नरेंद्र मोदी की सरकार का सबसे कामयाब फलक निस्संदेह उनकी विदेश नीति है, जिसमें खुद प्रधानमंत्री की भूमिका बेहद अहम रही है। फिर चाहे वह अमेरिका और जापान जैसी महाशक्तियां हों, नेपाल व श्रीलंका जैसे पड़ोसी मुल्क हों या फिर मॉरीशस व सेशेल्स जैसे द्वीपीय देश, मोदी ने न सिर्फ भारतीय नीति को दोबारा व्यवस्थित किया है, बल्कि इन राष्ट्रों के साथ हमारे सामरिक रिश्तों को भी गहराई दी है। नौ अप्रैल यानी आज से वह अपनी एक और विदेश यात्रा की शुरुआत कर रहे हैं, मगर इस बार उनका मकसद कुछ मुख्तलिफ है, और यह उनके एजेंडे के प्रमुख बिंदु, यानी देश के आर्थिक कायापलट से जुड़ा है। जैसा कि 26 मार्च को उन्होंने ट्वीट भी किया था, 'फ्रांस, जर्मनी और कनाडा की मेरी यात्रा का खास उद्देश्य भारत के आर्थिक एजेंडे और हमारे युवाओं के लिए रोजगार सृजन पर होगा।'
दरअसल, इस बार उनका एजेंडा ज्यादा विविध व जटिल होगा। इसका मुख्य ध्यान महज व्यापार और निवेश पर न होकर, स्मार्ट शहर, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, शिक्षा, कौशल विकास और ऐसे ही कुछ दूसरे मुद्दों पर होगा। हालांकि इन तीनों ही देशों के मद्देनजर सामरिक पहलू भी काफी महत्वपूर्ण है। जहां फ्रांस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के साथ ही परमाणु व अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ है। वहीं, जर्मनी सही मायनों में पूरे यूरोप का नेतृत्व करता है। रही बात कनाडा की, तो यहां प्रवासी भारतीय बड़ी तादाद में हैं, जो भारत के साथ मजबूत सामरिक रिश्तों के लिए आधार बनाते हैं। फ्रांस रक्षा क्षेत्र में देश का प्रमुख सहयोगी है। इसका एक और सबूत तब मिला, जब बीते सोमवार को भारत ने छह आधुनिक स्कॉर्पियन पनडुब्बियों में से पहली पनडुब्बी लांच की। इसे मुंबई में मझगांव डॉकयार्ड और फ्रांस के सहयोग से तैयार किया गया है। फिलहाल भारत और फ्रांस के बीच उच्च स्तरीय रक्षा खरीद की कई वार्ताएं जारी हैं।
दोनों देशों के बीच एयरबस 330 के सौदे पर बात चल रही है, मगर उनके बीच सबसे बड़ा समझौता 126 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर है, जो अब तक मिली सूचना के मुताबिक वार्ता के अंतिम चरण में पहुंच गया है। हालांकि रक्षा खरीद से जुड़े फैसले प्रधानमंत्री की इस यात्रा का प्रमुख हिस्सा नहीं होंगे, हैरत नहीं कि दोनों देशों की वार्ता में इनका उल्लेख तक न हो। खासकर तब, जबकि सारी विदेशी खरीदों के जरिये घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन देना भारत का प्रमुख मकसद बन गया है। मसलन, राफेल सौदे के एक भाग के तौर पर 126 में से 108 लड़ाकू विमानों के भारत में निर्माण के लिए तकनीकी का अभूतपूर्व हस्तांतरण होगा।
फ्रांस के साथ रिश्तों का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू परमाणु ऊर्जा है। परमाणु रिएक्टर प्रौद्योगिकी में फ्रांस दुनिया के अगुआ राष्ट्रों में से है। फ्रांस की कंपनी 'अरेवा' महाराष्ट्र के जैतापुर में इंडियन न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के लिए 9,900 मेगावाट का परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने जा रही है। यह अपनी तरह का दुनिया का पहला प्रोजेक्ट होगा, जिसमें कुल छह रिएक्टर शामिल होंगे। सरकार को उम्मीद है कि इससे न केवल ऊर्जा के उत्पादन में मदद मिलेगी, बल्कि कई तरह के सार्वजनिक उद्देश्य भी पूरे हो सकेंगे। इतना ही नहीं, इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा होने के साथ देश के लघु एवं सूक्ष्म उद्योगों को ताकत मिलेगी, जो कि प्रोजेक्ट के लिए छोटे-छोटे घटकों की पूर्ति करने में मददगार साबित होंगे।
अगर आर्थिक नजरिये से देखें, तो सबसे महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री की जर्मनी यात्रा है, जो कि यूरोप का पावर हाउस है। यहां मोदी हनोवर व्यापार मेले का उद्घाटन करेंगे, जिसमें 'मेक इन इंडिया' थीम के तहत भारत सहयोगी राष्ट्र है। मेले में 100 से ज्यादा भारतीय सीईओ और तकरीबन 450 भारतीय कंपनियां शिरकत कर रही हैं। जर्मनी विनिर्माण क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में एक है, और यहां 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम बड़ी संख्या में लोगों का ध्यान खींच रहा है।
जर्मनी और फ्रांस की यात्रा हमारे प्रधानमंत्री को उक्रेन और पश्चिम एशिया से जुड़े खास राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करने का अवसर देगी। वैसे भी यूरोप और रूस की अनबन का भारत पर नकारात्मक असर पड़ रहा है, क्योंकि इससे मास्को और बीजिंग को निकट आने की जमीन मिल रही है। इसके अलावा भारत इस्लामिक स्टेट से जुड़े मामलों पर भी नजर रखना चाहता है, क्योंकि इसका असर अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भी दिख सकता है।
मोदी की कनाडा यात्रा 1973 के बाद से किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली द्विपक्षीय यात्रा है। यह एक और उदाहरण है कि विदेश नीति के क्षेत्र में मोदी किस तरह अपनी खास छाप छोड़ रहे हैं। यात्रा के दौरान निस्संदेह व्यापार व वाणिज्य से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी, मगर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शायद मोदी की नजर वहां के प्रवासी भारतीयों पर हो। आर्थिक मोर्चे पर दोनों पक्षों को कांप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (सीईपीए) के जल्द से जल्द संपन्न होने की उम्मीद है, जिससे भारत के फॉर्मा और टेक्सटाइल से जुड़े निर्यातों को सहूलियत होगी। इसके अलावा इससे दोनों देशों के बीच प्रोफेशनल्स की मुक्त आवाजाही में भी मदद मिलेगी। इससे इतर, निवेश और व्यापार व वाणिज्य के अलावा तीनों ही देश मोदी के मूल्यांकन के उत्सुक भी होंगे, जिन्हें अपनी पीढ़ी का सबसे दिलचस्प भारतीय नेता माना जा रहा है। किसी रॉक स्टार की तरह होने वाले उनके विदेश दौरे को लेकर आम लोग भी उत्सुक हैं, जैसा टोरेंटो की उनकी सभा के लिए बिक चुके 8,000 टिकटों से पता चलता है।
- लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के वरिष्ठ फेलो हैं