आज से तकरीबन चालीस साल पहले कोलकाता के बिशप लेफ्ररॉय रोड पर जाने-माने फिल्मकार सत्यजीत राय को देखने के लिए सिनेप्रेमियों के साथ ही उनके पड़ोस में रहने वाला पांच-छह वर्ष का नन्हा बालक भी काफी उत्सुक रहा करता था। वह हमेशा सोचा करता कि पड़ोस के 'ददा' फिल्मी परदे के अंदर कैसे पहुंच जाते हैं।
यह सवाल जब उसने घर वालों से पूछा, तो उसे बचकाना कहकर टाल दिया गया, लेकिन जवाब की तलाश उस नन्हे बालक को उस 'रोड' पर ले आई है, जिसे अब सभी 'गुड' कह रहे हैं। कोलकाता की गलियों से शुरू हुआ ज्ञान कोरिया का वह सफर ही द गुड रोड है, जो भारत की तरफ से इस साल ऑस्कर के लिए नामित की गई है।
बतौर निर्देशक ज्ञान कोरिया धैर्य के साथ काम करने के लिए जाने जाते हैं; फिर चाहे विज्ञापन तैयार करना हो अथवा गैरसरकारी संगठनों के लिए डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाना। द गुड रोड की स्क्रिप्ट और रिसर्च में ही उन्होंने पूरे सात साल का समय लिया और हाई-वे पर ट्रक डाइवरों के साथ लंबा वक्त बिताया। इतना ही नहीं, ऑडिशन की लंबी प्रक्रिया के बाद द गुड रोड में उस शामजीभाई को ड्राइवर की भूमिका सौंपी, जो खुद ट्रक डाइवर हैं। हालांकि शामजीभाई ने आज तक फिल्म नहीं देखी थी, बावजूद इसके उनके चयन पर ज्ञान का कहना था कि अभिनय कभी शिक्षण संस्थानों के बंद कमरे में नहीं सीखा जा सकता।
ज्ञान कोरिया के व्यक्तित्व का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि वह चुनौतियों को 'जान-बूझकर' गले लगाते हैं। द गुड रोड फिल्म उन्होंने उस गुजराती में बनाने का निश्चय किया, जिसे वह न तो बोल सकते हैं और न लिख सकते हैं। इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं। वह कहते हैं, भारत की विविधता का संरक्षण आवश्यक है। और ऐसे वक्त में जब क्षेत्रीय सिनेमा हाशिये पर जा रही हो, तब फिल्मकारों को इसे बचाने के लिए आगे आना चाहिए।
हालांकि द गुड रोड को ऑस्कर में भेजे जाने को लेकर विवाद भी खूब हुए, पर ज्ञान इसे 'प्रतिस्पर्धा की शुरुआत' बताते हैं। अब यह प्रतिस्पर्धा किस रूप में आगे बढ़ेगी, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में है। पर जिस विनम्रता से उन्होंने इस विवाद से खुद अलग किया, वह उनकी फिल्म का आधार है और व्यक्तित्व का भी। नहीं तो, पहली ही फिल्म से ऑस्कर की दहलीज तक पहुंचना किसी भी निर्देशक के पांव जमीन से उखाड़ सकता है।
हेमेन्द्र मिश्र