है, जिस पर करोड़ों लोगों की निगाहें टिकी हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली के सामने मांगों और उम्मीदों की लंबी फेहरिस्त रखी जा चुकी है। आम आदमी, कर्मचारियों, ट्रेड यूनियनें, कॉर्पोरेट, कृषक, प्रोफेशनल, शेयर ब्रोकर वगैरह सभी ने अपनी-अपनी मांगें रखी हैं। सरकार के लिए इन्हें पूरा करना शायद ही संभव हो, क्योंकि पूर्ववर्ती सरकारों की तरह इसके भी हाथ बंधे हुए हैं। मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर उसे भारी खर्च करना पड़ रहा है। और इस बार सरकारी कर्मचारियों के लिए सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करने के कारण कुल 48,000 हजार करोड़ रुपये का दबाव बजट पर आ जाएगा। जाहिर है, यह सरकार के लिए एक बहुत बड़ी उलझन है। उसकी आमदनी के स्रोत काफी कम हैं और खर्च के लिए दबाव बहुत है।
इस साल भी सबसे ज्यादा दबाव आयकर में छूट को लेकर है। वेतनभोगी जनता चाहती है कि उसे आयकर में छूट मिले। पिछले बजट में जो छूट मिली थी, उसका लोगों को खास फायदा नहीं हुआ। भाजपा नेताओं ने सत्ता में आने से पहले कहा था कि उनकी सरकार आयकर में छूट की सीमा बढ़ाकर पांच लाख रुपये कर देगी। पिछले बजट में ऐसी उम्मीद थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अगर ऐसा नहीं हो सकता है, तो सरकार दीर्घावधि की बचत के जरिये मिलने वाली छूट की सीमा डेढ़ लाख रुपये से बढ़ाकर ढाई लाख रुपये कर दे। इतना ही नहीं, वेतनभोगी वर्ग के लिए दो लाख रुपये तक के स्टैंडर्ड डिडक्शन की व्यवस्था फिर से शुरू करे। इससे उन्हें महंगाई से लड़ने में मदद मिलेगी। सरकार ने कई साल पहले मेडिकल छूट के नाम पर 15,000 रुपये की सीमा बनाई थी, जिसे बढ़ाना बेहद जरूरी है। दवाओं की बढ़ती कीमतों और मेडिकल खर्च की बढ़ती लागत के कारण इसमें बढ़ोतरी जरूरी हो गई है।
बच्चों की फीस देने के नाम पर भी सरकार ने टैक्स में छूट की व्यवस्था की है, लेकिन यह इतनी कम है कि इससे किसी का काम नहीं चलता। सरकार को इसकी सीमा भी बढ़ानी चाहिए। सरकार ने ट्रांसपोर्ट अलाउंस में हालांकि बढ़ोतरी करके इसे 1,600 रुपये प्रति माह कर दिया है, लेकिन सच्चाई यह है कि बड़े शहरों में ट्रांसपोर्ट पर कर्मचारियों का इससे कई गुना ज्यादा खर्च हो जाता है। इसे बढ़ाकर कम से कम 3,000 रुपये किया जाना चाहिए।
लोगों का कहना है कि सरकार को फिक्स्ड डिपॉजिट पर से टैक्स हटा लेना चाहिए, क्योंकि वह पैसा आयकर देने के बाद ही बचता है, जिसे लोग बैंक में फिक्स डिपॉजिट करते हैं। यह डबल टैक्सेशन है और इसे तुरंत खत्म कर देना चाहिए। मध्य वर्ग पेट काटकर ही बचत करता है और सरकार उसमें भी हिस्सा ले रही है। एफडी पर से टैक्स हटाने का सरकार को फायदा यह होगा कि लोग बैंकों में यानी सिस्टम में पैसा डालेंगे, जो अंत में उसके ही काम आएगा।
आवास ऋण का ब्याज एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर सरकार को सोचना चाहिए। देश में मकानों की कीमतें बढ़ती ही जा रही हैं और ब्याज दरें अब भी काफी ऊंची हैं। ब्याज चुकाने में मध्य वर्ग की हालत पतली हो जाती है। अभी सरकार ने इनके ब्याज भुगतान पर दो लाख रुपये तक की छूट दे रखी है, जिसे बढ़ाकर तीन लाख रुपये कर देना चाहिए और मूल के भुगतान पर कम से कम एक लाख रुपये से बढ़ाकर नई सीमा निर्धारित करनी चाहिए। यह एक बड़ा कदम होगा और इससे बीमार रियल एस्टेट उद्योग को सहारा मिलेगा। मोदी सरकार की सबको घर देने की योजना में भी यह मददगार होगा।
इस समय सर्विस टैक्स सबको चुभ रहा है। सरकार ने अपना खजाना भरने के लिए इस कर का सहारा लिया है। दरअसल कोई भी सरकार आयकर बढ़ाकर अलोकप्रिय नहीं होना चाहती है। इसलिए वह सर्विस टैक्स जैसे परोक्ष कर माध्यमों का सहारा लेती है। वित्त मंत्री ने भी इसके माध्यम से सरकार के लिए धन जुटाने का प्रयास किया है। लेकिन पिछले बजट में इसे कई नए क्षेत्रों में तो लगाया ही गया, साथ-साथ इसकी सीमा भी बढ़ाकर 14.42 प्रतिशत कर दी गई, जो मध्य वर्ग के लिए कष्टदायक है। सरकार को इसे घटाने के बारे में सोचना चाहिए। इसका बुरा असर खान-पान उद्योग पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है।
कृषि का बेशक देश के जीडीपी में योगदान घट रहा हो, लेकिन सच्चाई है कि उसका महत्व आज भी उतना ही है। यह क्षेत्र अब भी उपेक्षित है और इसमें निवेश की भारी जरूरत है। सिंचाई की व्यवस्था के लिए सरकार को बड़ी रकम खर्च करने की जरूरत है, साथ ही किसानों के लिए कर्ज की व्यवस्था करने की भी। इसके अलावा कृषि बीमा पर सरकार को ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। इस मद में राशि और बढ़ानी चाहिए। कृषि बीमा किसानों की आत्महत्या रोकने की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है। इस मद में बड़ी राशि देने पर ही कृषि क्षेत्र में खुशहाली आएगी। कृषि की कई योजनाएं इस समय चल रही हैं और उनमें ज्यादा निवेश करना समय की मांग है, ताकि देश में दूसरी हरित क्रांति आए।
इसी तरह इन्फ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य, आंतरिक सुरक्षा, लघु उद्योग वगैरह की अपनी उम्मीदें हैं। शिक्षा पर हम हम जीडीपी का महज 3.3 प्रतिशत ही खर्च करते हैं और स्वास्थ्य सुरक्षा पर सरकार ने खर्च कम कर दिए हैं। इसी तरह साइंस और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सरकार को जितना खर्च करना चाहिए, उतना वह खर्च नहीं कर पा रही है। लेकिन एक और क्षेत्र है, जिस पर सरकार की नजर है और वह शेयर बाजार। मुंबई शेयर बाजार सूचकांक नई सरकार के आने के बाद 30,000 के जादुई आंकड़े तक पहुंच कर नीचे 25 हजार के आसपास घूम रहा है। सरकार के लिए यह परेशानी का सबब है, क्योंकि उसे विनिवेश से धन जुटाना है, जो बजट घाटे को भरने के लिए जरूरी है।
बहरहाल, हजारों उम्मीदें हैं और सरकार के पास धन सीमित है। देखना है कि वित्त मंत्री कितनी बाजीगरी दिखा पाते हैं।