आशंका काफी पहले से थी। लालू प्रसाद यादव को इस बात का अंदेशा भी था! पिछले काफी दिनों से वह तनाव में थे। राजनीति की उनकी चालें कोई खास परिणाम नहीं ला पा रही थीं। वह और उनके निकट के सभी लोग यह समझ तो रहे थे कि एक-एक कर सभी रास्ते बंद होते जा रहे हैं, लेकिन मन है, जो किसी-न-किसी चमत्कार की आशा पाले रहता है! इसी आसमानी आशा में इतना वक्त निकल गया, लेकिन वक्त भी वक्त की तलाश में रहता है। लालू प्रसाद अब जेल में वक्त काट रहे हैं।
बिहार की शायद ही कोई सड़क, गली-रास्ता दुरुस्त बचा रहा होगा, जहां हमने 'भ्रष्टाचार मिटाएंगे, नया बिहार बनाएंगे' का नारा एक साथ न लगाया हो! इसलिए भी यह विसंगति गहरे काटती है कि लालू प्रसाद जेल भी गए, तो भ्रष्टाचार के संगीन आरोप में! लोकनायक जयप्रकाश को भी कोई मुगालता नहीं था और हम भी इस सच्चाई को जानते-समझते थे कि चौहत्तर की आंधी में जो लोग आसमान चूम रहे थे, वे क्रांतिकारी विचार-आचार की धरती पर चलना नहीं जानते। यह सच्चाई तो अकबर इलाहाबादी ने तभी लिख दी थी, जब गांधी ने आंधी उठाई थी, मुश्ते-खाक हैं मगर आंधी के साथ हैं/बुद्धू मियां भी हजरते गांधी के साथ हैं! लेकिन जयप्रकाश नारायण ने ही, इस आरोप के जवाब में, कि सारे दिशाहीन, असामाजिक तत्वों को जमा कर जयप्रकाश क्रांति करने चले हैं, बार-बार कहा था कि आदमी बनाने का कोई कारखाना होता हो, तो मुझे पता नहीं है, लेकिन मैंने जीवन में यही देखा है कि आदमी को परिस्थिति की, क्रांति की भट्ठी में फेंक दो, तो वह कुछ बनकर, निखर कर सामने आता है। इसी आशा से कितनी ही भिन्न पृष्ठभूमियों से, हेतुओं से आए युवाओं को उन्होंने वक्त की भट्ठी में झोंक दिया था और सभी अपनी-अपनी तरह से उसमें से बाहर भी निकल आए।
लालू प्रसाद उनमें से ही एक थे। बहुत ही सामान्य पृष्ठभूमि से निकले, हमारी सामाजिक व्यवस्था की बनी सीढ़ियों में बहुत नीचे से उठे, लेकिन साहसी, सरल और अपनी तरह की आत्मीयता रखने वाले ऐसे युवा थे तब लालू, जिनकी मसें भींग ही रही थीं। इन्हीं सारे कारणों से लालू जयप्रकाश को भाते थे। लेकिन वह इस बात को लेकर काफी सजग भी थे और चिंतित भी कि आंदोलन के इन कर्णधारों का निजी स्तर पर कैसे विकास हो, किस तरह सजे-सुधरे! लेकिन इंदिरा गांधी की सत्तालोलुपता ने देश में आपातकाल क्या लगाया, बहुत कुछ गड्डमड्ड हो गया! वक्त दोनों के पास बहुत कम रह गया-लोकनायक जयप्रकाश अपनी आयु पूरी कर गए और हम सभी संपूर्ण क्रांति की अपनी यात्रा!
जयप्रकाश से कुछ सीख कर दो तरह के युवा सामने आए-एक वह, जो सत्ता की राजनीति में नहीं गए, लेकिन समाज परिवर्तन के काम से पूरी प्रतिबद्धता के साथ जुड़े रहे; दूसरे वे, जो सत्ता की राजनीति में पूरी तैयारी के साथ उतरे! जो उतरे, उनमें लालू प्रसाद भी एक थे-अपने व्यक्तित्व की उन सारी विशेषताओं-छटाओं के साथ, जिनकी चर्चा हमेशा होती रही है। लेकिन जो सबसे दुखद पहलू रहा, वह यह कि लालू प्रसाद समेत जयप्रकाश के सभी युवाओं को सत्ता की राजनीति ने पूरी तरह लील लिया! वर्ष 1947 में महात्मा गांधी के साथ काम कर चुके प्रमुख लोगों के साथ भी ऐसा ही हुआ था; 1977 में जयप्रकाश नारायण के युवाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ। इससे हम समझ सकते हैं कि इस दलीय राजनीति का कैसा मानवभक्षी स्वभाव है! सत्ता के इस गलियारे में इन्हें मिले वैसे लोग, जिन्होंने इन्हें समझाया कि यहां बने रहना हो और जमाए रहना हो, तो यही रास्ता है! संपूर्ण क्रांति आदि की बातें तो बहुत दूर, राजनीति का भी एक ज्यादा नैतिक, मानवीय और परिवर्तनकारी रास्ता बनाया जा सकता है, यह भी सब भूल गए। और सत्ता! वह तो वह रुखड़ा पत्थर है, जो रगड़-रगड़ कर आपकी सारी चमक छुड़ा देता है और जब आप बिल्कुल आभाहीन बच जाते हैं, तब वह आपको भीड़ में एक बनाकर संतोष पाता है।
लालू प्रसाद का यह हश्र एक शोकांतिका है। यह सिर्फ एक मित्र की कुघड़ी का दर्शक बनना मात्र नहीं है, एक संभावना का अंत देखने की पीड़ा भी है। वह एक बड़ी संभावना बनकर, उस समाज से उभरे थे, जहां से कोई प्रतिभा आती भी है, यह मामने को यथास्थितिवादी समाज तैयार नहीं होता है। सजा सुनने के बाद वह भी अदालत में यही कह रहे थे कि उनका कोई अपराध नहीं है, लेकिन जिस संसद में बैठकर, जिस तरह के कानून बनाने में उन्होंने भी शिरकत की है, वह संसद और वह कानून उनकी बात मानने को तैयार नहीं है।
कानून का रास्ता जहां तक खुला है, उन्हें वहां तक जाने की आजादी है, लेकिन एक और आजादी भी है उन्हें! आजादी इस बात की, कि जेल के एकांत में बैठकर उस पूरी यात्रा पर वह नजर डालें कि लालू प्रसाद को बनना क्या था, पहुंचना कहां था और वह बना क्या और पहुंचे कहां! यह अंतर्यात्रा आसान नहीं होती है, लेकिन जब बाहरी रास्ते बंद हो जाते हैं, तब यही एक रास्ता है, जिस पर आप पूरी आजादी के साथ चल सकते हैं। लालू अगर इस जेल से, जिसकी अवधि कितनी होगी, इसका पता नहीं, लालू को खोजकर बाहर आए, तो हम फिर से एक नया सफर देख सकते हैं। लेकिन अगर यह खोज संभव नहीं हुई, तो फिर कोई सफर भी संभव नहीं होगा।